आरटीआई ऐक्ट में संशोधन को कैबिनेट की मंज़ूरी

मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी

भारत में केंद्रीय कैबिनेट ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम में संशोधन को मंज़ूरी दे दी है. संशोधन के तहत राजनीतिक दलों को इस क़ानून से अलग रखने का प्रस्ताव है.

पिछले दिनों इस मुद्दे पर केंद्रीय सूचना आयुक्त के फ़ैसले के बाद से ही ऐसा माना जा रहा था कि सरकार इस क़ानून में संशोधन ला सकती है.

तीन जून को अपने में केंद्रीय सूचना आयोग ने कहा था कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी समेत छह बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ सूचना के अधिकार क़ानून के दायरे में आती हैं और देश के नागरिक उनसे सूचना मांग सकते हैं.

आयोग के इस फ़ैसले के बाद कुछ पार्टियों को छोड़कर सभी पार्टियों ने एक स्वर से इस फ़ैसले की आलोचना की थी. हालाँकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और आम आदमी पार्टी ने इस फ़ैसले का स्वागत किया था.

प्रस्ताव

भाजपा

राजनीतिक दलों के कड़े रुख़ के कारण अब सरकार ने इस क़ानून में संशोधन का प्रस्ताव रखा है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ क़ानून में संशोधन के प्रस्ताव के बारे में सरकारी नोट में कहा गया है, "आरटीआई ऐक्ट के अंतर्गत राजनीतिक दलों को सार्वजनिक इकाई के रूप में घोषित करना उनके आंतरिक कामकाज को प्रभावित करेगा. क्योंकि ये क़ानून दुर्भावना वाले राजनीतिक विरोधियों को इस क़ानून के तहत आवेदन करने के लिए बढ़ावा देगा."

आरटीआई ऐक्ट 2005 में संशोधन का ये प्रस्ताव अब मॉनसून सत्र के दौरान संसद में पेश किया जाएगा. संसद का मॉनसून सत्र सोमवार से शुरू हो रहा है.

संशोधन प्रस्ताव में कहा गया है कि सार्वजनिक इकाई की परिभाषा में जन प्रतिनिधि क़ानून के तहत पंजीकृत राजनीतिक दलों को शामिल नहीं किया जाएगा. साथ ही ये भी कहा है कि इसके ख़िलाफ़ कोई भी याचिका किसी भी अदालत में स्वीकार नहीं की जाएगी.

सरकार और राजनीतिक दल कहते रहे हैं कि जन प्रतिनिधित्व क़ानून और आयकर क़ानून के तहत राजनीतिक दलों के वित्तीय मुद्दों पर पर्याप्त पारदर्शिता रखी गई है.

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