केजरीवाल ने चुनाव में उतरने में जल्दबाज़ी की?

आम आदमी को मिले चंदे पर सवाल उठ रहे हैं
    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पहली बार चुनावी अखाड़े में कूदी आम आदमी पार्टी (आप) के क़दम क्या अभी से डगमगाने लगे हैं?

पार्टी के भीतर कथित असंतोष का सार्वजनिक प्रदर्शन, पार्टी को मिले चंदे पर जारी विवाद और इस चंदे के स्रोत की छानबीन करने के लिए गृह मंत्रालय का आदेश, ये कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनसे आम आदमी पार्टी जूझ रही है.

पार्टी के एक सदस्य राकेश अग्रवाल ने पिछले दिनों एक प्रेस कांफ्रेस की और दावा किया कि उनकी इस अपील को पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने नज़रअंदाज कर दिया कि पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.

इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उस वक्त अच्छा ख़ासा ड्रामा भी देखने को मिला जब अग्रवाल के ग़ैर सरकारी संगठन से जुड़े बताए जाने वाले कुछ ऑटो रिक्शा ड्राइवर धड़धड़ाते वहां आए और उन्होंने अग्रवाल पर एनजीओ के पैसे का दुरुपयोग करने के आरोप लगाए.

इसके बाद आम आदमी पार्टी ने अग्रवाल को बाहर का रास्ता दिखाने में कोई देर नहीं लगाई. इस पूरे मामले की सच्चाई भले कुछ भी हो लेकिन इससे इन अटकलों को तो बल मिला ही है कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.

सबकी जांच हो

अरविंद केजरीवाल
इमेज कैप्शन, सवाल उठ रहे हैं कि क्या अरविंद केजरीवाल ने चुनावी मैदान में उतरने में जल्दबाज़ी दिखाई

भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चले आंदोलन के बाद बनी इस पार्टी के लिए उसके चंदे के स्रोत पर उठे सवाल भी परेशानी का सबब होंगे. पहले भाजपा और अब कांग्रेस ये जानना चाहती हैं कि आम आदमी पार्टी को मिलने वाला पैसा कहां से आ रहा है.

गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने इस बारे में जांच की घोषणा की है. उनका दावा है कि उन्हें आम आदमी पार्टी को मिले विदेशी चंदे को लेकर कई शिकायतें मिली हैं.

आम आदमी पार्टी का कहना है कि वो जांच के लिए तैयार है क्योंकि उसका दावा है कि सभी तरह के चंदे का पूरा हिसाब उसके पास है और उन्होंने इसे अपनी वेबसाइट पर भी जारी किया है.

लेकिन वो चाहती है कि गृह मंत्रालय भाजपा और कांग्रेस को मिलने वाले चंदे की भी जांच करे.

आम आदमी पार्टी की वेबसाइट के अनुसार आठ नवंबर तक पार्टी को 63 हजार दानदाताओं की तरफ से लगभग 19 करोड़ रुपए की राशि प्राप्त हुई है. इनमें से कुछ उद्योगपति हैं तो कुछ विदेशों में बसे भारतीय हैं.

ये कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इन सब बातों का असर चार दिसंबर को होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन पर पड़ेगा या नहीं. लेकिन निश्चित रूप से पार्टी इन मुद्दों से बेपरवाह चुनाव प्रचार में जुटी है.

अरविंद केजरीवाल

आम आदमी पार्टी का दावा है कि उसने दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के गढ़ में सेंध लगाई है.

दरारों का डर

लेकिन इस पार्टी को दिल्ली की आबादी के बड़े हिस्से को अभी ये विश्वास दिलाना बाक़ी है कि अगर वो जीत जाती है तो कैसे सरकार चलाएगी क्योंकि उसे प्रशासन संभालने का कोई अनुभव है.

अभी ये पार्टी अपने शुरुआती दौर में है. साल भर पहले ही इसका गठन हुआ है. कुछ लोग कह सकते हैं कि इसने चुनावी मैदान में कूदने में जल्दबाज़ी दिखाई.

भाजपा, जिसे पहले भारतीय जन संघ कहा जाता था, उसका गठन 1980 में हुआ था, लेकिन वो पहली बार चुनावी मैदान में उतरी साल 1984 के चुनाव में और उसके खाते में दो सीटें आई थीं.

बात कांग्रेस की करें तो उसने 1888 में अपनी स्थापना के बरसों बाद चुनावी राजनीति में प्रवेश किया था.

साल भर पहले तक आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक आंदोलन था. ज़्यादा से ज़्यादा वो विपक्ष की भूमिका में फिट बैठ सकते हैं.

अगर उसे सत्ता मिली और पार्टी के झगड़ों और असंतोष को लोकतांत्रिक और पारदर्शी तरीके से नहीं सुलझाया गया तो इससे पार्टी में बड़ी दरारें आ सकती हैं.

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