'क़ानून में परिवर्तन समाज-सरकार का काम'

- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सुप्रीम कोर्ट के परस्पर सहमति से दो वयस्कों द्वारा समलैंगिक यौन संबंध बनाने को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट के 2009 के फैसले को रद्द किए जाने पर देश भर में इस पुराने क़ानून पर एक बार फिर से बहस शुरू हो गई है.
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखा था.
सोनिया गांधी समेत कुछ कांग्रेसी नेताओं ने इस फैसले पर निराशा व्यक्त की है, जबकि सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इस फैसले का समर्थन भी किया है.
इस फैसले पर विपरीत विचारों के बीच ये चर्चा भी कि जा रही है कि धारा 377 जैसे क़ानूनों में परिवर्तन लाने की ज़रूरत है.
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बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर धर्माधिकारी कहते हैं कि "भारत में अधिकतर आपराधिक कानून इंडियन पीनल कोड के हैं, जिन्हें वर्ष 1860 में पारित किया गया था."
उनका कहना है, "अगर क़ानून बदलना था, तो अज़ादी के बाद क्यों नहीं बदला गया?"
समाज और सरकार का काम

जस्टिस धर्माधिकारी इस बात पर जोर देते हैं कि "पुराने क़ानून में परिवर्तन समाज और सरकार का काम है. उनके अनुसार क़ानून बदलने से पहले समाज को बदलने की ज़रूरत है, मानसिकता बदलने की ज़रूरत है."
अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए वो कहते हैं कि कोई भी न्याय में बदलाव नहीं चाहता है, सब अपने पक्ष में फैसला चाहते हैं.
उन्होंने कहा कि "लोग जब न्याय प्रणाली में सुधार या अंग्रेज़ों के ज़माने में बने क़ानून में बदलाव की बात करते हैं, तो असल में वे न्याय में दिलचस्पी नहीं रखते. लोग निर्णय प्रणाली चाहते हैं, न्याय प्रणाली नहीं."
जस्टिस धर्माधिकारी ने कहा कि "ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह के बाद देश सीधा अंग्रेजी शासन में आ गया. देश पर अपनी पकड़ मज़बूत करने के लिए शासन को कड़े क़ानून बनाने पड़े जिनमें छोटे अपराधों के लिए भी कड़ी सज़ाएं रखी गईं."
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इंडियन पीनल कोड 1860 इसी कोशिश का नतीजा था. इसके एक साल बाद इंडियन पुलिस एक्ट पारित किया गया.
इस क़ानून के अंतर्गत स्थानीय पुलिस स्टेशनों के इंस्पेक्टर तक को अभियुक्तों के घरों की तलाशी से लेकर उसकी गिरफ़्तारी के अधिकार दिए गए.
वे कहते हैं, "स्वतंत्रता हासिल करने के बाद भी सरकार ने इस क़ानून को नहीं बदला. आज भी लोग राज्य में पुलिस जैसी संस्था के डर से पूरी तरह से निकल नहीं सके हैं."
पुराने क़ानून बदलें

इसी तरह का एक पुरातन क़ानून है, इंडियन एविडेंस एक्ट. इसका इस्तेमाल आज भी हो रहा है इसे वर्ष 1872 में पारित किया गया था.
यह क़ानून सबूत की स्वीकृति के लिए क़ानूनी पृष्ठभूमि प्रदान करता है. जबकि उस समय ई-मेल नहीं था, फैक्स नहीं था, कैमरा और इंटरनेट नहीं थे. ये क़ानून पूरी तरह से पुरातन हो चुका है.
जस्टिस धर्माधिकारी कहते हैं, "आपके पास ई-मेल है. कैमरा है, लेकिन इसका दुरूपयोग हो रहा है. इसको बदलने के बजाए इसमें सुधार लाने की ज़रूरत है."
वह आगे कहते हैं, "अब लोग गीता पर भी हाथ रख कर झूठ बोलते हैं. एक समय था जब लोग अपने बच्चों के सिर पर या गाय की दुम पकड़ कर सच बोलते थे."
समाज में सुधार
इसी तरह देश की आपराधिक न्याय प्रणाली में आपराधिक न्याय के प्रशासन के लिए वर्ष 1898 में अपराध प्रक्रिया संहिता पारित की गई.
जस्टिस धर्माधिकारी कहते हैं, "बहुत से क़ानून हमने अंग्रेज़ों से लिए हैं. अगर आपने क़ानून और क़ानून प्रणाली को विदेशियों से लिया है, तो इसे बदलना ही पड़ेगा. मुश्किल ये है कि इसका कोई पर्याय नहीं है."
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वह आगे कहते हैं "परिवर्तन अगर आप चाहते हैं तो पूरा परिवर्तन करना चाहिए."
इसीलिए जस्टिस धर्माधिकारी तर्क देते हैं कि "पहले समाज में सुधार लाओ, मानसिकता बदलो फिर क़ानून में बदलाव करो."
उनका कहना है कि "अगर किसी मंदिर में काफी मच्छर हो जाएं, तो क्या मंदिर को ही गिरा दिया जाए या फिर मच्छरों को मारने की कोशिश जाए.
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