भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक और बेसहारा बच्चे

मंगलयान
    • Author, जस्टिन रॉलेट
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

भारत ने पिछले सप्ताह मंगल ग्रह के लिए अपने अभियान की शुरूआत की. मुझे देश के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों और दिल्ली के बेसहारा बच्चों की सहाहियतों में कुछ समानताएं नज़र आती हैं.

जब आप बच्चों को रेलगाड़ियों के बीच पटरियों पर से पानी की ख़ाली बोतलों पर झपट्टा मारते या केवल कुछ पैसों के लिए बदबूदार कूड़े के ढेर से प्लास्टिक और गत्ते के टुकड़े बीनते हुए देखते हैं तो आपको लगता है कि सितारों पर पहुँचने से पहले समाज कल्याण पर ध्यान दिया जाना चाहिए.

लेकिन मैंने पाया कि न तो दिल्ली के बेसहारा बच्चों की दुर्दशा और न ही दूसरे ग्रह पर पहुँचने की भारत की महत्वाकांक्षा पर बेतहाशा ख़र्च का मसला उतना आसान था जितना लग रहा है.

की जांच-पड़ताल के लिए मशीनें बनाने वाली भारतीय वैज्ञानिकों की टीम गुजरात के प्रमुख शहर अहमदाबाद में स्थित फ़िज़िकल रिसर्च लैबोरेटरी की है.

मैं उम्मीद कर रहा था कि इसकी इमारत नासा या दुनियाभर में कामयाबी के झंडे गाड़ने वाली किसी भारतीय आईटी कंपनी की तरह होगी.

लेकिन मैंने पाया कि देश में अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाई पर पहुंचाने वाली वैज्ञानिकों की टीम जिस इमारत में काम कर रही है वो बाबा आदम के ज़माने की है.

चांद पर पानी

इसके गेट पर हाथ से लिखा एक बोर्ड लगा है. इस पर हिंदी और अग्रेज़ी में लिखा है कि यहाँ न थूकें. अंदर 1970 के दशक में बनी यह इमारत थोड़ी जर्जर हो चुकी है और उष्णकटिबंधीय जलवायु में उगने वाले पेड़ों से घिरी है.

यहाँ काम करने वाले वैज्ञानिकों ने दुनिया को उस समय चकित कर दिया था जब 2008 में भारत के चंद्रयान ने चांद पर पानी होने की पुष्टि की थी. इससे पहले कोई मिशन ऐसा नहीं कर पाए थे.

इस खोज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले और इस केंद्र के निदेशक प्रोफ़ेसर जितेंद्र गोस्वामी कहते हैं, ''हमें अपनी ख़ामियों को अपनी ताक़त बनाना है.''

उन्हें इस बात पर गर्व है कि आठ करोड़ डॉलर का मंगल मिशन इस लाल ग्रह पर जाने वाला इतिहास का सबसे सस्ता अभियान है. उस पर लगा पेलोड केवल 14.5 किलोग्राम का है. वो मज़ाक़िया लहजे में कहते हैं, "पेलोड इतने छोटे थे कि उन्हें एक बैग में रखकर ले जाया जा सकता है."

लेकिन गंभीर होते हुए वह कहते हैं, ''हमारे उपकरण एक बहुत ही छोटे क्षेत्र को ही कवर करेंगे. लेकिन वे वहां देखेंगे, जहां अभी तक किसी और ने नहीं देखा है. ऐसे ही हमने चांद पर पानी का पता लगाया था.''

मंगल पर जीवन

सिलिगुड़ी में कूड़ा बीनने वाले बच्चे

वह उम्मीद जताते हैं कि उनका मिशन मंगल की सतह पर मिथेन की मौजूदगी का पता लगाकर इस गुत्थी को सुलझाने में मदद करेगा कि क्या कभी मंगल पर जीवन था? साथ ही वह यह भी पता लगाएगा कि मंगल ग्रह का वातावरण कैसे बदल गया है.

मैं इस बात से बहुत प्रभावित हुआ कि कैसे भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम अपने सीमित संसाधनों का इस्तेमाल शोध और मूल विज्ञान के लिए कर रहा है.

