चार साल का ग्रैजुएशन: तुरुप का इक्का या अंधेरे में छलांग?

- Author, अमरेश द्विवेदी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली विश्वविद्यालय में इसी साल से चार साल का स्नातक पाठ्यक्रम लागू हुआ है जिसे एफ़वाईयूपी नाम दिया गया है. कुछ गिने चुने विश्वविद्यालयों को छोड़कर भारत में अभी तक तीन साल के स्नातक पाठ्यक्रम का ही ढांचा है.
दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन ने कुछ विदेशी विश्वविद्यालयों के ढांचे से प्रेरणा लेते हुए चार साल का पाठ्यक्रम लागू किया है.
विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर कुलपति का संदेश लिखा है, "पुरानी व्यवस्था को छात्रों की आज की ज़रूरतों के अनुकूल बनाने की ज़रूरत थी. जैसे कि छात्रों को नौकरी मिलने में दिक्कत पेश आती थी. पाठ्यक्रम का ढांचा ऐसा था जो उन्हें असल ज़िंदगी की ज़रूरतों से परिचित नहीं करवा पाता था."
छात्रों का अनुभव
इस कार्यक्रम को लागू हुए लगभग तीन महीने हो गए हैं. बीबीसी ने ये पड़ताल की कि जिस एफ़वाईयूपी को आज की बाज़ार की ज़रूरतों को देखते हुए तुरुप का इक्का बताया जा रहा है, उसकी वस्तुस्थिति क्या है. छात्रों और शिक्षकों का अनुभव अब तक क्या रहा है.
मिरांडा हाउस की तुलिका अरपात्रो का कहना है, "एफ़वाईयूपी में हमें कुछ ऐसी चीज़ें पढ़ाई जा रही हैं जो हम छठी-सातवीं कक्षा में पढ़ चुके हैं."

तन्वी जैन का कहना था, "दो साल में इतिहास जैसे विषय में डिप्लोमा लेकर अगर हम बाज़ार में जाते भी हैं तो कौन हमें नौकरी दे देगा."
कई छात्रों का कहना था कि एक तरफ फ़ाउंडेशन में उन्हें ये बताया जा रहा है कि कंप्यूटर क्या है और दूसरी तरफ उनसे कंप्यूटर पर प्रज़ेंटेशन बनवाए जा रहे हैं.
कुछ छात्रों का कहना था कि शिक्षकखुद कोर्स को समझने की कोशिश कर रहे हैं.
एसआरसीसी के एक छात्र दिव्यत का कहना है, "तमाम ऐसे हैं जो उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते हैं लेकिन इस एक साल के अतिरिक्त ख़र्चे ने उन्हें प्रभावित किया है."
एफ़वाईयूपी कोर्स नया-नया है. छात्रों को कुछ समझ में नहीं आ रहा. किताबें अभी भी पूरी तरह से उपलब्ध नहीं और एक असमंजस तो है ही.
लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय में कई छात्रों का मानना है कि इस नए कार्यक्रम से नौकरी की समस्या का व्यावहारिक हल निकल सकेगा.
एसआरसीसी के एक छात्र शरद गिरि ने कहा, "चार साल का ग्रैजुएशन आज वर्ल्ड स्टैंडर्ड है और अब इसे दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू किया गया है जो अच्छा है. तीन साल का कोर्स काफ़ी जटिल था."
कुछ छात्रों का कहना है कि इस पाठ्यक्रम से हर विषय की जानकारी मिलती है और इसे पढ़ने के बाद अगर कोई छात्र आईएएस की परीक्षा में बैठना चाहता है तो उसे काफ़ी लाभ हो सकता है.
पूर्वी दिल्ली के अग्रसेन कॉलेज की छात्रा आयुषी आनंद ने कहा, "पहले के सिस्टम में अगर दो साल के बाद आपकी पढ़ाई छूट जाती थी तो आपके पास कुछ भी नहीं रहता था. लेकिन इस व्यवस्था में आप कम से कम डिप्लोमा तो हासिल कर सकेंगे."
शिक्षकों का पक्ष
वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ शिक्षक जहां एफ़वाईयूपी के खिलाफ़ हैं तो कुछ ऐसे शिक्षक भी मिले जो इसे परंपरागत शिक्षा पद्धति से एक अलग एक नई चीज़ के रूप में देख रहे हैं.

