टायर बेचकर गुज़ारा करने को मजबूर ड्राइवर

छत्तीसगढ़ में चुनाव ड्यूटी पर लगे ट्रक
    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बस्तर से

ये वो लोग हैं जिन्हें चुनाव में ज़बर्दस्ती धकेला गया है. इन्हें न किसी राजनीतिक दल से मतलब है न सरकार से. ये तो निजी ट्रक मालिकों के यहाँ औने-पौने की नौकरी करते हैं. ये हैं छत्तीसगढ़ में हज़ारों ट्रकों और बसों के ड्राइवर जिनके वाहनों को ज़ब्त कर चुनाव के कार्यों में लगाया गया है.

पिछले बीस दिनों से ये बस्तर के दूर दराज़ इलाकों में अपनी गाड़ियों के साथ एक तरह से फंसे पड़े हैं.

छत्तीसगढ़ में हो रहे विधान सभा चुनाव के लिए हजारों की संख्या में ट्रकों और बसों को पकड़ा गया है जिनमे सुरक्षा बालों के जवानों और चुनाव सामग्री को भेजा जा रहा है. इन गाड़ियों को राज्य के अलग अलग स्थानों पर ज़ब्त किया गया है.

ड्राइवरों का कहना है कि उन्हें सीधे सड़क से पकड़ कर चुनाव की ड्यूटी पर भेज दिया गया जिसकी वजह से वो कुछ तैयारी के साथ नहीं आ पाए. इसका नतीजा ये हुआ कि पिछले महीने की बीस तरीख़ से लेकर आज तक लगभग सभी के पास पैसे ख़त्म हो चुके हैं और वो किसी तरह अपना गुज़ारा कर रहे हैं.

सुकमा और कोंटा के बीच स्थित दोरनापाल के इलाके में लगभग पचास बसें और ट्रक खड़े हैं जो चुनाव सामग्री और सुरक्षा बलों के जवानों को लेकर यहाँ आए हैं. कुछ ड्राइवरों का कहना है कि अब उनके सामने ऐसी नौबत आ गई है कि उन्हें अपनी घड़ियाँ या फिर टायर बेच कर अपना गुज़ारा करना पड़ रहा है.

खाने-पीने को मोहताज

एक ड्राइवर का कहना था, "ये ख़तरनाक इलाका है. यहाँ न मोबाइल काम करता है न और न ही हमारे रहने के लिए कोई इंतज़ाम ही है. हम अपनी गाड़ियों में ही सोते हैं."

छत्तीसगढ़ में चुनाव ड्यूटी पर लगाए गए ट्रक ड्राइवरों की हालत खराब.

रायगढ़ से आए एक दूसरे ड्राइवर ने बताया कि वो प्रशासनिक अधिकारियों से हाथ खर्च के लिए पैसे मांगते हैं. मगर अधिकारी ये कहकर देने से इनकार कर देते हैं कि वो वाहनों के मालिकों से पैसे मांगें.

एक अन्य ड्राइवर ने बीबीसी को बताया, "हमें सड़क से पकड़ का लाया गया. मालिक से मिलने का मौक़ा ही नहीं मिला. यहाँ न ऐटीएम है और न ही यहाँ आया जा सकता है. मालिक पैसे भी भिजवाए तो कैसे. कौन इस बीहड़ में पैसे लेकर आएगा."

छत्तीसगढ़ के अतिरिक्त ट्रांसपोर्ट कमिश्नर डी रविशंकर का कहना है कि उनके विभाग को भी इस तरह की शिकायतें मिल रहीं हैं.

मगर उनका कहना है कि पुलिस मुख्यालय से सभी ज़िले के एस पी को ये निर्देश दिया गया है कि वो ऐसे ड्राइवरों के खाने-रहने और सुरक्षा के इंतज़ाम करें.

भय का माहौल

कमिश्नर रविशंकर ने स्वीकार किया कि इस मामले में ज़िला स्तर पर कोताही बरती जा रही है. यही वजह है कि उनके विभाग ने इस संबंध में सरकार के उच्च अधिकारियों से हस्तक्षेप करने की मांग की है.

"हमने ये साफ़ निर्देश दिए हैं कि ज़िले के स्तर पर कलक्टर और एस पी इन ड्राइवरों के खाने-रहने और सुरक्षा की व्यवस्था करें. मगर इसके बावजूद हमें शिकायतें मिल रहीं हैं. हमने फिर प्रशासनिक अधिकारियों को लिखा है.”

बस्तर में चुनाव के दौरान संभावित हिंसा की चेतावनी ने ड्राइवरों की धड़कनों को और बढ़ा दिया है. दक्षिण बस्तर के एक बड़े इलाके में माओवादियों ने बड़े पैमाने पर बारूदी सुरंगों का जाल बिछा दिया है जिन्हें निष्क्रिय करने का काम सुरक्षा बल के जवान कर रहे हैं.

खुफिया एजेंसियों को ये भी आशंका हैं कि चुनाव के दौरान या फिर चुनाव कार्यों को संपन्न करवाकर वापस लौटने वाले वाहनों पर नक्सली छापामार हमला कर सकते हैं क्योंकि पिछले चुनाव में ऐसा देखने को मिला था.

ऐसे में चनाव की ड्यूटी पर लगाए गए निजी वाहनों के ड्राइवरों के सुरक्षा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है.

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