'समलैंगिकों के यौन संबंधों पर फ़ैसला शर्मनाक'

- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को वैध क़रार देते हुए वयस्क समलैंगिकों के बीच सहमति से बनाए गए यौन संबंधों को फिर ग़ैर क़ानूनी करार दिया है.
153 साल पुराने इस क़ानून के तहत अगर दो लोग किसी निजी जगह पर 'अप्राकृतिक' ढंग से यौन संबंध बनाते हैं तो वो ग़ैर-कानूनी होगा और उसके लिए उम्र क़ैद तक हो सकती है.
ये क़ानून ख़ास तौर पर समलैंगिकों की बात नहीं करता है और ये बच्चों के साथ अप्राकृतिक यौन हिंसा को मद्देनज़र रखते हुए बनाया गया था.
लेकिन वयस्कों में दो पुरुषों या महिलाओं या समलैंगिकों के बीच सहमति से बनाया गया यौन संबंध भी क़ानूनी परिभाषा में अप्राकृतिक समझे जाने की वजह से इस क़ानून के दायरे में आ गया.
ऐसे संबंधों को वैधता देने के लिए ही वर्ष 2001 में दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी और चार साल पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने एक <link type="page"><caption> ऐतिहासिक आदेश</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2009/07/090702_court_gayright_awa_tc2.shtml" platform="highweb"/></link> में इस धारा के तहत विशेषकर वयस्कों के बीच समलैंगिक संबधों को क़ानूनी मान्यता दी भी थी.
लेकिन कई धार्मिक संगठनों ने इसका विरोध करते हुए इसको सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. अब सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को कई लोग शर्मनाक बता रहे हैं और फैसले के दिन को काला दिवस. बीबीसी ने उनके विचार जानने की कोशिश की.
गौतम भान, सदस्य, 'वॉयसेस अगेन्स्ट 377'
हमारा संविधान सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, और इसकी रक्षा करना अदालत की ज़िम्मेदारी है, लेकिन इस फ़ैसले में अदालत ने इसका ठीक उलटा किया है.

क़ानूनी वैधता का हक़ वापस लेकर, अदालत ने एक तरह से कहा है कि चूंकि कुछ लोगों की लैंगिक पहचान अलग होने की वजह से उनके कुछ अधिकारों का उल्लंघन किया जा सकता है.
जिस वक्त पूरी दुनिया समलैंगिकों के लिए समान अधिकारों की हिमायत कर रही है, वहीं भारतीय संदर्भ में ये उल्टे कदम चलने जैसा है.
लेकिन वर्ष 2001 में जब समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाने की याचिका दायर की गई थी, तब से अब तक हमारा आंदोलन बहुत मज़बूत हो गया है.
हमने कभी नहीं सोचा था कि हमारी लड़ाई आसान होगी, और इस फ़ैसले के बावजूद हम उतनी ही ऊर्जा से आगे भी लड़ते रहेंगे.
ज़फरयाब जिलानी, याचिकाकर्ता और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य
सुप्रीम कोर्ट ने भारत के नैतिक मूल्यों को बरक़रार रखा है. क़ानून इसलिए बनाए जाते हैं कि जो सही है उसका सुरक्षा की जा सके और जैसा कि कोर्ट ने बुधवार को किया.
दशकों से भारत में इस तरह के अप्राकृतिक रिश्ते आपसी सहमति से बनाए जाते रहे हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं हुआ कि इसे कानूनी या संवैधानिक मान्यता दे दी जाए.
ये कुदरत के ख़िलाफ़ है और इसे अपराध क़रार देने का फ़ैसला बिल्कुल सही है. हम हिंदुस्तान में रहते हैं न कि अमरीका में, और हमारे सामाजिक मूल्यों के हिसाब से ये बिल्कुल सही फ़ैसला है.
सुप्रीम कोर्ट ने देश के अधिकांश लोगों की भावनाएं समझीं और इसका ख़्याल रखते हुए ये फ़ैसला दिया है.
कविता कृष्णनन, महिला आंदोलनकारी
अदालत का फ़ैसला बेहद शर्मनाक है. ये तर्कसंगत संवैधानिक सोच के विपरीत पितृसत्तात्मक और धार्मिक बलों का साथ देने जैसा है.

ये सभी अल्पसंख्यकों के लिए बुरा फ़ैसला है. हम हर आधुनिक लोकतंत्र के सर्वोच्च न्यायालय से ये अपेक्षा करते हैं कि वो हाशिए पर रह रहे सभी समुदाय, चाहे वो महिलाएं, बच्चे, या लैंगिक अल्पसंख्यक हों, उनके अधिकारों की रक्षा करेगा.
हम अपनी निजी ज़िंदगी में कैसे रहते हैं और अपने घर की चारदीवारी में क्या करते हैं, इस बात में किसी नैतिक ताकत या पुलिसगिरी का दख़ल नहीं होना चाहिए.
हम ऐसा नहीं होने देंगे कि कुछ धार्मिक संगठनों की संकीर्ण सोच और मान्यताओं का देश के क़ानून पर ऐसा असर पड़े.
कल अगर किसी संगठन ने ये माना कि अंतर्जातीय या दो धर्मों के बीच हुआ विवाह उन्हें भारतीय समाज के विरुद्ध लगता है, क्या अदालत क़ानून में उसके मुताबिक बदलाव करने लगेगी? ये एक बहुत बुरा उदाहरण बन सकता है.
अरविंद नारायण, इस मामले में प्रतिवादी
ये फ़ैसला भारत के संविधान के इतिहास के साथ विश्वासघात है क्योंकि इसने सबको साथ लेकर चलने के सिद्धांत से छल किया है और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ बहुसंख्यक समुदाय के भेदभाव ना करने के सिद्धांत को धोखा दिया है.

इसने उस सोच को भी धोखा दिया है जिसके तहत लैंगिक पहचान अलग होने के बावजूद हमारे संविधान में हर व्यक्ति को मान-सम्मान से जीने का अधिकार दिया गया है.
पर ये याद रखना भी ज़रूरी है कि वर्ष 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले के बाद, लोगों ने एक नई आज़ादी महसूस की है और कोई क़ानूनी फ़ैसला इस आज़ादी के अहसास को हमसे नहीं छीन सकता.
वर्ष 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि अधिकार 'दिए' नहीं जाते, महज़ उनकी 'पुष्टि' की जाती है, यानी मान-सम्मान का अधिकार हमारा हिस्सा है, और इस दुनिया की कोई अदालत के पास इसे हमसे छीनने का हक़ नहीं है.
हम अब सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की समीक्षा करना चाहते हैं, ताकि अपने क़ानूनी विकल्प समझकर वापस अदालत जाएं और उनसे उनके मत पर पुनर्विचार करने की दरख़्वास्त कर सकें.
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