एक महीने बाद, कैसा है 'आप' का नायक?

    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

शनिवार, 28 दिसंबर 2013 को मेरी छुट्टी थी और की नई ज़िम्मेदारी का पहला दिन – रामलीला मैदान में उनका और उनके मंत्रियों की शपथ ग्रहण का कार्यक्रम.

सर्दी की धूप का तकाज़ा था कि घर की बालकॉनी में बैठकर चाय पी जाए, पर बदलाव की आंधी की इतनी चर्चा थी कि मैं भी उसका हाल लेने के लिए रामलीला मैदान पहुंच गई.

जैसा सोचा था, वैसा ही पाया. ‘आप’ के आवेग में वहां हज़ारों की तादाद में जुटे आम आदमी और औरतों में ना जोश की कमी थी ना उम्मीद की.

पर 28 जनवरी 2014 तक का एक महीने का फ़ासला तय करते-करते अब हवा की गति कुछ मद्धिम हो गई है. जोश का रुख़ संकोच की तरफ़ हो गया है और कभी-कभी ठंडक की चुभन भी हो जाती है.

ये मेरी नहीं, रोज़ अख़बारों में छप रहे लेखों और टीवी चैनलों पर हो रही बहसों की नब्ज़ है. पर आम आदमी पार्टी के काम करने के तरीकों पर क्या इन्हीं गलियारों में सवाल उठ रहे हैं?

आम आदमी और औरतें, चाहे झुग्गी में रहने वाले हों या बड़ी कारों में चलने वाले- उनकी शाम की चाय पर बहस किसके पक्ष में है? लहर बरकरार है, धीमी है या मुड़ रही है? इसी का अंदाज़ा लगाने के लिए मैं पहुंची मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के विधानसभा क्षेत्र ‘नई दिल्ली’.

आम आवाज़ें

नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र को दिल्ली के वीवीआईपी इलाके के तौर पर जाना जाता है. इसी वीवीआईपी इलाके ने 15 साल से मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के सामने चुना अपनी पहचान आम आदमी के तौर पर बनाने वाले अरविंद केजरीवाल को.

क़रीब 82,000 वोटों में से 44,000- यानी आधे से ज़्यादा केजरीवाल के हक में पड़े. पर उन्हीं वोटरों में से कुछ मुझे नाराज़ मिले. ज़ाकिर अली सब्ज़ी की रेड़ी लगाते हैं और इसी विधानसभा क्षेत्र में दशकों से बसी धोबी घाट की झुग्गी में रहते हैं.

उन्होंने मुझसे कहा, “क्या ज़रूरत है इनको पुलिस से बहस करने की, इन्हें पहले ज़रूरी मुद्दों पर काम करना चाहिए, बिजली-पानी के लिए हम अभी तक तरस रहे हैं, हमारे घरों में कोई मीटर थोड़े ही लगे हैं.”

अपनी पोती के साथ बैठे ज़ाकिर ने तो ये तक कह डाला कि आने वाले समय में भी अगर उनके जैसे आम लोगों के हित में काम नहीं हुआ तो वो वापस कांग्रेस या बीजेपी को वोट देने के बारे में सोचेंगे.

ज़ाकिर से ठीक उलट उनकी पड़ोसन निकलीं. दो बच्चों की मां उर्मिला ने आम आदमी पार्टी को वोट नहीं डाला था. वह हमेशा से कांग्रेसी रही हैं.

पर फिर खुद ही कहने लगीं कि अब मन बदल भी सकता है, ख़ास तौर पर दिल्ली पुलिस से जुड़ी आप पार्टी की मुहिम के बाद.

उर्मिला बोलीं, “पचास साल से बाकी दोनों बड़ी पार्टियों को लोगों ने दिया, अब मुझे लगता है कि उन्हें एक मौका देना चाहिए. आखिर वो कोशिश तो कर रहे हैं. पुलिस से भी महिलाओं की सुरक्षा के लिए ही तो लड़ रहे हैं.”

मीडिया का आकलन

मीडिया के हालिया आकलनों में आम आदमी पार्टी के समर्थकों और विरोधियों को आर्थिक वर्गों में बांटा जा रहा है. पर जब एक ही झुग्गी से दो इतर विचार निकलें, तो क्या समझा जाए?

अख़बारों की मानें तो पढ़े-लिखे समृद्ध वर्ग में पार्टी की आलोचना बढ़ी है. ये वो तबका है जो योगेन्द्र यादव, अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण जैसे चेहरों से प्रभावित होकर पार्टी से जुड़ा.

और अब जैसे-जैसे पार्टी के अनजाने चेहरे सड़कों और टीवी पर मुखर होने लगे, तो उनकी आम बोलचाल और पार्टी के काम करने की अलग शैली से यही तबका शायद ठगा महसूस करने लगा.

शायद वो 72 साल के ऐडवोकेट यू डी सिंह जैसे लोगों की ओर इशारा कर रहे हैं. मैं उनसे मिली नई दिल्ली क्षेत्र के समृद्ध इलाके जंगपुरा में.

नाराज़गी से भरे लहज़े में उन्होंने कहा, “आम आदमी पार्टी को मैंने वोट दिया था लेकिन अब नहीं दूंगा. जिस तरीके से ये लोग बात कर रहे हैं, जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, फिर क्या फर्क है मुझे इससे बेहतर की उम्मीद थी.”

पर यहां भी विचारों में इत्तफ़ाक नहीं है. सिंह साहब से बात ख़त्म ही की थी कि तीन साल की अपनी बेटी के साथ सफेद रंग की चमचमाती होंडा गाड़ी का दरवाज़ा खोलतीं प्रिया टंडन दिखीं.

उथल-पुथल

प्रिया के मुताबिक सड़क पर प्रदर्शन सही नहीं है क्योंकि आम लोगों के लिए वास्तविक नहीं है कि अपनी बात रखने के लिए वे हमेशा सड़कों पर उतर पाए.

उनका कहना था कि अदालतों और सरकारी तंत्र को ज़्यादा मज़बूत करने की कोशिश होनी चाहिए. जिससे वे दुरुस्त तरीके से काम करें और वो रास्ता अपनाने से काम हो पाएं.

फिर रुकीं, और बहुत सोचकर बोलीं, “मैंने आम आदमी पार्टी को वोट नहीं दिया था, पर मेरे बहुत से दोस्तों ने दिया था, हम अब बहुत चर्चा करते हैं, और मुझे भी लगता है कि सब बातों के बावजूद ‘आप’ को एक मौका दिया जाना ज़रूरी है.”

तो प्रिया और उर्मिला में उम्मीद, ज़ाकिर और यू डी सिंह में नाराज़गी. मैं जितने लोगों से मिली, उतना उलझती गई. ना समर्थन मध्यम वर्ग या निचले वर्ग के लोगों से जुड़ा था और ना ही विरोध आर्थिक तौर पर समृद्ध लोगों से.

एक उथल-पुथल मिली जो बिल्कुल निजी थी. जोड़ने वाला एक ही धागा था– आम आदमी पार्टी को थोड़ा और समय देने का धैर्य. अब इसे उम्मीद समझिए या कुछ और. मुझे साफ़ लगा कि जनता अभी अपना आखिरी फ़ैसला देने के लिए समय चाहती है.

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