मिरांडा हाउस में अर्थशास्त्र की शिक्षिका नंदिता दत्ता का कहना है, "प्रशासन का दावा है कि इससे रोज़गार के लिए छात्र ज्यादा योग्य हो सकेंगे. लेकिन योग्यता का सवाल तो तब आता है जब समाज में रोज़गार के अवसर बढ़ें. दूसरी बात ये कि यूनिवर्सिटी को लो स्किल्ड मैनपावर तैयार करने के लिए तो बनाया नहीं गया."
कुछ शिक्षकों का कहना है कि 23 जुलाई से नया सेमेस्टर शुरू हुआ है और अभी तक ग्राउंड पर कुछ भी काम नहीं हुआ है. पढ़ाई शुरू होने के डेढ़ महीने बाद प्रशासन को ये समझ में आया कि इंटरनल असेसमेंट का तरीका बदलना चाहिए. पहले से उस पर कोई विचार नहीं किया गया.
वहीं अग्रसेन कॉलेज में अंग्रेजी की शिक्षिका मोना सिंह कहती हैं, "मैंने काफी खुले विचार से इस कोर्स को अप्रोच किया है. ये कोर्स पढ़ने-पढ़ाने के पुराने ढांचे से अलग है और इसमें आज की ज़रूरत के मुताबिक समूह चर्चा, प्रेज़ेंटेशन, प्रोजेक्ट पर ज़ोर है जो कि छात्रों के लिए बेहद उपयोगी है.
कमियां
वहीं इस कोर्स के खिलाफ़ अभियान चलाने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक अपूर्वानंद का कहना है कि सिर्फ़ नौकरी हासिल करने को उच्च शिक्षा में किसी बड़े बदलाव का आधार नहीं बनाया जा सकता. तीन साल के कार्यक्रम में नौकरी नहीं मिल रही इसलिए चार साल का कर दो, नौकरी मिलने लगेगी - ये तर्क ठीक नहीं.

अपूर्वानंद का कहना है, "पूरी दुनिया में शिक्षा महंगी होती जा रही है. ऐसे में अवधि बढ़ाकर इस खर्च को और बढ़ाने का कोई औचित्य समझ में नहीं आता."
उन्होंने आईआईटी, आइसर जैसे चार साला कार्यक्रम चलाने वाले संस्थानों का उदाहरण देते हुए कहा कि पेशेवर संस्थानों के तर्क को दिल्ली जैसे विश्वविद्यालय पर लागू करने का आधार ढूंढे बगैर अपनाना ठीक नहीं है.
उन्होंने कहा कि आंबेडकर विश्वविद्यालय चार साल का स्नातक कार्यक्रम चलाता है. लेकिन वहां तीन साल में एक विषय में ऑनर्स मिल जाता है और अगर छात्र चौथे साल में पढ़ाई करने का विकल्प चुनता है तो उसे एक और ऑनर्स दिया जाता है. दिल्ली विश्वविद्यालय ऐसा कोई विकल्प नहीं दे रहा.
उनकी ये भी आपत्ति है कि एक ही पाठ्यक्रम से दो साल में डिप्लोमा, तीन साल में ग्रेजुएशन और चार साल में ऑनर्स की डिग्री देने की व्यवस्था दी गई है. एक ही पाठ्यक्रम इन तीन अलग-अलग उद्देश्यों की पूर्ति कैसे कर सकता है.
कुलपति की सफ़ाई
लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति दिनेश सिंह एफ़वाईयूपी के खिलाफ उठाए जा रहे सवालों से कतई इत्तेफ़ाक नहीं रखते.
उन्होंने कहा, "किसी कार्यक्रम की कितनी भी बड़े स्तर पर तैयारी की जाए, कितनी भी ट्रेनिंग दी जाए, जब पहली बार आप मैदान में उतरते हैं चाहे मैच खेलने या इस तरह की पढ़ाई करने तो शुरू में थोड़ा उतार-चढ़ाव और खींचातानी तो होती ही है."

इस कार्यक्रम के आलोचक छात्रों के जीवन के साथ इसे खिलवाड़ बता रहे हैं लेकिन दिनेश सिंह का कहना है कि यदि ऐसा होता तो कम छात्रों ने दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले के लिए आवेदन किया होता लेकिन इस बार ये संख्या हर बार से ज्यादा यानी तीन लाख से भी ज़्यादा रही है.
दिनेश सिंह ने एक अंतराष्ट्रीय स्तर की कंपनी का जिक्र करते हुए कहा कि कंपनी ने विश्वविद्यालय के चुनिंदा 1100 छात्रों का कैंपस इंटरव्यू लिया लेकिन केवल तीन छात्र ही चुने जा सके क्योंकि छात्रों में भाषा, संवाद और विश्लेषण संबंधी योग्यता भी नहीं थी. इन्हीं कमियों को पूरा करने के लिए विश्वविद्यालय ने ये कार्यक्रम शुरू किया है.
'विश्वविद्यालय स्वतंत्र'
ये सवाल भी उठाए गए हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय अपने स्तर पर शिक्षा प्रणाली में इतना बड़ा बदलाव लाने में सक्षम नहीं है.
लेकिन भारत सरकार के उच्च शिक्षा सचिव अशोक ठाकुर का कहना है कि "डीयू में लागू हुआ नया कार्यक्रम विश्वविद्यालय नियमों के अनुकूल है."
बहरहाल तमाम आशंकाओं के बीच ये कार्यक्रम लागू हो गया है और थोड़े दिनों बाद पहले सेमेस्टर की परीक्षा भी होनी है.
अब ऐसे हालात में छात्रों को उम्मीद यही है कि जल्दी ही उनसे राय जानकर विश्वविद्यालय प्रशासन उनकी आशंकाएं दूर करेगा और नई व्यवस्था में जहां कहीं भी सुधार की गुंजाइश होगी, उसे जल्दी से जल्दी अमल में लाया जाएगा.
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