अभी तो शुरू हुई है ‘आप’ की परीक्षा

    • Author, प्रमोद जोशी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

इस बात को लेकर संशय नहीं कि दिल्ली की सरकार अपना बहुमत आसानी से साबित करेगी. मेट्रो यात्रा, लालबत्ती का तिरस्कार, मुफ़्त पानी और सस्ती बिजली, मीटरों और खातों की जाँच और विश्वासमत के आगे अब क्या?

कांग्रेस, ‘आप’ और भाजपा के ‘प्रेम-घृणा और ईर्ष्या की इस त्रिकोण कथा’ का पहला अध्याय प्रतीकों को समर्पित रहा. इस दौरान राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने ‘आप’ के उदय को क्रांतिकारी घटना के रूप में देखा. अब उसका उस अग्निपरीक्षा से सामना है, जिसे उसने खुद चुना है.

‘आप’ की ओर से बार-बार कहा गया कि हम सरकार बनाने के इच्छुक नहीं हैं. हमने किसी से समर्थन नहीं माँगा. जनता ने सरकार बनाने का आदेश दिया. हम अपना काम कर रहे हैं.

मुरव्वत का दौर खत्म

तीनों पार्टियाँ अब अपने कदम तौल रही हैं. भारतीय जनता पार्टी ने ‘आप’ और कांग्रेस पर एक साथ हमला बोला है और दोनों के बीच साठ-गांठ साबित करने की कोशिश की है.

विश्वासमत पर बहस के दौरान भाजपा विधायक दल के नेता हर्षवर्धन ने ‘आप’ के पहले दोनों फैसलों की आलोचना के साथ-साथ पार्टी की फंडिंग और दूसरे मसले भी उठाए. यानी ‘आप’ के प्रति बरती जा रही जो भी मुरव्वत थी वह ख़त्म.

कांग्रेस ने ‘आप’ सरकार को समर्थन देने का फ़ैसला जिस इरादे से किया था, वह पूरा नहीं हुआ. बल्कि पार्टी ने खुद को फँसा लिया है. ‘आप’ की अनुभवहीनता से विचलित होने के बजाय उसकी ‘प्रतीकात्मकता’ को जनता ने पसंद किया है.

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फैसलों में इतनी तेज़ी क्यों?

केजरीवाल सरकार ने जिस तेज़ी से शुरुआती फैसले किए हैं, उसके निहितार्थ को भी समझना चाहिए. ये फैसले विश्वासमत हासिल करने के बाद भी किए जा सकते थे. विश्वासमत गुरुवार को था, पर अरविंद केजरीवाल ने मंगलवार को कहा कि मेरे पास केवल 48 घंटे का समय है क्योंकि बीजेपी और कांग्रेस में तमाम तरह की अटकलें चल रहीं हैं.

पानी और बिजली के फैसले हो जाने के बाद अब कांग्रेस के पास ‘आप’ सरकार को विश्वासमत दिलाने के अलावा दूसरा चारा नहीं था. पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ने बिजली-पानी के फैसलों को लेकर ही सरकार को आड़े हाथ लिया. ये फैसले न हुए होते तो शायद विश्वास मत हासिल करने की बहस इतनी सरगर्म न होती.

पर ‘आप’ की सरकार केवल पानी और बिजली के मुद्दे पर जीतकर नहीं आई है. तो क्या उसका उद्देश्य पूरा हो गया? कांग्रेस और भाजपा का कहना है कि कुछ लोगों को मुफ्त देने से पहले सबको पानी मुहैया कराने की कोशिश होनी चाहिए थी.

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क्या होमवर्क पक्का है?

सवाल है कि क्या ‘आप’ ने पूरे होमवर्क के साथ फैसले नहीं किए? क्या सब्सिडी देकर बिजली सस्ती करना उसका उद्देश्य था? क्या उसका उद्देश्य व्यवस्था की भूल-भुलैया को सुलझाना नहीं है?

