ये हैं कानपुर के स्पेशल ट्रैफ़िक वार्डन

- Author, रोहित घोष
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए कानपुर से
विजय नगर चौराहा कानपुर के व्यस्त चौराहों में से एक है. दिन के 12 बजे हैं और चौराहे पर गाड़ियों का हुजूम है.
ट्रैफिक लाइट लाल होने पर गाड़ियों के ब्रेक तो लग जाते हैं लेकिन किसी में भी रुकने का सब्र नहीं है. लोग धीरे-धीरे अपनी गाड़ियां आगे सरका रहे हैं.
तभी चौराहे पर तैनात उषा अपनी सीटी बजाती हैं और लोगों को रुकने का इशारा करती हैं. गाड़ियां रुक जाती हैं.
उषा स्पेशल ट्रैफिक वार्डन हैं और पिछले तीन महीनों से वह चौराहे पर खड़ी होकर ट्रैफिक पुलिस सिपाहियों की ट्रैफिक को व्यवस्थित करने में मदद कर रही हैं.
इस समय करीब 200 विकलांग कानपुर के कई चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस की मदद ट्रैफिक को नियमित रूप से चलाने में कर रहे हैं.
तीन महीने पहले तक उषा भीख मांग कर अपना और अपने तीन बच्चों का भरण-पोषण करती थीं.
उनके जीवन में यह बदलाव विकलांगों के लिए काम कर रहे एक सामाजिक संस्थान और कानपुर ट्रैफिक पुलिस की वजह से आया है.
नई जिम्मेदारी

विकलांग एसोसिएशन के अध्यक्ष वीरेंद्र कुमार कहते हैं, ''अमूमन देखा गया है कि ग़रीब विकलांग लोग चौराहों पर भीख मांग कर अपना जीवन यापन करते हैं. वे असहाय और लाचार माने जाते हैं. मैंने सोचा कि क्यों न इन्हें चौराहों पर ही एक नई ज़िम्मेदारी दी जाए?"
वीरेंद्र कुमार ने एक प्रस्ताव बनाया जिसके अनुसार विकलांग व्यक्तियों को ट्रैफिक पुलिस की मदद के लिए चौराहों पर लगाया जाना था.
कानपुर की आबादी करीब 35 लाख है. आबादी के बढ़ने के साथ साथ यहाँ वाहनों की संख्या भी बढ़ रही है. कानपुर में करीब पांच लाख चार पहिया और 11 लाख दो पहिया वाहन हैं. शहर में रोज़ करीब 250 गाड़ियों का पंजीकरण होता है. ट्रैफिक पुलिस की भारी कमी है. ट्रैफिक व्यवस्था चरमरा चुकी है. ऐसे में करीब 200 विकलांग लोग ट्रैफिक सँभालने में एक अहम भूमिका निभा सकते थे .
उन्होंने यह प्रस्ताव कानपुर के सर्किल ऑफिसर (ट्रैफिक पुलिस) राकेश नायक के सामने रखा. पुलिस को प्रस्ताव अच्छा लगा और फिर उसे अमली जामा पहनाया गया.
वीरेंद्र कुमार के साथ कई विकलांग जुड़े हैं, उनमें से 200 लोगों का चयन किया गया और उन्हें यातायात और यातायात पुलिस के सभी नियमों की जानकारी दी गई.
ट्रेनिंग और वर्दी

इन सभी लोगों को डेढ़ महीने ट्रेनिंग दे कर सिखाया गया कि ट्रैफिक को कैसे नियंत्रित करें. और फिर उन 200 लोगों को सफ़ेद वर्दी पहना कर, सीटी और पब्लिक एड्रेस सिस्टम से लैस कर के चौराहों पर तैनात कर दिया गया.
इन्हें नाम दिया गया स्पेशल ट्रैफिक वार्डन. हर स्पेशल ट्रैफिक वार्डन का भत्ता 2000 रुपए प्रति माह तय किया गया.
लेकिन सवाल आया कि 200 लोगों को भत्ता कौन देगा? पुलिस विभाग में ऐसी कोई व्यवस्था है नहीं. तब राकेश कुमार नायक और वीरेंद्र कुमार कानपुर के व्यापारियों और नामी-गिरामी लोगों से मिले और उन्हें भत्ते का स्रोत मिल गया.
उषा भी उन 200 लोगों में से एक थीं. उनके चेहरे पर गहरी झुर्रियां हैं और बाल सफ़ेद हो चुके हैं.
उषा के पति रमेश रिक्शा चला कर परिवार पालते थे. एक साल पहले बीमारी के कारण रमेश ने बिस्तर से उठना बंद कर दिया.
परिवार पालने और रमेश के इलाज की ज़िम्मेदारियाँ उषा पर आ गई. उन्होंने काम ढूंढने की कोशिश की लेकिन बायां हाथ काम न करने की वजह से उषा को कहीं काम नहीं मिला.
भीख

