मुज़फ़्फ़रनगर: इस मोड़ के आगे की चुनौतियां...

- Author, स्वाति बक्शी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुज़फ़्फ़रनगर
मुज़फ़्फ़रनगर के गाँवों से उपजे दंगे ने जिस तरह व्यापक रूप लिया और बड़ी संख्या में लोग उससे प्रभावित हुए, यह एक अचानक हुई घटना नहीं है.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस इलाक़े के सामाजिक ताने-बाने में ताक़त का जातिगत संतुलन जिस तरह से बदला है उसका ये रूप इस तरह सामने आएगा इसके बारे में भनक किसे थी?
विश्लेषक कहते हैं कि जाटवों और जाटों के बीच जो समीकरण थे उनमें जाटवों की जगह मुसलमानों ने ले ली है और 2002 के गुजरात दंगों का असर उनकी सोच और प्रतिक्रिया पर हुआ है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता.
किसने किसे मारा, किसने हमला पहले किया, कौन ज़िम्मेदार है और इस सारे परिदृश्य का राजनीतिक नफ़ा-नुकसान किसे होगा ये सवाल राजनीतिक विश्लेषक सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं. मुसलमान वोट किस पार्टी की तरफ़ झुकेगा या नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के लिए इसके क्या मायने होंगे?
संकट

2014 के लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र इसके सियासी ऐंगल तो ढूंढे जा रहे हैं लेकिन शायद ये समझना भी ज़रूरी है कि एक समाज के तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जो बदलाव नज़र आ रहा है उसे सिर्फ़ एक तात्कालिक परिस्थिति मानकर आगे बढ़ा नहीं जा सकता.
वर्तमान संकट अपना घर छोड़ आए लोगों को राहत पहुंचाने का है ताकि उनकी ज़िंदगी वापस पटरी पर आ सके लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में जो अविश्वास लोगों के दिलों में नज़र आ रहा है वो एक बेहद संवेदनशील स्थिति की ओर इशारा है.
गांवों से लोगों का जान बचाकर भागना और फिर कैंपों से वापस लौटने की बात का ज़बरदस्त प्रतिरोध क्या सिर्फ़ वक्त के साथ भर जाने वाले घाव हैं?
कुटबा गांव में जहां मुसलमानों के घर ख़ाली पड़े हैं वहां जाट समुदाय से हुई हमारी बातचीत में उनका कहना था कि उजड़े सिर्फ़ वो लोग नहीं हैं. पूरा गांव उजड़ा है क्योंकि उनके जाने से गांव की अर्थव्यवस्था के तमाम पहलुओं पर असर पड़ा है.
गांव से जाने वाले ज़्यादातर लोग या तो खेतों में काम करते थे या उससे जुड़ी दूसरी सेवाएं देते थे और उनके जाने से ढांचा हिलने लगा.
सवाल ये है कि एक आर्थिक-सामाजिक ढांचे की इकाइयों के जोड़ हिलते हुए दिखाई दें तो इसे समस्या मानकर हल ढूंढ़ा जाए या ये मान लिया जाए कि ये वक्त के साथ ख़ुद ब ख़ुद हल हो जाएगी.
1980 के दशक के बाद इस इलाक़े में इतने व्यापक असर वाले हिंसात्मक दंगे नहीं हुए. अपराधों के मामले में पश्चिमी उत्तर-प्रदेश का स्थान जो भी हो लेकिन आम तौर पर सांप्रदायिक हिंसा यहां के इतिहास का हिस्सा नहीं है.
चुनौती

अब जब ये स्थिति उपजी है तो चुनौती नागरिक समाज, मानवाधिकार संगठनों और पूरे जागरूक समाज की है कि हिंसा और अविश्वास की ये दरारें इतनी ना बढ़ें कि पूरे प्रदेश के सामाजिक राजनीतिक स्वरूप को निर्धारित करने लगें.
दंगे-फ़साद और उसके बाद फैले असंतोष में प्रशासन के प्रति पैदा हुआ अविश्वास साफ़ दिखता है. हर जगह लोग यही कहते हैं कि सरकार उनकी नहीं सुनती, प्रशासन उनका है ही नहीं.
लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ये स्थिति बिल्कुल असहनीय है, जहां लोगों का अपने स्थानीय प्रशासन पर ही बिल्कुल भरोसा ना हो. ऐसे में निहित स्वार्थों से प्रेरित राजनीति का फलना-फूलना लाजमी है जो अंतत: किसी के हक़ में नहीं है क्योंकि वहां मानवीय सरोकारों का अभाव स्पष्ट समझा जा सकता है.
दंगा राहत कैंपों में चार महीने बाद तक पनाह लिए हुए लोगों में जिस तरह से प्रशासन और उसके कामों के प्रति बेहद कड़ा प्रतिरोध लोगों में नज़र आया उसे देखकर ये सवाल उठता है कि आख़िर इस तरह की परिस्थितियों में प्रशासन अपनी भूमिका आगे कैसे देख रहा है ?

क्या सिर्फ़ फ़ाइलों के सहारे कामकाज आगे बढ़ा लेने से लोक-प्रशासन की ज़िम्मेदारी निभ जाएगी ?
डीएम कौशल राज शर्मा ने मेरे इस सवाल के जवाब में कहा ‘‘हमारी चुनौती तो लगातार तबसे बनी हुई है जब से मुज़फ़्फ़रनगर में हिंसा की शुरूआत हुई थी. लोग अगर सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं और उन्हें लगता है कि किसी तरह की कोई दिक़्क़त है तो हम पूरी तरह से ज़िम्मेदारी लेने के लिए भी तैयार हैं. मैं लोगों से बस ये कहना चाहता हूं कि लोगों को उन गांवों की तरफ़ देखना चाहिए जहां से लोग निकले ज़रूर थे लेकिन वापस लौट गए हैं.’’
लोगों की वापसी को चाहे मजबूरी का नाम दिया जाए या फिर विकल्पहीनता का लेकिन ज़रूरत इस बात की है कि इस नाज़ुक सामाजिक मोड़ का इस्तेमाल निहित स्वार्थों और राजनीतिक लाभ की रोटियां सेंकने में ना हो. इसे जीत और हार के सवाल में बदलने की इच्छा रखने वाले लोग हालात को केवल बदतर ही बनाएंगे जिससे किसी का भला होने की उम्मीद नहीं की जा सकती.
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