मुज़फ़्फ़रनगर: घर-बार उजड़ने के बाद अब बच्चों की मौतें

मुज़फ़्फ़रनगर दंगा पीड़ित, बच्चा
    • Author, स्वाति बक्शी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुज़फ़्फ़रनगर

हिंसा की वजह कुछ भी हो लेकिन हिंसा का दर्द झेलने वाले इलाक़ों का इतिहास अगर औरतों और बच्चों की नज़र से लिखा जाए तो वह कहानी होगी बेबस संवेदनाओं और अनकहे दर्द की.

फ़िलहाल इसी अनकहे दर्द को समेटे हैं उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर के कुछ गांवों से उपजे दंगों में बेघर हुई औरतें.

70 बरस की उम्र में घर छोड़कर आई रईसा मुज़फ़्फरनगर के एक कैंप में झुग्गी के बाहर रुआंसी होकर कहती हैं, "हमारा घर जला दिया, हम यहां बाहर पड़े हुए हैं. ये कोई ज़िंदगानी है. हम क्या झुग्गी में मरेंगे?"

सियासत, प्रशासनिक लीपा-पोती और डर के माहौल में घर छोड़कर भागे इन परिवारों ने शिविरों में शरण तो ले ली लेकिन ज़िंदगी बचाने की इस जंग में कई मांएं अपने बच्चे खो चुकी हैं.

मुज़फ़्फ़रनगर के लोई कैंप में हमारी मुलाक़ात हुई सईदा से. वो आठ अगस्त की रात जब बदहवासी में घर से निकलीं तो सात महीने का गर्भ पेट में था.

मुज़फ़्फ़रनगर दंगा पीड़ित, बच्चे

सईदा कहती हैं, "हम खरड़ के रहने वाले हैं. जब मारकाट मची तो हम अपना घर-बार छोड़कर भागे. यहीं कैंप में आकर मेरा बेटा पैदा हुआ. तीन दिन बाद उसे ठंड लग गई. दवा तो ली थी लेकिन वो बच नहीं सका."

मौतें

लोई कैंप में ठंड से सिर्फ़ बच्चों की नहीं बुर्ज़ुगों की भी मौत हुई है लेकिन नज़दीकी ज़िले शामली में लगे मलकपुर कैंप में कहा जा रहा है कि 30 से ज़्यादा बच्चों की जान चली गई.

अफ़साना नाम की एक महिला कैंप में अपनी झुग्गी के बाहर बैठी हैं. आंखों में पानी है और दिल का ग़ुबार फटकर बाहर निकल पड़ता है.

अफ़साना कहती हैं, "मेरा बच्चा चला गया. हमारा घर टूट चुका है. हमारे पास कुछ नहीं है, अब वापस गांव जाने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता."

मुज़फ़्फ़रनगर दंगा पीड़ित, बच्चे

बच्चों की मौत के बारे में सवाल पूछने पर मुज़फ़्फ़रनगर के जिलाधिकारी एम कौशल राज शर्मा कहते हैं, "हमने लोई कैंप की हर झुग्गी का सर्वे कराया था. वहां 76 गर्भवती महिलाएं थीं. हमने हर महिला को सीजीएचएस स्कीम के तहत चल रहे नज़दीकी अस्पताल में प्रसव कराने के लिए कहा लेकिन उन सबने साफ़ इनकार कर दिया."

वो कहते हैं, "इस क़दर विरोध है सरकारी अस्पताल में जाने को लेकर तो बताइए इसका हल क्या हो सकता है? हमने कैंपों में दवाएं पहुंचाने की भी पूरी व्यवस्था कर दी है."

नाज़ुक हालत

मलकपुर कैंप का संयोजन कर रहे गुलशान अहमद एक सवाल उठाते हुए कहते हैं, "क्या इन लोगों को इसलिए मरने दिया जाना चाहिए कि ये ग़रीब है? क्या भारत में ग़रीब और मुसलमान की ज़िंदगी की कोई अहमियत नहीं है?"

अगस्त महीने में मुज़फ़्फ़रनगर के क़व्वाल गांव में तीन युवकों की हत्या के बाद उपजे तनाव ने आस-पास के कई गांवों को अपनी चपेट में ले लिया था. तनाव ने सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया और संघर्ष में 60 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई. तकरीबन 50 हज़ार लोगों ने दहशत में अपना घर छोड़ कर कैंपों की शरण ली.

ग़ैर सरकारी संस्थाओं और स्थानीय लोगों ने मदद तो की लेकिन लोगों के वापिस ना जाने की इच्छा से स्थिति जटिल हो गई.

चार महीने गुज़रने के बाद मुज़्फ्फरनगर प्रशासन का दावा है कि स्थिति सामान्य हो रही है. हालांकि हमने जिन कैंपों का दौरा किया उससे ये स्पष्ट है कि स्थिति पहले जैसी भले ही ना हो लेकिन संतुलन क़ायम करना फ़िलहाल बेहद नाज़ुक है.

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