'वो अफ़सर जिसने विदेश मंत्री बनने से इनकार कर दिया'

- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मीडिया सलाहकार रहे एचवाई शारदाप्रसाद ने एक बार कहा था कि अगर आपको भारत के सबसे संभ्रांत व्यक्ति से बात करनी हो तो बृज कुमार नेहरू से समय मांगिए.
विनोदपूर्ण बातें करने और हाज़िरजवाबी में उनका कोई जवाब नहीं था. उनके पास सलीक़े, अच्छी अभिरुचि, अच्छी शराब और अच्छे भोजन की कभी कमी नहीं रहती थी.
उन्होंने अंग्रेज़ी, संस्कृत और फ़ारसी अपने पिता से सीखी थी और वो भी उस समय जब वो अपनी दाढ़ी बना रहे होते थे.
नेहरू परिवार की परंपरा का निर्वाह करते हुए वो पढ़ने के लिए इंग्लैंड गए और उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स में दाख़िला लिया. वहीं से उन्होंने आईसीएस की परीक्षा पास की.
'नेहरू रोते नहीं'
इस दौरान वो एक हंगेरियन लड़की मगदोलना फ़्रीडमैन (फ़ोरी) के प्रेमपाश में बंध गए जो बाद में उनकी पत्नी बनीं और उन्होंने अपने आप को कश्मीरी पंडिताइन के तौर पर ढाल लिया.
उनकी शादी से पहले विजयलक्ष्मी पंडित फ़ोरी को नेहरू से मिलाने कलकत्ता जेल ले गईं, जब मुलाक़ात का समय खत्म हो गया तो जेलर ने नेहरू के हाथ पर हाथ रख कर उनसे अंदर जाने के लिए इशारा किया. इस पर फ़ोरी रोने लगीं. नेहरू ने पीछे मुड़ कर उन्हें अपने परिवार की पहली सीख दी, "हम नेहरू कभी भी सार्वजनिक रूप से रोते नहीं हैं."
आज़ादी के समय बृज नेहरू वित्त मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे. लेकिन उनका रसूख़ भारत सरकार के कई सचिवों से बढ़ कर था.

पचास के दशक में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम रह गया था कि दूसरी पंचवर्षीय योजना ही खटाई में पड़ गई थी. चिंतित सरकार ने बीके नेहरू को आर्थिक मामलों का कमिश्नर जनरल बना कर वॉशिंगटन भेजा. उनका मिशन था भारत के लिए अधिक से अधिक विदेशी सहायता लाना.
चंगेज़ खां से तुलना
उन्होंने अपना काम इतनी बख़ूबी किया कि अमरीकी राजदूत जेके गालब्रैथ ने उनके बारे में कहा कि चंगेज़ खाँ के बाद दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक इतना सोना बीके नेहरू के अलावा कोई नहीं ले गया.
इसके बाद नेहरू को साल 1958 में अमरीका में राजदूत नियुक्त किया गया हालांकि उस समय भारतीय विदेश सेवा में कई लोग उनसे सीनियर थे. लेकिन उनका काम ख़ुद बोला और वो इस पद पर दस वर्षों से भी अधिक समय तक रहे.
उनके इसी कार्यकाल के दौरान उन्हें अपने जीवन की सबसे दुखद ज़िम्मेदारी निभानी पड़ी जब उन्होंने केनेडी को प्रधानमंत्री नेहरू का वो पत्र दिया जिसमें चीन से युद्ध के बाद अमरीका से सैनिक सहायता की मांग की गई थी. उन्हीं की कोशिशों के फलस्वरूप अमरीका ने भारत को 14 लाख टन गेहूँ दिया.
संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्कालीन महासचिव हैमरशोल्ड की हवाई दुर्घटना में मौत के बाद कई यूरोपीय देश चाहते थे कि बीके नेहरू को इस पद के लिए चुना जाए.
नेहरू अपनी आत्मकथा 'नाइस गाइज़ फ़िनिश सेकेंड' में लिखते हैं कि जब ये बात चल ही रही थी तो अचानक कृष्ण मेनन का फ़ोन उनके पास आया.
मेनन ने उन्हें मनाने की कोशिश की कि वो अपने मुँह से कह दें कि संयुक्त राष्ट्र संघ का वो पद उन्हें मंज़ूर नहीं है.

