विधानसभा चुनाव: आख़िर क्यों ख़ास है दिल्ली?

- Author, प्रमोद जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए दिल्ली विधानसभा का चुनाव ओपीनियन पोल का काम करेगा. कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए.
दिल्ली एक बेहतरीन बैरोमीटर बनता, पर ‘आप’ ने एंटी क्लाइमैक्स तैयार कर दिया है.
अंदेशा है कि दिल्ली का वोटर त्रिशंकु विधानसभा चुनकर दे सकता है. ऐसा हुआ तो ‘आप’ के सामने बड़ा धर्मसंकट पैदा होगा. यह उस धर्मसंकट का ट्रेलर भी होगा, जो 2014 के लोकसभा परिणामों के बाद जन्म ले सकता है.
दिल्ली से उठने वाली हवा के झोंके पूरे देश को प्रभावित करते हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सातों संसदीय सीटों पर कांग्रेस के प्रत्याशी जीते थे.
इनमें कपिल सिब्बल, अजय माकन, कृष्णा तीरथ और संदीप दीक्षित की राष्ट्रीय पहचान है. यहाँ होने वाली राजनीतिक हार या जीत के चाहे व्यावहारिक रूप से कोई मायने न हों पर प्रतीकात्मक अर्थ गहरा होता है.
पिछले कुछ साल में देश के शहरी नौजवानों के आंदोलनों को सबसे अच्छा हवा-पानी दिल्ली में ही मिला. राजधानी होने के नाते दिल्ली इस आयु और आय वर्ग का बेहतरीन नमूना है.
आसफ़ अली का शहर
माना जा रहा है कि 2014 के चुनाव में भारत के शहरी युवाओं की भावनाओं का पता लगेगा कि वे किस प्रकार की राजनीति चाहते हैं. साथ ही सोशल और अन-सोशल मीडिया की भूमिका भी ज़ाहिर होगी. दिल्ली के इस चुनाव में उसकी झलक नज़र आ रही है.
सन् 1951 में दिल्ली ‘ग’ श्रेणी का राज्य था. यहाँ बाकायदा विधानसभा थी और पहले चुनाव के बाद कांग्रेस के चौधरी ब्रह्मप्रकाश यहाँ पहले मुख्यमंत्री बने थे. पर राज्यों के पुनर्गठन के बाद 1956 में दिल्ली को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया.
एक रोचक तथ्य यह है कि गठबंधन सरकारों का युग आने के काफी पहले दिल्ली में जनसंघ और कम्यूनिस्ट पार्टी का गठबंधन हुआ था.

लालकृष्ण आडवाणी ने ‘माय कंट्री माय लाइफ’ में लिखा है, "दिल्ली में नगर निगम की स्थापना सन 1958 में हुई. इन सभी में जनसंघ को अच्छा समर्थन प्राप्त था. 80 सदस्यों वाले निगम में हमने कांग्रेस से केवल 25 सीटें कम जीतीं. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के आठ सदस्य थे."
उनके पास नगर निगम में इतनी सीटें थीं कि वे कांग्रेस या जनसंघ किसी का भी मेयर बनवा सकते थे. भाकपा ने जनसंघ को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाने का प्रस्ताव किया, बशर्ते कांग्रेस अरुणा आसफ अली को दिल्ली की पहली मेयर बनाने के लिए तैयार हो जाए.
कांग्रेस ने यह शर्त मान ली. लेकिन आंतरिक झगड़ों के कारण यह गठबंधन एक साल के अंदर ही टूट गया. इसके बाद जनसंघ और भाकपा के बीच समझौता हुआ कि महापौर और उपमहापौर के पद दोनों पार्टियों को बारी-बारी से दिए जाएँगे.
भाजपा के तीन मुख्यमंत्री
दिल्ली की राजनीति में जनसंघ की शुरू से अच्छी पकड़ थी. केदारनाथ साहनी उसके लोकप्रिय नेता थे. दिल्ली को अलग राज्य बनाने की माँग तो पूरी नहीं हुई, पर 69वें संविधान संशोधन विधेयक के पास होने के बाद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम-1991 लागू हुआ और दिल्ली में विधानसभा का गठन हुआ.
दिल्ली को दोबारा विधानसभा मिलने के बाद 1993 में चुनाव हुए तो भारतीय जनता पार्टी को 70 में से 49 और कांग्रेस को 14 सीटें मिलीं.
मदन लाल खुराना मुख्यमंत्री बने. पर हवाला मामले में नाम आने पर उन्हें पद छोड़ना पड़ा.
उनकी जगह साहिब सिंह वर्मा आए. अंदरूनी झगड़ों ने उन्हें भी नहीं चलने दिया.
बाहरी आबादी, बाहरी मुख्यमंत्री

