क्यों ऐतिहासिक है दिल्ली की घटना?

- Author, हर्ष मंदर
- पदनाम, सामाजिक कार्यकर्ता
दिल्ली में 16 दिसंबर को चलती बस में सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद लोगों की प्रतिक्रिया कई मायनों में ऐतिहासिक थी.
एक तरह से न सिर्फ हिंदुस्तान में बल्कि पूरी दुनिया में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण हो जहां महिला हिंसा को लेकर इस तरह का जनाक्रोश देखने को मिला.
यह अपने आप में महत्वपूर्ण है. एक महीने के अंदर जस्टिस वर्मा की कमेटी ने रिपोर्ट सौंप दी, वह भी काबिले तारीफ़ है.
महिला समानता पर विश्वास करने वाले लोग और संगठन 30-40 सालों से इस तरह के क़ानून की मांग कर रहे थे, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिल सकी थी.
ऐसे में यह घटना इसलिए भी ऐतिहासिक रही क्योंकि जो लड़ाई 30-40 सालों से सफल नहीं हो पाई थी, क़ानून में वो परिवर्तन हम दो-तीन महीनों में देख पाए.
समर शेष है
एक क़ानून को बदलना अपने लिए ज़रूरी तो है, लेकिन पर्याप्त नहीं.
हमें जो सामाजिक बदलाव लाने हैं, वो अधिक महत्वपूर्ण हैं.
हम अपने लड़कों को किस तरह से बड़ा कर रहे हैं, अमीर और गरीब के बीच बढ़ता फासला, समाज में हिंसा की जगह और सबसे अहम बात यह है कि आज भी सशक्त महिला को पुरुष को सहन नहीं कर पाते हैं. इस तरह के मुद्दों पर सामाजिक रूप से बदलाव लाना बहुत ज़रूरी है.
तभी बदलाव की बयार को साफ तौर से महसूस किया जा सकेगा.
वंचित तबके की चिंता

मेरा यह मानना है कि देश के सभी शहरों में चेतना बढ़ी है और इसलिए महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों को लेकर आक्रोश भी बढ़ा है, जो अच्छी बात है.
लेकिन इस चेतना और चिंता में एक बहुत बड़ी कमी यह है कि हम भूल रहे हैं कि सबसे ज्यादा हिंसा उन लड़कियों और औरतों पर होती है जो आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे कमजोर हैं.
जैसे शहरों में बेघर महिलाओं के साथ यौन शोषण लगभग हर रात होता है.
इसे रोकने के लिए कुछ साधारण पहल करनी हैं, जो हम कर नहीं रहे हैं.
दलित महिलाएँ हैं, आदिवासी महिलाएँ हैं, दंगों से ग्रस्त लोगों में जो यौन शोषण होता है, उग्रवाद से प्रभावित जो इलाके हैं, वहां जो यौन शोषण होता है, उनके प्रति वैसे संवेदना या आक्रोश देखने को नहीं मिल रहा है, जैसा कि मध्य वर्ग के बीच देखने को मिला है.
गांव या शहर की तुलना नहीं

अभी ऐसी स्थिति नहीं बनी है कि हम प्रभावी रूप से यह कह सकें कि शहर या गांव में कहाँ हिंसा ज्यादा है.
सरकारी दस्तावेजों में जो पंजीकृत आपराधिक मामले हैं, वो एक तरह से काफी भ्रामक होते हैं.
ऐसा इसलिए है क्योंकि अगर किसी राज्य में बड़ी संख्या में महिला हिंसा के मामले दर्ज होते हैं तो कई बार यह इस बात का संकेत हो सकता है कि वहां हिंसा बढ़ी है और कई बार यह भी हो सकता है कि पुलिस प्रशासन अधिक संवेदनशीलता और तत्परता के साथ उन्हें पंजीकृत कर रहा है.
मुझे लगता है कि आंकड़ों के आधार पर यह कहना काफी मुश्किल है कि गांव या शहर में कहां महिला हिंसा ज्यादा है. हां दोनों जगह हिंसा का स्वरूप काफी अलग है.
(बीबीसी संवाददाता के साथ बातचीत पर आधारित)
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