कुश्ती में भारत का सबसे बेहतर प्रदर्शन

विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के ग्रीको रोमन वर्ग में संदीप तुलसी यादव ने भारत को पहला पदक दिलाया.
इमेज कैप्शन, विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के ग्रीको रोमन वर्ग में संदीप तुलसी यादव ने भारत को पहला पदक दिलाया.
    • Author, आदेश कुमार गुप्त
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए

भारत के लिहाज़ से रविवार को हंगरी के बुडापेस्ट शहर में संपन्न विश्व कुश्ती चैंपियनशिप बेहद यादगार साबित हुई. भारत के संदीप तुलसी यादव ने इस चैंपियनशिप के सातवें और अंतिम दिन ग्रीको रोमन शैली के 66 किलो वज़न वर्ग में कांस्य पदक जीता.

यह भारत के लिए इस चैंपियनशिप में कुल मिलाकर तीसरा पदक था. इससे पहले भारत के भार वर्ग में रजत पदक और बजरंग ने 60 किलो भार वर्गमें कांस्य पदक जीता था.

संदीप क्वार्टर फाइनल में हारे थे लेकिन कोरियाई पहलवान के फाइनल में पहुंचने के कारण उन्हे कांस्य पदक के लिए रेपचेज में उतरने का अवसर मिला और उन्होने स्वीडन और सर्बिया के पहलवान को हराकर इसका फायदा उठाया.

बनाया इतिहास

ऐसा विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के इतिहास में पहली बार हुआ जब भारत ने इसमें एक से अधिक पदक जीते. इससे पहले भारत को सुशील कुमार फ्री स्टाइल शैली में स्वर्ण पदक, विशम्बर सिंह रजत पदक तथा उदय चंद और रमेश कुमार कांस्य पदक जीता चुके हैं.

महिला वर्ग में भी भारत ने विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में तीन कांस्य पदक जीते हैं. यह कामयाबी महिला फ्री स्टाइल वर्ग में अलका तोमर, गीता फोगाट और बबीता फोगाट ने दिलाई है.

उल्लेखनीय है कि फ्री स्टाइल शैली की विश्व चैंपियनशिप का आयोजन पहली बार साल 1951 में टर्की में किया गया.

भारत को पहली कामयाबी के लिए साल 1961 तक इंतज़ार करना पडा. तब जापान में उदय चंद ने कांस्य पदक जीता.

अमित कुमार ने विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में रजत पदक जीता.
इमेज कैप्शन, अमित कुमार ने विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में रजत पदक जीता.

महिलाओं की फ्री स्टाइल शैली की कुश्ती को पहली बार विश्व चैंपियनशिप में साल 1987 में नार्वे में जगह मिली. भारत को इस वर्ग में पहली कामयाबी अलका तोमर ने साल 2006 में चीन में आयोजित विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में कांस्य पदक के रूप में दिलाई.

ग्रीको रोमन में कमाल

हैरानी की बात है कि ग्रीको रोमन शैली की कुश्ती विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के रूप में सबसे पुरानी है. पहली बार इसका आयोजन हंगरी और ऑस्ट्रिया में साल 1904 में किया गया.

इस वर्ग की कुश्ती में आखिरकार भारत की आस 109 साल बाद पूरी हो ही गई. संदीप तुलसी यादव से पहले भारत का इस शैली में सबसे यादगार प्रदर्शन साल 2001 में विश्व चैंपियनशिप में मुकेश खत्री का था जो पांचवे स्थान पर थे.

ग्रीको रोमन शैली में पहलवान कमर से नीचे दाव-पेच लगाते हैं, जबकि फ्री स्टाइल शैली में पहलवान कमर, पांव से लेकर गर्दन पकड़कर दाव लगाते है. द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित हो चुके कुश्ती कोच यशवीर सिंह कहते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर ग्रीको रोमन शैली के कम दंगल होते हैं जिसकी वजह से भारत के आम पहलवानों में इसकी रूचि कम है.

दूसरी तरफ भारत को सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त जैसे पहलवान देने वाले महाबली सतपाल कहते हैं कि अब हमारे पास विश्व स्तर के दो नहीं बल्कि पाँच पाँच पहलवान हैं. विश्व चैम्पियन में मिली कामयाबी से पहलवानों के हौसले अगले ओलम्पिक खेलों के लिए अभी से बुलंद हैं.

विश्वकप में दावेदारी

बजरंग विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में कांस्य पदक हासिल किया.
इमेज कैप्शन, बजरंग विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में कांस्य पदक हासिल किया.

हंगरी में भारतीय पहलवानों द्वारा एक से अधिक पदक जीतने का फायदा यह भी हुआ कि भारत को कुश्ती के इतिहास में पहली बार कुश्ती के विश्व कप में भी भाग लेने का अवसर मिलेगा.

भारत के फ्रीस्टाइल शैली के पहलवानों ने 23 अंकों के साथ छठा स्थान हासिल किया, इससे भारत को विश्व कप में भाग लेने का हक़ मिल गया. कुश्ती विश्व कप में इससे पहले हालांकि भारत की महिलाएं इसी साल मंगोलिया के उलान बाटोर शहर में हिस्सा ले चुकी हैं और वह उसमें पांचवे स्थान पर रही थी.

उल्लेखनीय है कि महिला वर्ग का विश्व कप पहली बार साल 2001 में फ्रांस में आयोजित किया गया जबकि पुरूषों के लिए फ्रीस्टाइल वर्ग में यह पहली बार साल 1973 में अमरीका के टोलेडो शहर में हुआ जबकि ग्रीको रोमन को 1980 में स्वीडन में जगह मिली.

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