मुज़फ़्फ़रनगर दंगे: 'अगर चुनाव नज़दीक ना होते तो...दंगे भी ना होते'

- Author, अविनाश दत्त
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी, मुज़फ़्फ़रनगर से
आगरा में समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बोलते हुए मुज़फ़्फ़रनगर में हो रही हिंसा को मुलायम सिंह यादव ने 'जातीय संघर्ष' करार दिया है, 'दंगा' नहीं.
उन्होंने कहा कि मुज़फ़्फ़रनगर में एक घटना हुई जिसे विपक्षी दल तूल दे रहे हैं.
उनकी पार्टी के नेताओं ने मुज़फ़्फ़रनगर में हो रही हिंसा के लिए स्थानीय प्रशासन को ज़िम्मेदार ठहराया है.
लेकिन मुज़फ़्फ़रनगर में लोग समाजवादी पार्टी के नेताओं के इस तर्क को मानने के लिए तैयार नहीं हैं.
मुज़फ़्फ़रनगर की एक मुस्लिम बहुल बस्ती में रहने वाले अतुल हसन वकील हैं और ग्रामीण इलाकों में दंगों के बहुत से पीड़ित उनसे मदद के लिए जुड़े हुए हैं.
अतुल हसन कहते हैं, "यह राजनीति के कारण है. अगर लोक सभा चुनाव नज़दीक न होते तो ये दंगे न होते."
'राजनीति'

हसन की तरह ही बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष राजेश्वर दत्त त्यागी ज़ोर देकर कहते हैं, "यह वोटों की राजनीति है. ध्रुवीकरण होगा तो मुसलमान एक तरफ़ जाएगा हिन्दू दूसरी तरफ़."
मुज़फ़्फ़रनगर में आप किसी से भी मिलें, चाहे वो दंगा पीड़ित हो या महज़ कर्फ्यू का मारा. किसी भी धर्मं का हो, कट्टर हो या दूसरे पक्ष को दंगे का दोषी मानने वाला हो लेकिन एक बात पर हर किसी की राय समान है.
वो यह कि अगर अगले लोक सभा चुनाव खिड़की से न झांक रहे होते तो ये दंगे न होते.
ये दंगे आम दंगों से थोड़े अलग हैं. एक तो ये ज़्यादातर ग्रामीण इलाकों में हुए. दूसरा अधिकांश मामलों में यह जाटों और मुसलमानों के बीच हुए.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पिछले साठ सालों में ये दोनों समुदाय कभी आपस में नहीं लड़े.
यहाँ तक कि अयोध्या विवाद के दौरान या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में समय-समय पर हुए अन्य दंगों के दौरान भी.
हालात कब सामान्य होंगे?
ये दोनों समुदाय आम तौर पर गांवो में एक दूसरे के साथ इससे पहले तक चैन से रहे.
राजनीति के रंग कुछ भी हों, तेवर कलेवर कुछ भी हों और चुनावों का ऊंट किसी भी करवट बैठे लेकिन इसकी शिकार अज़रा आसानी से अपने जीवन को सामान्य नहीं कर पाएंगी.

मुज़फ़्फ़रनगर के ज़िला अस्पताल में एक पलंग पर हाथ पर पट्टी बांधे लेटी अज़रा बताती है, "वो आए. मुझे गन्ना काटने वाला चाक़ू मारा. मेरी बहन को गोली लगी जिससे वो मर गई. दादी मर गई और चाचा भी मर गए."
मुज़फ़्फ़रनगर में हज़ारों हज़ार लोग घरों से भाग गए हैं और अनौपचारिक शरणार्थी शिविरों में, रिश्तेदारों के यहाँ, मदरसों में और खुले मैदानों में डेरा डाले हुए हैं.
इन्ही में से एक आदमी, जो बेहद डरा हुआ है और अपने रिश्तेदार के यहाँ रह रहा है, ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "अभी नहीं कह सकते कि कब लौटेंगे. गांव में मकान है, छोड़ देंगे. नहीं जाएंगे शायद."
जो नहीं लौटेंगे. वो परदेश में अपने गांव के आदमी को देखकर डरेंगे, खुश नहीं होंगे और जो लौटेंगे वो हर दम किसी रस्सी को देखकर सिहरते रहेंगे.
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