इन्होंने 'नो मिनिस्टर' कहने का साहस दिखाया

- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
बिशन नारायण टंडन उत्तर प्रदेश काडर के 1951 बैच के आईएएस अधिकारी थे. वो 1969 से 1976 तक प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव हुआ करते थे.
इससे पहले वो दिल्ली में उपायुक्त थे और उन्होंने ही राजीव और सोनिया गाँधी के विवाह को पंजीकृत कराया था.
प्रधानमंत्री कार्यालय में उनके कार्यकाल के दौरान इंदिरा गाँधी के काम करने की शैली को उन्होंने पसंद नहीं किया था. उनका मानना था कि वो देश को ग़ेलत राह पर ले जा रही हैं और उन्होंने अपने बेटे संजय गाँधी को सत्ता और प्रभाव का दुरुपयोग करने दिया.
साल 1976 में उन्हें अतिरिक्त सचिव बनाकर संस्कृति विभाग में भेज दिया गया. साल 1980 में जब इंदिरा गाँधी सत्ता में वापसआईं तो उन्होंने ये फ़ैसला किया कि केंद्र में टंडन को न तो कोई पदोन्नति मिलेगी और न ही उनकी कोई नियुक्ति होगी.
साथ ही उन्होंने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीपति मिश्र को भी निर्देश दिया कि उन्हें राज्य में भी पदोन्नत न किया जाए और न ही कोई महत्वपूर्ण पद दिया जाए.
आख़िरकार उन्होंने समय से पहले ही साल 1983 में स्वैच्छिक अवकाश ले लिया.
सख़्त कार्रवाई का सिला
राजीव गाँधी के कार्यकाल के दौरान विनोद पांडेय वित्त मंत्रालय में राजस्व विभाग में सचिव और भूरे लाल वित्त मंत्रालय में ही प्रवर्तन निदेशालय में निदेशक थे.
तत्कालीन वित्त मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की देखरेख में इन दोनों ने कर चोरी करने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करने का बीड़ा उठाया.
थापर, बाटा, लिप्टन, वोल्टास और किर्लोस्कर के दफ़्तरों पर छापे मारे गए. राजीव गाँधी के नज़दीकी दोस्त अमिताभ बच्चन और उनके भाई अजिताभ बच्चन को भी विदेशी मुद्रा अधिनियम के उल्लंघन के आरोप में जाँच के दायरे में ले लिया गया और धीरूभाई अंबानी के पेट्रोलियम कारख़ाने की जांच भी शुरू कर दी गई.

कुछ ही दिनों में न सिर्फ़ वीपी सिंह को वित्त मंत्रालय से हटा कर रक्षा मंत्रालय में भेज दिया गया और भूरे लाल से प्रवर्तन निदेशालय ले लिया गया बल्कि उन्हें राजस्व मंत्रालय से हटा कर आर्थिक मामलों के मंत्रालय के साथ संबद्ध कर दिया गया.
विनोद पांडेय का भी हश्र काफ़ी बुरा रहा. उन्हें राजस्व मंत्रालय से हटा कर ग्रामीण विकास जैसे कम महत्वपूर्ण मंत्रालय भेज दिया गया.
पूरा मंत्रिमंडल उनके इतना ख़िलाफ़ हो गया कि एक बार जब उनके मंत्रालय के किसी प्रस्ताव पर चर्चा हो रही थी तो कुछ मंत्रियों ने उनसे बहुत अभद्र ढ़ंग से सवाल पूछे.
पांडेय ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई लेकिन धीरे से ये ज़रूर कहा कि अगर सरकार उनके काम से ख़ुश नहीं है तो वो वापस अपने गृह काडर राजस्थान जाने के लिए तैयार हैं. बाद में जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने तो यही विनोद पांडेय कैबिनेट सचिव बने और भूरे लाल को प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव बनाया गया.
प्रेस कांफ़्रेंस में बर्ख़ास्तगी
21 जनवरी 1987 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने विदेश सचिव ए पी वेंकटेश्वरन को बहुत अपमानजनक परिस्थतियों में एक प्रेस कान्फ़्रेंस के दौरान बर्ख़ास्त किया.
जब एक पाकिस्तानी पत्रकार ने उनसे सवाल किया कि पाकिस्तान की भावी यात्रा के बारे में आपके और आपके विदेश सचिव के विचारों में इतना फ़र्क क्यों है तो राजीव गाँधी ने जवाब दिया कि जल्द ही आप नए विदेश सचिव से बात करेंगे. अपमानित वेंकटेश्वरन ने उसी दिन अपना त्यागपत्र भेज दिया.
महाराष्ट्र में धूलिया के कलेक्टर अरुण भाटिया ने साल 1982 में जब राज्य रोज़गार गारंटी योजना में हो रही धांधलियों का पर्दाफ़ाश किया तो इसका फल उन्हें भुगतना पड़ा.
आंध्र प्रदेश में बिजली सचिव के तौर पर काम कर रहे ईएएस सरमा ने बिजली उत्पादकों के साथ एक समझौते पर दस्तख़त करने से मना कर दिया.