1997 में सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाया गया. पर 1998 के चुनाव में पार्टी बुरी तरह हारी. कांग्रेस को 51 और भाजपा को 15 सीटें मिलीं. इस चुनाव के बाद शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं.
1993 से 1998 के बीच यमुना में काफी पानी बह चुका था. जिस शहर में कभी जनसंघ और भाजपा का राज था वहाँ एक ऐसी मुख्यमंत्री आई जिसे शहर अच्छी तरह जानता भी नहीं था.
दिल्ली शहर की सामाजिक संरचना में पिछले दो दशक में काफी बदलाव हुआ है. यहाँ काफी बड़ी आबादी बिहार, उत्तर प्रदेश और दक्षिण के राज्यों से आई है. एक बार जाने-अनजाने शीला दीक्षित ने दिल्ली की समस्याओं के लिए बाहर से आती भीड़ को ज़िम्मेदार ठहरा दिया था और फ़ौरन ही अपनी बात वापस ले ली थी.
शीला दीक्षित के टिके रहने का बड़ा कारण दिल्ली की बदलती डेमोग्राफ़िक संरचना भी है. यहाँ इतने नए लोग आते हैं कि उन्हें एंटी इनकम्बैंसी का बोध नहीं होता. पुरानी दिल्ली का व्यापारी समुदाय अब उतना प्रभावशाली नहीं रहा, जितना दो दशक पहले था.
दिल्ली ने बचाया कांग्रेस को
इस दौरान दिल्ली शहर का विकास भी काफी हुआ. ख़ासतौर से उसकी मेट्रो ने उसे एक नया चेहरा दिया. दिल्ली में कांग्रेस का शासन तब आया, जब शेष देश से उसकी विदाई हो रही थी. दिल्ली ने कांग्रेस को नया चेहरा दिया. इसीलिए दिल्ली आज कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण है, वरना यह भाजपा का गढ़ था.
1967 में जब गैर-कांग्रेसवाद की हवा पहली बार चली थी तब महानगर परिषद से लेकर बाहरी दिल्ली की सीट को छोड़ कर शेष सभी लोकसभा सीटों पर जनसंघ जीती थी. विजय कुमार मल्होत्रा मुख्य कार्यकारी पार्षद बने तो उन्होंने सबसे पहले राजधानी की परिवहन सेवा को सुधारने की शुरुआत की.
इसके चार साल बाद 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी की आंधी चली और दिल्ली से जनसंघ का सफाया हो गया. फिर भी नगर निगम के चुनावों में जनसंघ को सफलता मिली.
नगर निगम से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ में कांग्रेस और भाजपा की टक्कर लगातार चलती रही है.
कांग्रेस की अलोकप्रियता

बहरहाल 1998 से 2013 तक 15 साल के कांग्रेस शासन के कारण एंटी इनकम्बैंसी एक महत्वपूर्ण कारक बनेगी. पिछले तीन साल में दिल्ली सरकार को कॉमनवैल्थ गेम्स के निर्माण कार्यों में देरी, अनियमितता की शिकायतों, अन्ना हज़ारे के आंदोलन और फिर गैंग रेप के कारण अलोकप्रियता का सामना करना पड़ा.
इसकी झलक पिछले साल हुए नगर निगम के चुनाव में देखने को मिली जहाँ भाजपा ने जीत हासिल की. अन्ना-आंदोलन की छाया में हुए उस चुनाव में लगता था कि यह राष्ट्रीय मसलों से प्रभावित चुनाव है. दिल्ली विधानसभा के सन 2009 के बाद हुए चारों उपचुनावों में कांग्रेस की हार हुई. सवाल है क्या कांग्रेस अबकी बारी हारेगी?
तब जीतेगा कौन?
कांग्रेस हारेगी तो जीतेगा कौन? कांग्रेस के प्रति पैदा हुए रोष का फ़ायदा क्या भाजपा को मिलेगा? या आम आदमी पार्टी इसका लाभ उठाएगी? संभव यह भी है कि वो रोष से पैदा हुए वोटों को बाँट कर कांग्रेस को फिर से बैठाने में मददगार बने.
कांग्रेस, भाजपा और ‘आप’ के बाद एक महत्वपूर्ण पार्टी बसपा है जिसे पिछली बार 14.04 फ़ीसदी वोट मिले थे और दो सीटें. दो सीटों से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं 14 फीसदी सॉलिड वोट. मायावती ने दिल्ली में आठ रैलियां करने की घोषणा की है. बसपा के वोटर की ख़ासियत है कि बड़े-बड़े सेफोलॉजिस्ट उसके मन को पढ़ नहीं पाते.
इस चुनाव में उत्तर प्रदेश और बिहार की दो महत्वपूर्ण पार्टियाँ और प्रवेश कर गईं हैं. समाजवादी पार्टी और जेडीयू ने भी अपने प्रत्याशी उतारे हैं. वो भी किसी का वोट काटेंगी, सवाल है किसका?
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