लेकिन दिल्ली के बेसहारा बच्चे जो कर रहे हैं, वह ज़्यादा प्रभावित करता है. उन्होंने ऐसी चीज़ से पैसा बनाने का तरीक़ा निकाला है जिसे अधिकांश लोग बेकार समझते हैं. वह है शहर भर का कूड़ा.

ये दुनिया के एक ग़रीब देश के ग़रीब बच्चें हैं. लेकिन जब आप उनसे मिलते हैं तो वे उनमें निराशा या मायूसी नहीं दिखती बल्कि इसके उलट वे ऊर्जावान और रचनात्मक उद्यमी हैं.

इक़बाल मेरे गाइड थे, जो कि पहले बेसहारा थे. सलाम बालक ट्रस्ट नाम की एक सामाजिक संस्था ने उनकी देखभाल की. इक़बाल जब छोटे थे तो उनका शोषण हुआ था और वह दस साल की आयु में ही दिल्ली की सड़कों पर रहने लगे थे. लेकिन मुझे उस समय आश्चर्य हुआ, जब उन्होंने कहा कि यह जीवन बहुत कठिन नहीं था.

इक़बाल ने बताया, ''खाने की कोई समस्या नहीं है. बहुत सी सामाजिक संस्थाएं हमें खाना देती हैं. कूड़ा बेचकर मिले पैसे को मैं वीडियो गेम खेलने पर ख़र्च करता था.''

आजादी का आनंद

दरअसल सलाम बालक ट्रस्ट और उनके जैसे अन्य संगठनों के सामने बड़ी चुनौती इन बच्चों को यह समझाना है कि वे सड़कों पर रहना छोड़कर आश्रय स्थलों और घरों में रहें.

सलाम बालक ट्रस्ट के एक ट्रस्टी गगन सिंह कहते हैं, ''वे इस तरह के जीवन के आदी हो चुके हैं. उन्होंने इसमें मज़ा आ रहा है.''

वह कहते हैं कि सड़क का जीवन मज़ेदार तो हो सकता है लेकिन यह ख़तरनाक है. सड़कों पर रहने वाले बच्चे गिरोहों और यौन उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं. बहुत से बच्चे नशीली दवाएं ले रहे हैं. ऐसे में प्रेरणादायक की भूमिका महत्वपूर्ण है.

इक़बाल ट्रस्ट के एक आश्रय स्थल में लगे एक पोस्टर की ओर गर्व से इशारा करते हैं, जिसमें आधा दर्जन उन बच्चों के फ़ोटो हैं जिन्हें ट्रस्ट सड़कों से ले आया है.

वो बताते हैं, ''अमित ने अभी हाल ही में इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग का कोर्स पूरा किया है, सोनिया फ़ैशन डिज़ाइनिंग का कोर्स कर रही हैं. नियाज़ डोमिनोज़ पिज्ज़ा में टीम लीडर के रूप में काम कर रहा है.''

प्रेरणादायक

मंगलयान के प्रक्षेपण पर खुशी मनाते लोग

उधर, अहमदाबाद में प्रोफ़ेसर गोस्वामी को विश्वास है कि मंगल मिशन को भी प्रेरणादायक होना चाहिए.

दुनिया के पहले सैटेलाइट स्पूतनिक के 1957 में लांच के बाद वह अंतरिक्ष की ओर आकर्षित हुए थे. गोस्वामी बताते हैं, ''स्पूतनिक की एक झलक पाने के लिए मैं असम में अपने पैतृक घर की बगिया में बैठकर रात-रात भर आसमान की ओर टकटकी लगाए रहता था.''

वो कहते हैं कि अगर मंगल मिशन सफल हो गया तो हर भारतीय बच्चा चाहें वह असम के किसी गाँव का हो या दिल्ली की सड़कों का, वह रात को आसमान की ओर देख सकता है और जब उसे मंगल ग्रह की लाल किरणें दिखाई देंगी तो वह यह जान जाएगा कि उसका देश वहाँ गया है.

वह उम्मीद जताते हैं कि इससे पूरे देश की महत्वाकांक्षाओं को उड़ान मिलेगी.

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