वह शख़्स जिसने अफ़गानों को चलना सिखलाया

अफगानिस्तान एक ऐसा देश जहां दशकों लंबे चले युद्ध ने लगभग हजारों लोगों को अपाहिज बना दिया.लेकिन एक फिजियोथेरेपिस्ट की लगन और मेहनत से वे लोग न केवल सामान्य जिंदगी बसर कर रहे हैं बल्कि रोजी-रोटी भी कमा रहे हैं.
ये <link type="page"><caption> कमाल के शख्स</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/05/130522_1st_disable_woman_on_everest_rd.shtml" platform="highweb"/></link> हैं, इतालवी फिजियोथेरेपिस्ट अल्बर्ट कायरो. पिछले 20 सालों से युद्ध के कारण शरीर का कोई न कोई अंग खो चुके अफगान के लोगों को कायरो बनावटी अंग लगाकर उन्हें मुख्यधारा में वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं.
अल्बर्ट कायरो साल 1990 में अफगानिस्तान पहुंचे. उस समय 1990 के दशक में अमरीका-अफगान युद्ध की समाप्ति के बाद सोवियत सेना अफगानिस्तान से वापसी की थी.
युद्ध के दौरान बारूदी सुरंगों के फटने से हजारों की संख्या में लोग अपाहिज हो चुके थे. वे उनके लिए बनावटी अंग बनाने में जुट गए.
देश के अलग अगल इलाकों में रेड क्रॉस के सात <link type="page"><caption> कृत्रिम अंग</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/11/131130_technology_for_disabled_rd.shtml" platform="highweb"/></link> लगाने के केंद्र मौजूद थे. अल्बर्ट रेड क्रॉस के लिए काम कर रहे थे.
'फिजियोथेरेपी' शब्द सुना भी नहीं था

एक बार स्कूल की तरफ से हमें वृद्धाश्रम ले जाया गया. वहां देखा कि नर्स बड़ी होशियारी से बुजुर्गों के साथ कुछ ऐसी गतिविधि कर रही थीं कि जिससे वे उठ कर चलने लगते थे.
तब मैंने फिजियोथेरेपी शब्द सुना तक नहीं था. मैंने बड़े अचरज से पूछा कि ये क्या है. मुझे बताया गया कि इसे फिजियोथेरेपी कहते हैं.
मैं इससे इतना प्रभावित हुआ कि तुरंत बाजार जाकर इसकी किताबें खरीद लाया और सब चट कर गया.
28 साल में जूनियर वकील की नौकरी छोड़ कर वापस पढ़ाई शुरू की. चार साल फिजियोथेरेपी का कोर्स किया. घूम घूम कर ट्रेनिंग ली. दक्षिणी सूडान में 3 साल काम करने के बाद ये मेरा मिशन बन गया.
मैंने 'इंटरनेशनल कमिटी ऑफ द रेड क्रॉस' में आवेदन भेजा.
मुझे रेड क्रॉस की ओर से अफगानिस्तान भेजा गया. वहां मुजाहिद्दिनों का संघर्ष चल रहा था. साल 1992 में वहां गृहयुद्ध फूट पड़ा था. काबुल में आए दिन झड़पें और संघर्ष होते रहते थे.
इन संघर्षों के कारण मुझे कई बार अपना सेंटर बंद कर देना पड़ता था जहां मैं लोगों को बनावटी पांव लगाया करता था.
एक समय ऐसा आया कि रेड क्रॉस ने अपने पुनर्वास केंद्रों को बंद कर दिया. मैं भी रेड क्रॉस की नीति का पालन करते हुए दूसरे तरह के कामों में लग गया.
अगर मखदूम नहीं मिलता

तभी मेरी मुठभेड़ मखमूद नाम के एक व्यक्ति से हुई जिसने मेरा नजरिया बदल दिया.
जबरदस्त विस्फोट हुआ था. सड़कों से लोग गायब हो गए थे. तभी मैंने देखा कि सड़क के बीचों बीच एक व्यक्ति व्हीलचेयर पर मौजूद था.
उसकी व्हीलचेयर एक गड्ढे में फंस गई थी. हालांकि मैं बहुत बहादुर नहीं था फिर भी मैंने उसकी मदद करने उसके पास पहुंचा.
उससे पूछा कि उसने बनावटी अंग क्यों नहीं लगवाए. उस आदमी के दोनों पांव और एक हाथ नहीं थे.
उसने कहा कि रेड क्रॉस बंद हो गया है. मैंने कहा, मैं तुम्हारी मदद करुंगा. अगले दिन बनावटी अंग लगवाने के लिए तड़के सुबह सेंटर पर न केवल मखदूम आया बल्कि उनके साथ 20-30 और लोग आए थे.
यदि जीवन के उस मोड़ पर मुझे मखदूम नहीं मिलता तो शायद मैं रेड क्रॉस की दूसरी तरह की सेवाओं में लगा होता.
वो एक ही हफ्ते में बनावटी पांव बनाने में अच्छा काम करने लगा. तब मुझे लगा कि कोई अपंग व्यक्ति भी मौका दिए जाने पर खुद को साबित कर सकता है.
सकारात्मक भेदभाव

इसके बाद मैंने तय किया कि हमारे सेंटर में केवल शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को ही काम पर रखा जाएगा. यानि हमने सकारात्मक भेदभाव की नीति अपनाई. मखदूम और उसके जैसे कई अपाहिज लोगों को मैंने अपने सेंटर में काम दिया.
अफगानिस्तान के अलग अलग आर्थोपेडिक सेंटर में करीब 600 लोग काम कर रहे हैं. इनमें से 95 फीसदी लोग पहले से किसी न किसी रुप में हमारे मरीज रह चुके हैं.
मेरे सेंटर ने व्हीलचेयर बास्केटबाल टीम भी बनाई है. जिम्नाजियम बन चुका है और हम कुछ ही दिनों में ही ट्रेनिंग और मुकाबला शुरू करने वाले हैं.
ये शारीरिक पुनर्वास और सामादिक समन्वय का अनोखा संगम है.
(बीबीसी आउटलुक सीरिज पर आधारित)
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