ज़ाहिर है राज्य सरकार ने इसे पसंद नहीं किया और सरमा को इसकी क़ीमत चुकानी पड़ी.
29 साल में 39 तबादले
बिहार में साल 2009 में आईएएस अधिकारी मनोजनाथ ने बिहार राज्य विद्युत बोर्ड के लोगों और बिजली चोरी करने वालों के बीच गठजोड़ को तोड़ने की कोशिश की थी जिसका उन्हें नुक़सान उठाना पड़ा था.
29 साल के करियर में उनका 39 बार तबादला किया गया.
1979 बैच के आईएएस अधिकारी के जी अल्फॉन्स ने दिल्ली विकास प्राधिकरण के आयुक्त के तौर पर अवैध निर्माण के ख़िलाफ़ मुहिम चलाई थी. उन्हें डिमॉलिशन मैन की पदवी ज़रूर दी गई थी लेकिन राजनीतिक गलियारों में उनके दुस्साहस को हिक़ारत की नज़र से देखा गया था.
कर्नाटक काडर के वी बालसुब्रमणियम ने साल 2011 में एक रिपोर्ट में राज्य सरकार को ज़मीन हड़पने को दोषी ठहराया था. राज्य सरकार ने उस रिपोर्ट को छापने से इंकार कर दिया था.
बाद में उन्होंने अपने पैसे से उस रिपोर्ट को छपवाया और उसकी 2,000 प्रतियां बांटीं.
मुंबई नगर निगम के पूर्व उपायुक्त जीआर खैरनार ने दाऊद इब्राहिम की 29 इमारतों को गिराया. उन्होंने इस्टैबलिशमेंट को इतना नाराज़ कर दिया कि उन्हें साल 1994 में छह सालों के लिए निलंबित कर दिया गया.
इसी कड़ी में बिहार के एक पूर्व मुख्य सचिव स्वर्गीय वीके वी पिल्लै का उदाहरण देना अनुचित नहीं होगा. एक बार बिहार के सार्वजनिक कार्य मंत्री ने बहुत ही सतही कारणों से मुख्य अभियंता को अपने पुराने पद पर तैनात कर दिया.
मुख्य सचिव पिल्लै ने तुरंत मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह से न सिर्फ़ मुलाक़ात की बल्कि इस फ़ैसले का विरोध करते हुए राज्य के सारे सचिवों के इस्तीफ़ा उन्हें सौंप दिए.
नतीजा ये रहा कि मुख्य अभियंता को न सिर्फ़ वापस अपने पद पर बुलाया गया बल्कि मंत्री को उनकी गुस्ताख़ी के लिए बाक़ायदा डांट पिलाई गई और आधिकारिक चेतावनी भी दी गई. आज कल के युग में क्या राजनीतिक नेतृत्व से इस तरह के क़दम की उम्मीद की जा सकती है.
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