इस मोड़ से आगे किस राह पर 'आप' का सफ़र?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

मंगलवार को जब अरविंद केजरीवाल दिल्ली में धरने पर बैठे थे तो उसी दिन मुंबई में एक आम आदमी से मुंबई महानगर पालिका के अधिकारी ने उसका काम कराने के लिए कथित रूप से रिश्वत की मांग की.

इस आम आदमी ने पैसे दिए लेकिन साथ ही उसका स्टिंग ऑपरेशन भी कर दिया यानी उस पूरी प्रक्रिया को अपने फ़ोन पर रिकॉर्ड कर लिया और बाद में उस अधिकारी की सबूत के साथ शिकायत कर दी. अधिकारी को निलंबित कर दिया गया.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने राज्य के निवासियों से रिश्वत लेने वाले अधिकारियों के ख़िलाफ़ स्टिंग ऑपरेशन करने की सलाह दे रखी है और इसका प्रचार वो एफ़एम रेडियो पर लगातार कर रहे हैं. ऐसा लगता है कि उनकी आवाज़ दिल्ली से बाहर देश के अन्य राज्यों में भी गूँज रही है.

मंगलवार को ही जब अरविंद केजरीवाल के धरने के ख़िलाफ़ मीडिया में आलोचना की जा रही थी तो मुंबई के निकट उल्हासनगर में आम आदमी पार्टी में शामिल होने के लिए लंबी क़तारें लगी थीं. आम आदमी पार्टी का असर राजनीति और राजनेताओं पर भी केजरीवाल के धरने पर बैठने से पहले से ही देखने को मिल रहा है. राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया अब ट्रैफ़िक सिग्नल लाल होने पर रुकने लगी हैं.

सफलता से सबक

अरविंद केजरीवाल के धरने के दौरान सुरक्षा व्यवस्था

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने केजरीवाल की तरह भ्रष्टाचार रिपोर्ट करने के लिए एक हेल्पलाइन स्थापित की है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का वीआईपी काफ़िला अब पहले से आधा हो गया है. यह तर्क दिया जा सकता है कि ये असर सतही हैं और अगर केजरीवाल पूरे सियासी निज़ाम को बदलना चाहते हैं तो ये काफ़ी नहीं होगा. लेकिन इस सतह के अंदर तो गहरा परिवर्तन भी महसूस किया जा सकता है.

भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने हाल में कहा कि उनकी पार्टी के स्वयंसेवक या वालंटियर्स आम आदमी से संपर्क जोड़ने के लिए घर-घर जाएंगे. यहाँ तक कि वरिष्ठ पार्टी नेता अरुण जेटली और कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी स्वीकार कर चुके हैं कि आम आदमी की सफलता से सबक़ सीखा जा सकता है. भाजपा और कांग्रेस के खेमों से ये खबर आ रही है कि वो आने वाले आम चुनाव में ऐसे उमीदवार खड़े करेंगे जो दागदार न हों.

वो कई सीटों पर पुराने घिसे पिटे चेहरों की जगह आम आदमी को भी टिकट देने की सोच रहे हैं. आम आदमी पार्टी के असर को काटने के लिए वो स्वच्छ और संवेदनशील नेताओं को आगे बढ़ने की भी कोशिश कर रहे हैं. दिल्ली चुनाव से पहले इन दोनों पार्टियों के चुनावी मुद्दे प्रगति, सुशासन और आर्थिक समृद्धि जैसे नारों पर आधारित थे जो आम जनता को लुभाने में नाकाम रही थीं.

पारंपरिक राजनीति

आम आदमी पार्टी के समर्थक

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हाँ, ये सही है कि नरेंद्र मोदी का सुशासन का नारा शक्तिशाली था जिसके कारण उनका सितारा काफ़ी बुलंद रहा. लेकिन शहरों और देहातों में रहने वाला आम आदमी ग़रीबी, भ्रष्टाचार और ख़राब प्रशासन से तंग आ चुका है और उसके लिए ये मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण थे जिसे केजरीवाल सही से समझ सके. इसी कारण उन्हें अनपेक्षित रूप से कामयाबी मिली.

धरना देने के लिए की जा रही आलोचनाओँ से आम आदमी पार्टी की छवि पर सवालिया निशान ज़रूर लगे हैं लेकिन केजरीवाल अंदर ही अंदर संतुष्ट होंगे कि उनका उद्देश पूरा हो रहा है. केजरीवाल जिस तरीके की राजनीति कर रहे हैं, उसे लेकर देश भर में चर्चा हो रही है. ये स्वाभाविक भी है क्यूं कि इससे पहले इस तरह की राजनीति किसी ने नहीं की और न किसी ने देखी.

अराजकतावादी कहलाने वाले केजरीवाल अपने साथियों और समर्थकों के बीच आंदोलनकारी समझे जाते हैं. उनके क़रीब के लोग कहते हैं कि वो भ्रष्ट पारंपरिक राजनीति को देश भर में बदलना चाहते हैं. लोकतंत्र को संवेदनशील और सहभागितापूर्ण बनाना चाहते हैं. इसके लिए उन्हें और भी अधिक सियासी शक्ति चाहिए जिसके लिए उन्हें आम चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करना होगा.

'नाटक' और परिवर्तन

आम आदमी पार्टी के समर्थक

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अगर उन्हें 30 से 40 सीटें मिलती हैं तो वो सियासी प्रणाली में परिवर्तन के एजेंट बन सकते हैं लेकिन अगर वो 10 सीटें या इससे थोड़ा कम या अधिक सीटें हासिल करते हैं तो वो बिलकुल भी प्रभावशाली नहीं हो सकते. अगर उनका उद्देश्य सियासी निज़ाम में सम्पूर्ण परिवर्तन लाना है तो वो समझते हैं कि आंदोलनकारी बन कर ही वो लोकसभा चुनाव में अधिक से अधिक सीटें ला सकते हैं.

और इसी लिए अगर वो मीडिया की नज़र में दोबारा से कोई और 'नाटक' करते हैं तो इस पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए. इस बात पर भी ताजुब नहीं होना चाहिए कि कोई ग़ैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री किसी मुद्दे पर धरना दे डाले. केजरीवाल आम चुनाव में कामयाब हों या न हों देश की सियासी प्रणाली को थोड़ा बहुत हिलाने में सफल ज़रूर हुए हैं. लेकिन उनकी नज़र में उनका ये उद्देश अभी अधूरा है.

अब देखना ये है कि क्या वो अपना ये उद्देश पूरा कर पाते हैं और अगर कर पाते हैं तो ये सम्पूर्ण परिवर्तन लम्बे समय तक प्रभावी साबित होता है या नहीं.

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