'आप का असली इम्तिहान आम चुनावों के बाद'

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल

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    • Author, सतीश मिश्रा
    • पदनाम, सीनियर फ़ेलो, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन

दिसंबर 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी (आप) के अविश्वसनीय प्रदर्शन और फिर उसकी सरकार बनने के बाद से पार्टी की सदस्यता तेज़ी से बढ़ रही है.

इनमें से बहुत से आम और कुछ जाने-माने नागरिक शामिल हैं.

हाल ही में पार्टी ने घोषणा की थी कि वो आने वाले में 100 से ज़्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करेगी. इसके बाद आम आदमी पार्टी से अलग-अलग पृष्ठभूमि और विचारधाराओं वाली कई जानी-मानी हस्तियां जुड़ी हैं.

अपनी प्रशासनिक और सरकार चलाने की क्षमता मज़बूत या साबित करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलने के बावजूद पार्टी को अपने विस्तार का फ़ैसला लेना पड़ा.

सोमवार को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व कार्डधारक कमल मित्र चिनॉय 'आप' में शामिल हुए जबकि सामाजिक कार्यकर्ता और नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर ने आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया है.

आम आदमी पार्टी के नए सदस्यों में सभी तरह की राजनीतिक विचारधाराएं, विविधताएं और विरोधाभास मिलेंगे.

संक्षेप में कहें तो विस्तार के इस चरण में पार्टी को विभिन्न विचारधाराओं और राजनीतिक सोच वाले लोगों से परहेज़ नहीं है. उसकी एकमात्र शर्त ईमानदारी हो सकती है. पार्टी नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी कहते हैं कि सभी सही और ईमानदार लोग पार्टी में आमंत्रित हैं.

लेकिन इन सदस्यों की ईमानदारी का फ़ैसला कैसे होगा, आने वाले महीनों और सालों में पार्टी के लिए इस सवाल का जवाब देना आसान नहीं होगा.

मुश्किल हालात में आपसी टक्कर

आशुतोष, पूर्व पत्रकार, आम आदमी पार्टी नेता

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इमेज कैप्शन, पूर्व पत्रकार आशुतोष आम आदमी पार्टी से जुड़ गए हैं.

साथ ही इस तरह की विरोधाभासी विचारधाराओं के लोगों का पार्टी में शामिल होना भविष्य में आम आदमी पार्टी के लिए गले में फंसी हड्डी साबित हो सकता है क्योंकि उसके कई मौजूदा और भविष्य के नेताओं के अहं मुश्किल हालात में आपस में टकराएंगे.

अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार बने तीन हफ़्ते हुए हैं. इस दौरान पार्टी अपने घोषणापत्र में किए गए वादों को पूरा करने की कोशिश कर रही है.

पार्टी ने पूर्व कांग्रेस सरकार का मल्टी-ब्रांड खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेश निवेश (एफ़डीआई) को मंज़ूरी देने का फ़ैसला वापस लेने का अपना वादा पूरा कर दिया है.

इस फ़ैसले की घोषणा करते हुए अरविंद केजरीवाल ने कहा, "आम आदमी पार्टी एफ़डीआई के ख़िलाफ़ नहीं है. हमारे पास मौजूद जानकारी से साफ़ है कि खुदरा में एफ़डीआई से उपभोक्ताओं को ज़्यादा विकल्प तो मिलते हैं लेकिन साथ ही व्यापक स्तर पर इससे बेरोज़गारी बढ़ती है."

फ़ैसले पर सवाल

आम आदमी पार्टी

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इमेज कैप्शन, आम आदमी पार्टी ने प्रति परिवार हर दिन 700 लीटर मुफ़्त पानी देने का वादा किया था.

वहीं दिल्ली जल बोर्ड के 800 अधिकारियों के स्थानांतरण के दिल्ली के मुख्यमंत्री के फ़ैसले पर सवाल उठाए जा सकते हैं क्योंकि एक ही संस्था में फेरबदल किसी समस्या का हल नहीं है.

अरविंद केजरीवाल दिल्ली के ज़रूरतमंद लोगों को कम दाम पर बिजली देना चाहते हैं और इसके लिए उन्हें कांग्रेस के समर्थन की ज़रूरत होगी.

सब्सिडी देना आसान काम है लेकिन सब्सिडी बिल की भरपाई करना और उसके लिए पैसा जुटाना ज़्यादा मुश्किल काम होगा. ऐसे में सरकार अगर टैक्स लगाएगी तो ये भी लोगों को नाग़वार गुज़रेगा.

मुख्यमंत्री ने लोगों की समस्याएं सुनने के लिए हर शनिवार जनता दरबार लगाने की बात कही थी. लेकिन पहले ही जनता दरबार में मची हड़बड़ी और अफ़रातफ़री के माहौल के चलते सरकार को ये फैसला रद्द करना पड़ा. लेकिन तुरंत सरकार ने इसके लिए फोन कॉल, एसएमएस, शिक़ायत पत्र और इंटरनेट की राह चुन ली.

लेकिन ऐसा लगता है कि शायद आम आदमी पार्टी ने अपनी अधिकतर नीतियां बिना ठीक से विचार और अध्ययन के बनाई हैं. चुनाव घोषणापत्र और वादे, चुनाव के नतीजों को ध्यान में रख कर किए गए थे. लेकिन पार्टी को इस तरह के नतीजों की उम्मीद शायद कतई नहीं थी.

भविष्य की योजना

अरविंद केजरीवाल

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इमेज कैप्शन, अरविंद केजरीवाल ने शीला दीक्षित को नई दिल्ली सीट से विधानसभा चुनाव में हराया था.

पार्टी के पास इन मामलों पर ग़ौर करने का समय नहीं था इसलिए उसने आने वाले कुछ दिनों या लंबे भविष्य के लिए शायद कोई योजना नहीं बनाई.

जैसे-जैसे कोई समस्या सामने आ रही है, पार्टी उस पर निर्णय ले रही है. लेकिन इन तरीकों से लंबे समय के लिए समस्याओं से नहीं निपटा जा सकता.

सरकार चलाने की ज़िम्मेदारी और बोझ आम आदमी पार्टी को ज़्यादा व्यावहारिक और राजनीतिक रूप से ज़्यादा समझदार बनाएगा या नहीं, इस सवाल का जवाब देना मुश्किल है. लेकिन ये तय है कि अगर पार्टी लंबे समय तक राजनीति में रहना चाहती है तो उसे अपने सदस्यों और नीतियों में कुछ मूलभूत विरोधाभासों को सुलझाना होगा.

अच्छी बात ये है कि आम चुनाव में इतना कम समय रह गया है कि लोगों के पास आम आदमी पार्टी के नेताओं और नीतियों से नाख़ुश या निराश होने या फिर उन पर बहुत ज़्यादा समीक्षा के लिए बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं होगा.

फ़िलहाल आम आदमी पार्टी किसी भी नई पार्टी की तरह विकास से जुड़ी समस्याओं से जूझ रही है. आने वाले महीनों में जब लोकसभा चुनाव का ख़ुमार उतर चुका होगा, तब पार्टी का इम्तिहान शुरु होगा और तब उसे असली और चुनौतीपूर्ण मुद्दों से निपटना होगा.

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