बिना सरकारी दखल के नहीं संभल पाएगा रुपया

- Author, अरुण कुमार
- पदनाम, अर्थशास्त्री
मुद्रा बाज़ार बेहद अनुमानों पर आधारित (speculative) बाज़ार है. इसका मतलब यह है कि इसमें लाभ कमाने के लिए अनुमान लगाकर निवेश किया जाता है. अगर एक बार यह अनुमान गड़बड़ा जाए तो इसके विपरीत प्रभाव तेज़ी से नज़र आने लगते हैं.
अगर एक बार यह शुरू हो जाए तो मुद्रा गिरने लगती है और इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.
जैसे कि रुपये की कीमत गिरी है तो पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ जाएंगे. उससे बाकी सभी चीज़ों का मूल्य बढ़ जाएगा, मुद्रास्फ़ीति बढ़ जाएगी.
ऐसी स्थिति हमेशा पलटने योग्य नहीं होती.
निवेश बढ़ाएं
अमरीकी अर्थशास्त्री एलन ग्रीनस्पैन ने 2008 में अमरीकी सीनेट की सुनवाई में कहा था कि बाज़ार खुद नहीं सुधरता है. पहले यह लगता था कि बाज़ार <link type="page"><caption> खुद ही सुधर जाता है</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/08/130823_rupees_fall_whos_fault_rd.shtml" platform="highweb"/></link> इसलिए उसे <link type="page"><caption> उसके हाल पर</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/08/130819_rupee_decline_impact_dhirendra_an.shtml" platform="highweb"/></link> छोड़ दिया जाना चाहिए.
मेरा मानना है कि बाज़ार इतना गिर गया है कि इसका अर्थव्यवस्था पर स्थाई प्रभाव पड़ेगा और इसे पलटना (reversal) <link type="page"><caption> आसान नहीं रहेगा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/08/130821_rbi_moves_liquidity_boost_pk.shtml" platform="highweb"/></link>.
ऐसा नहीं है कि रुपया फिर से 53-54 रुपये प्रति डॉलर के स्तर आसानी से पहुंच जाएगा- अगर सरकार बहुत कड़े कदम न उठाए तो.
आरबीआई के पास 280 अरब डॉलर का रिज़र्व है, हालांकि यह हमारी देयताओं-380 अरब डॉलर से कम है, फिर भी जब रुपया 23-54 से गिरना शुरू हुआ था तो आरबीआई को दखल देना चाहिए था.

सरकार को भी मुद्रास्फ़ीति को रोकने के कदम उठाने चाहिए थे.
हमारी निवेश बचत दर गिरने से हमारी साख कमज़ोर हुई है और विकास दर गिरी है.
इसलिए निवेश के ढांचे को बाज़ार आधारित व्यवस्था से अलग करना सरकार की ज़िम्मेदारी है.
सरकार की यह भी ज़िम्मेदारी है तो पिछले चार साल से जैसे अर्थवस्था निष्प्राण रही है उसे ख़त्म करे और अर्थव्यवस्था में निवेश को प्रोत्साहित करे- सामाजिक क्षेत्र, आधारभूत ढांचे में निवेश करे.
सरकार की कोशिशें
चालू खाते के घाटे को कम करने के लिए जो कोशिशें की गई हैं वह सही हैं- जैसे कि सोने के आयात पर शुल्क बढ़ाया गया, प्रतिबंध लगाए गए, निवेश बढ़ाने की बात की जा रही है.
लेकिन दिक्कत यह है कि चुनाव आने वाले हैं और निजी निवेशक की चिंता आने वाली सरकार को लेकर है. वह सोच रहा है कि कौन सी सरकार आएगी, टिकाऊ होगी भी या नहीं... इसलिए निजी निवेशक अभी आगे आएंगे इसमें संदेह है.
इसलिए सरकारी निवेश को बढ़ाना पड़ेगा. पिछले दो-तीन साल से जो सरकार राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए योजनागत व्यय को कम कर रही थी- उस नीति को बदलना होगा. निवेश बढ़ाना होगा.
तो सरकार को अपना निवेश बढ़ाना होगा और देश में अनिश्चितता की स्थिति को ख़त्म करना होगा तभी स्थितियां सुधर सकती हैं.
(समीरात्मज मिश्र से बातचीत पर आधारित)
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