मुज़फ़्फ़रनगरः दंगों के नफ़े-नुकसान का राजनीतिक गणित

- Author, प्रदीप सिंह
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में हुए साम्प्रदायिक दंगे और उसके बाद बने माहौल का राज्य का हर राजनीतिक दल अपने तरीके से फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रहा है.
दंगा पीड़ित अपने मृतकों, घायलों की गिनती और लापता लोगों की तलाश में व्यस्त हैं.
गिनती राजनीति दल भी कर रहे हैं पर हिंसा से प्रभावित लोगों की नहीं, वोटों की.
कितने वोट किसके खाते में आए और विरोधी के खाते से कितने वोट गए इसका हिसाब अभी चल रहा है.
समाजवादी पार्टी: सत्ता का गणित
समाजवादी पार्टी सूबे में पहली बार अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार चला रही है. ऐसे में उम्मीद थी कि वह ज्यादा संतुलित व्यवहार करेगी.
पर राजनीति लोगों की उम्मीदों के मुताबिक कहां चलती है. मुज़फ़्फ़रनगर दंगे: 'अगर चुनाव नज़दीक ना होते तो...दंगे भी ना होते'
समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव को सुशासन से ज्यादा चिंता लोकसभा चुनाव में मुस्लिम वोटों को कांग्रेस के पास जाने से रोकने की है.
मुज़फ़्फ़रनगर का दंगा सपा की इसी चाहत की देन है.

पार्टी और सरकार को पता था कि आग सुलग रही है और किसी भी समय ज्वाला बन सकती है. पर सरकार ने जानबूझकर कर इसे नजरअंदाज किया.
उसे ऐसी किसी घटना की बड़ी शिद्दत से तलाश थी जिसके जरिए वह मुसलमानों की एकमात्र रहनुमा होने के दावे को पुनर्स्थापित कर सके.
उसे भरोसा था कि वह अपने इस मक़सद में कामयाब होगी क्योंकि प्रशासन उसके हाथ में है.
लेकिन मुस्लिम समुदाय के ख़िलाफ़ जाटों की प्रतिक्रिया का वह अंदाज़ा नहीं लगा पाई.
नतीजा यह हुआ कि मुसलमानों की नजर में समाजवादी पार्टी उनकी रहनुमा की बजाय आततायी बन गई.
यह पहली बार हुआ कि एक के बाद एक मुस्लिम संगठन अखिलेश सरकार की बर्ख़ास्तगी की मांग करने लगे.
सो चौबे जी छब्बे बनने की कोशिश में दूबे रह गए.
भारतीय जनता पार्टी: मौक़े की तलाश
राज्य में साम्प्रदायिकता के इस खेल के दूसरे सिरे पर भारतीय जनता पार्टी है, जिसे उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में हमेशा किसी भावनात्मक या कहें कि साम्प्रदयिक मुद्दे की तलाश रहती है.
पिछले अवसरों की तुलना में इस बार फ़र्क इतना है कि इस बार उसे यह माहौल मुलायम सिंह और उनकी पार्टी की सरकार ने सौगात में दे दिया है.
चौरासी कोसी परिक्रमा की नाकाम कोशिश के ज़रिए जो वह नहीं कर पाई वह समाजवादी पार्टी ने उसके लिए कर दिया.

मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों ने चौधरी चरण सिंह के समय से बने मुस्लिम-जाट समीकरण को तोड़ दिया है.
दंगे पहली बार शहर से निकलकर गांव तक पहुंच गए हैं.
भाजपा के विधायकों के खिलाफ भावनाएं भड़काने के जो आरोप लगे हैं वे बदले माहौल का राजनीतिक फायदा उठाने की आतुरता का ही प्रमाण है.
दंगों पर दुख जताने वाले भाजपा नेताओं की दबी हुई ख़ुशी देखना कोई कठिन काम नहीं है.
काँग्रेस: हींग लगे न फिटकरी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में करीब ढाई दशकों से हाशिए पर रहने के वाली कांग्रेस के मन में नए अंकुर फूटने लगे हैं.
मुलायम सिंह यादव के खिलाफ अखाड़े में उतरे बिना उसे मुसलमान वोट अपनी झोली में आते दिख रहे हैं.

काँग्रेस को बिना कुछ किए पंचायत में चौधरी बनने का मौका मिल गया है.
वह ऐसी स्थिति में है कि दोनों सम्प्रदायों की सहानुभूति हासिल करने की कोशिश कर सकती है.
प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी की मुज़फ़्फ़रनगर की यात्रा का यही मकसद है.
साम्प्रदायिकता के दो ध्रुवों के बीच कांग्रेस अपने को धर्मनिरपेक्ष साबित करने का अवसर खोज रही है.
लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जो हालात हैं उसमें दोनों सम्प्रदायों के लोग इस समय शायद एकतरफ़ा बात सुनना चाहते हैं.
बहुजन समाज पार्टी: लुट गई दुकान
बहुजन समाज पार्टी की हालत मेले में बैठे उस दुकानदार की तरह है जिसकी दुकान लुट गई और तमाशबीन उसके सामने ही दुकान लगाकर बैठ गए हैं.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सूबे की किसी पार्टी का सबसे बड़ा जनाधार है तो वह बसपा ही है.
इस इलाके से उसे सबसे ज्यादा सीटें मिलती हैं.

उसकी मुश्किल है कि वह किसी एक सम्प्रदाय के साथ खड़ी नजर नहीं आ सकती.
लोकसभा चुनाव में अगर साम्प्रदायिक आधार मतदान हुआ तो उसे न तो ख़ुदा मिलेगा न ही विसाले सनम.
बसपा अध्यक्ष मायावती इस बात को बखूबी समझ रही हैं.
इसीलिए वे आरोप लगा रही हैं कि यह समाजवादी पार्टी और भाजपा का मिलाजुला खेल है.
सवाल है कि उनका कोर वोटर, जाटव, साम्प्रदायिकता के माहौल में धर्मनिरपेक्षता की बात सुनेगा या नहीं.
इसी से तय होगा कि मुसलमान मतदाता बसपा के साथ आएगा या नहीं.
राष्ट्रीय लोकदल: अब आगे क्या?

राष्ट्रीय लोकदल के नेता चौधरी अजित सिंह का राजनीतिक वजूद अगर बना हुआ है तो वह केवल जाट-मुस्लिम गठबंधन के कारण.
1998 में जाट भाजपा के साथ गया तो वे अपनी लोकसभा सीट भी हार गए थे.
उन्हें हराने वाले सोमपाल शास्त्री ने हवा रुख़ भांप लिया है.
उन्होंने समाजवादी पार्टी का लोकसभा टिकट ठुकरा दिया है.
सोमपाल कहां जाएंगे यह संकेत होगा कि जाट किधर जाने वाले हैं.
आगामी लोकसभा चुनाव अजित सिंह के लिए राजनीतिक वजूद की लड़ाई होगी.
सवाल है कि काँग्रेस उनके साथ क्या सुलूक करेगी?
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