भाजपा नेता अरुण जेटली ने कहा कि इस फैसले ने दिल्ली की आबादी को चार भागों में बांट दिया है. तीन हिस्से को कोई लाभ नहीं मिलेगा. चूंकि मुफ़्त पानी सिर्फ मीटर वाले घरों के लिए है लिहाजा बड़ी आबादी, जहां पानी का पाइप ही नहीं है, वह इस योजना से बाहर है. जिनके मीटर खराब हैं उन्हें लाभ नहीं मिलेगा. जो 20 हजार लीटर से ज्यादा खर्च करते हैं, उन्हें दस फीसद बढ़ोत्तरी के साथ बिल चुकाना पड़ेगा. मुफ्त पानी का तोहफा एक छोटे वर्ग के लिए है. खामियाजा बाकी लोगों को भुगतना होगा.

कांग्रेस के सांसद संदीप दीक्षित ने कहा, "सरकार को पहले उन घरों तक पानी पहुंचाने के बारे में सोचना चाहिए, जिन्हें पानी मिल ही नहीं रहा है." उन्होंने कहा कि सब्सिडी का बोझ जनता के ही सिर जाता है. सरकार टैक्स के माध्यम से जनता से ही धन वसूलती है. आर्थिक रूप से मजबूत संस्था ही विस्तार का काम कर सकती है.

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ऑडिट में कानूनी दिक्कतें

‘आप’ सरकार के 18 में से 16 मसलों पर शुरुआती फैसले हुए हैं. सरकार को अभी जनलोकपाल के मसले पर कदम उठाना होगा. व्यावहारिक रूप से यह अभी संभव नहीं लगता.

बिजली कंपनियों के ऑडिट में कानूनी दिक्कतें पेश आएंगी. ‘आप’ की रिसर्च टीम को भी इस फ़ैसले से कुछ ख़ास हासिल होने की उम्मीद नहीं है. यह ऑडिट काफी बड़े स्तर पर होगा तभी कुछ बातें साफ हो सकेंगी. बिजली सप्लाई की लंबी चेन है. इसमें कई सतहों पर जाँच करानी होगी.

दिल्ली में ‘आप’ सरकार अनायास आई है. उसकी तारीफ उसके काम से नहीं उसके इरादों को लेकर हो रही है. 500 नए स्कूल या अनियमित कॉलोनियों को नियमित करना और उनके लिए 18000 किलोमीटर की नई सीवर लाइनों का इंतज़ाम दो दिन में नहीं हो सकता. खासतौर से तब जब केंद्र में बैठी सरकार ‘आप’ की न हो.

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जनता कब तक साथ देगी?

‘आप’ ने देश में नई राजनीति के आगमन की घोषणा जरूर की है. एक नई राजनीतिक संरचना की जरूरत को उसने रेखांकित किया. लोकतंत्र को बुनियादी स्तर तक लाने का रास्ता भी बताया है. पर यह काम वह ख़ुद करने की स्थिति में नहीं है. अभी जनता भी उन्हें देख ही रही है. उसके नैतिक दबाव का असर कांग्रेस और भाजपा पर भी पड़ा है. उनके भीतर भी सुधार की बातें चल रहीं हैं.

जिस वक्त दिल्ली विधानसभा में ‘आप’ सरकार के विश्वासमत पर बहस चल रही थी उसी वक्त यह खबर आई कि महाराष्ट्र सरकार ने आदर्श मामले की जाँच रपट को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया है. यह ‘आप’ परिघटना की देन है.

दिल्ली में यह सरकार कब तक रहेगी, दिल्ली के बाद क्या करेगी और क्या यह कोई राष्ट्रीय शक्ति बनकर उभरेगी, यह सब बातें बाद की हैं. फिलहाल उसे दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था को रास्ते पर लाना है. यहाँ से कोई पगडंडी भी निकली तो वह देखते-देखते राजमार्ग बन जाएगी.

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