आरटीआई: 'नेताओं में हेकड़ी है कि उनसे सवाल कैसे कर सकते हैं'

- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
आरटीआई कार्यकर्ता और केन्द्रीय सूचना आयोग के भूतपूर्व कमिश्नर शैलेश गाँधी ने कहा कि अधिकतर सांसदों ने ये स्वीकार किया कि सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून में संशोधन की ज़रुरत नहीं है लेकिन सांसद अपनी पार्टी के ख़िलाफ़ जाना नहीं चाहते.
वहीं न्यूयॉर्क में रहने वाले आरटीआई कार्यकर्ता सुरेश अडिगा का कहना है कि उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी को भी फोन किया था लेकिन कई बार फोन करने के बावजूद उन्होंने जवाब नहीं दिया.
शैलेश गाँधी के मुताबिक उन्होंने खुद 15 सांसदों से फोन पर बात की है. राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के दायरे से बाहर रखने के लिए संशोधन सोमवार को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया था.
कई सामाजिक कार्यकर्ता इस संशोधन का विरोध कर रहे हैं.शैलेश गाँधी के अनुसार सांसदों को अपने दलों कर विरोध करना चाहिए. वो कहते हैं, “वो सांसद हैं. भेड़ बकरी तो नहीं कि जो उन से कहा जाए वो आँख बंद करके मान लें.”
शैलेश गाँधी के मुताबिक सांसदों को फ़ोन करने का विचार उन्हें विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के आरटीआई कार्यकर्ता सुरेश अडिगा ने दिया.
केंद्रीय मंत्रिमंडलने एक अगस्त को राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखने के लिए कानून में संशोधन करने के एक प्रस्ताव को मंजूरी दी थी.
कई सासंद हैं सहमत
न्यूयॉर्क के रहने वाले सुरेश अडिगा और उनके कई साथियों ने अब तक 60 से अधिक भारतीय सांसदों से फ़ोन पर बात की है और उनसे अपील की है कि वह इस संशोधन का विरोध करें.
सुरेश ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “मेरे ज़िम्मे था भारतीय जनता पार्टी सांसदों को फोन करना. मैंने अकेले 30 से अधिक भाजपा सांसदों से फोन पर बात की. वे हमारी बात से सहमत थे कि इस संशोधन की ज़रुरत नहीं लेकिन वे अपनी पार्टी के खिलाफ नहीं जाना चाहते."
सुरेश के अनुसार अधिकतर सांसदों को ये शिकायत थी कि इस तरह के बड़े फैसले पार्टियों के वरिष्ठ नेता कर लेते हैं और उन्हें शामिल तक नहीं किया जाता. दरअसल सारे सांसद दल बदल कानून से डर रहे हैं और इसीलिए वो पार्टी के बड़े नेताओं से बात नहीं करना चाहते है. साथ ही इस मुद्दे पर किसी भी पार्टी ने चर्चा की ही नहीं है.
सुरेश के मुताबिक सांसदों का तर्क था दिया कि अगर निजी तौर पर आज वो आपको समर्थन देते हैं तो कल उन्हें पार्टी से निकाल दिया जाएगा और उस वक्त क्या आरटीआई वाले उन्हें बचाने आएंगे क्या?"
शैलेश गाँधी कहते हैं कानून में संशोधन दो बातें ज़ाहिर करता है. वे बताते हैं, “एक तो यह कि <link type="page"><caption> पार्टियों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/08/130802_rti_nikhil_dey_nn.shtml" platform="highweb"/></link> में एक तरह का भय है कि कहीं ज़्यादा गंदगी बाहर न आ जाए. और दूसरे यह उनकी हेकड़ी है कि उनसे कोई सवाल नहीं कर सकता.”
शैलेश गाँधी कहते हैं पार्टियों को ये भी खतरा है कि इससे संस्थाओं पर बुरा असर होता है लेकिन वो इससे सहमत नहीं. “पुलिस और सेना भी आरटीआई के अंतर्गत आती हैं, क्या इन संस्थाओं को कोई नुकसान पहुंचा है?”
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