उषा कहती हैं कि उनकी शादी के कुछ सालों बाद उन्हें बुखार आया. सुबह सो कर उठी तो पता चला कि बायां हाथ काम नहीं कर रहा है.
पैसे कमाने का उषा को एक ही रास्ता दिखा. उषा ने अपनी बेटी के साथ घर के पास चौराहों और गुरुद्वारों पर भीख माँगना शुरू कर दिया.
वह कहती हैं, "गलत काम करने से भीख मांगना अच्छा है." आस-पड़ोस के लोगों से वह कहती थीं कि वह काम करने लगी हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "मांग कर 100-150 रूपए मिल जाते थे. पति के इलाज में करीब 100 रूपए खर्च हो जाते थे पर वह काफी नहीं था."
अगस्त में उषा के पति रमेश की मौत हो गई. उषा को लगा कि उन्हें अपने दो बेटों और एक बेटी को पालने के लिए जीवन भर भीख माँगनी पड़ेगी लेकिन आज ऐसा नहीं है.
उन्हें अब हर महीने 2000 रूपए मिलते हैं पर उषा के लिए इससे बड़ी बात यह है कि अब वह इज़्ज़त से पैसे कमा रही हैं. वह कहती हैं, "अब किसी से झूठ बोलने की ज़रूरत नहीं कि मैं क्या काम करती हूँ."
काम से खुश
कानपुर के काकादेव इलाके में एक झोपड़ी में रहने वाली उषा अब हर सुबह ठीक 9.30 बजे करीब तीन किलोमीटर दूर विजय नगर चौराहे पर पहुँच जाती हैं और वहाँ शाम 5.30 बजे तक रहती हैं.
वह कहती हैं कि चौराहों पर लोग पहले उनकी बात सुनते नहीं थे.
उषा ने बीबीसी को बताया, "मैं लोगों को रुकने का इशारा करती थी पर वह रुकते नहीं थे. पर जब लोगों ने देखा कि ट्रैफिक पुलिस वाले हमारे साथ हैं तो उन्होंने हमारी बात माननी शुरू कर दी."
उषा ने अपना एक बैंक अकाउंट खोल लिया है. वो कहती हैं, "भत्ते का पैसा उस अकाउंट में आ जाता है."
वीरेंद्र कुमार ने बीबीसी को बताया, "लोग पूछते हैं कि विकलांग क्या काम कर सकते हैं? लोग सोचते हैं कि ग़रीब विकलांग दूसरों के सहारे या भीख मांग कर ही जी सकते हैं. हमने लोगों को जवाब दे दिया है."
वे चाहते हैं कि जो पहल कानपुर में हुई है उसे उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे देश में अपनाया जाए.
वे कहते हैं, "आज कानपुर के 200 विकलांग अपने पैरों पर खड़े हैं और सिर उठा के जी रहे हैं. ऐसा पूरे देश में संभव हो सकता है."
राकेश कुमार नायक भी अपने 200 'सिपाहियों' के काम से खुश हैं.
राकेश नायक कहते हैं, "बचपन से मेरी इच्छा थी कि समाज में मुख्य धारा से अलग समझे जाने वाले लोगों को भी बराबर का सम्मान पाने का मौका मिलना चाहिए. यही सोचकर मैंने इस मुहिम की शुरुआत की है."
200 विकलांग लोगों के लिए नायक वाकई एक नायक साबित हुए हैं.
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