बीके नेहरू ने ऐसा ही किया. हालांकि हक़ीक़त ये थी कि कृष्ण मेनन ख़ुद इस पद के लिए उम्मीदवार बनना चाहते थे.
बाद में नेहरू को अहसास हुआ कि उन्होंने मेनन की सलाह मान कर मूर्खता की थी क्योंकि मेनन को मालूम था कि पश्चिमी देश मेनन की उम्मीदवारी पर कभी राज़ी नहीं होंगे. वो पद अंतत: बर्मा के यू थान को मिला.
साल 1973 में बीके नेहरू को ब्रिटेन में भारत का उच्चायुक्त बनाया गया.
बीके नेहरू शिष्टाचार और समय के इतने पक्के थे कि 1974 में इंग्लैंड गई भारतीय क्रिकेट टीम उनके द्वारा दी गई पार्टी में देर से पहुँची तो उन्होंने उससे मिलने से इनकार कर दिया.
इंदिरा से मतभेद
आपातकाल के दौरान वो निजी तौर पर इंदिरा गाँधी से उसे हटाने का अनुरोध करते रहे लेकिन सार्वजनिक तौर पर उन्होंने आपातकाल का समर्थन किया.
इसी तरह साल 1983 में जब वो जम्मू कश्मीर के राज्यपाल थे तो राज्य के चुने हुए नेता फ़ारूक अब्दुल्लाह को बर्ख़ास्त करने के मुद्दे पर उनका इंदिरा गांधी से मतभेद हो गया जिसके बाद उनका तबादला गुजरात कर दिया गया जहाँ पूरी तौर पर शराबबंदी लागू थी.
इंदिरा गांधी को भली भांति पता था कि नेहरू को शराब से परहेज़ नहीं था.
जाने माने पत्रकार इंदर मल्होत्रा ने उनसे पूछा कि आपने तबादला स्वीकार करने के बजाए अपने पद से इस्तीफ़ा क्यों नहीं दे दिया. उनका जवाब था, "मैं एक हद से ज़्यादा इंदिरा गांधी को नाराज़ नहीं कर सकता था."
बीके नेहरू का इनकार
11 फ़रवरी 1991 को उनके पास प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के सचिव एसके (चॉपी) मिश्रा का फ़ोन आया कि वो उनसे मिलना चाहते थे. वो उसी शाम उनसे मिलने आए और उन्होंने उन्हें बताया कि लोकसभाध्यक्ष दलबदल क़ानून के तहत तत्कालीन विदेश मंत्री विद्याचरण शुक्ल को लोकसभा सदस्यता से अयोग्य घोषित करने वाले हैं.
सत्ताधारी समाजवादी जनता पार्टी के पास कोई ऐसा शख्स नहीं है जिसे विदेश मंत्री बनाया जा सके. मिश्रा ने उनसे पूछा कि क्या वो भारत का विदेश मंत्री बनना पसंद करेंगे. उन्होंने ये भी कहा कि आप छह महीनों तक बिना कोई चुनाव लड़े इस पद पर बने रह सकते हैं. बाद में उनके लिए एक संसदीय सीट ढूंढ ली जाएगी.

बीके नेहरू अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि इससे उनके अहम को संतुष्टि ज़रूर मिली लेकिन उन्होंने अधिक उम्र होने के कारण इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया. उन्होंने कहा कि विदेश मंत्री बहुत ही व्यस्त जीवन जीता है, उसको हर दूसरे दिन विदेश जाना पड़ता है. 'अपनी उम्र और तेज़ी से ख़राब होती आँखों के कारण मैं ये भार शायद बर्दाश्त न कर पाऊँ.'
सार्वजनिक जीवन के हर क्षेत्र में ख़ासा नाम कमाने के बावजूद ये समझ में नहीं आता कि उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम 'नाइस गाइज़ फ़िनिश सेकेंड' क्यों रखा.
शायद इसलिए कि वो साल 1961 में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव नहीं बन पाए या इसलिए कि उनकी अपनी भतीजी ने उन्हें कश्मीर के राज्यपाल के पद से हटा दिया या फिर इसलिए कि भारत का विदेश मंत्री बनने का प्रस्ताव उनके पास तब आया जब वो अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ बसंत देख चुके थे.
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