'तोहफ़े नही, मर्ज़ी पर चलता है हिंदुस्तान का वोटर'

- Author, एमजे अकबर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करते हुए चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक पार्टियों के साथ बैठ कर चुनावी घोषणापत्रों में मुफ़्त बाँटी जाने वाली चीज़ों के स्वरूप पर दिशा निर्देश बनाए जाने की पहल की है.
भारत में अमूमन दो तरह के कार्यक्रम शुरू किए जाते हैं जिनसे मुफ़्त <link type="page"><caption> तोहफ़े </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130604_laptop_freebie_rationale_up_ns.shtml" platform="highweb"/></link>बाँटें जा सकें.
एक तो खाद्य सुरक्षा विधेयक जैसे अभियान होते हैं जिनके बारे में तमाम लोग यही कहते हैं कि इस योजना को वोट लेने के लिए तैयार किया गया है.
कुछ आलोचक कहते हैं कि इस कानून को लाकर अगर सरकार को ग़रीबों के पेट में खाना देना था तो <link type="page"><caption> सरकार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130602_laptop_freebie_uttarpradesh_ns.shtml" platform="highweb"/></link> बनने के पहले छह महीने में करना चाहिए था.
अपने कार्यकाल के आखिरी छह महीने में खाद्य सुरक्षा विधेयक को लाने के पीछे का कारण इन लोगों को साफ़ दिखता है.
लेकिन ग़ौरतलब है कि चुनाव आयोग इस तरह की किसी भी योजना को लागू करने के सरकार के अधिकार को ख़त्म नहीं कर सकता.
क्योंकि चुनी गईं सरकारों को नागरिकों के लिए इस तरह की योजनाएं लाने का अधिकार रहता है.
असल वजह

मेरे हिसाब से चुनाव आयोग की प्राथमिक चिंता <link type="page"><caption> चुनावी </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/03/130311_up_laptop_sm.shtml" platform="highweb"/></link>घोषणापत्रों में मुफ़्त दिए जाने वाले तोहफ़ों या योजनाओं को लेकर नहीं है.
चुनाव आयोग की परेशानी दरअसल उन चीज़ों को लेकर है जो, 'रात के अंधेरे में परदे के पीछे या तो गुप-चुप होती हैं या फिर जो ऐलानिया भी होतीं हैं'.
चुनावी वायदों के नाम पर भारत में कई राजनीतिक दल टेलीविज़न, सोना, लैपटॉप और अनाज पहले ही दे चुके हैं. हालांकि चुनाव आयोग ने भी पहले से हर उम्मीदवार और राजनीतिक दल पर चुनावी खर्च करने में काफ़ी सख़्ती बरत रखी है.
लेकिन सभी को पता है कि उतने कम पैसों से ज़्यादा में चुनाव लड़े जा रहे हैं. इन तमाम चीज़ों को ध्यान में रखते हुए मुझे नहीं लगता कि <link type="page"><caption> चुनाव आयोग</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/01/120122_punjab_election_laptop_sy.shtml" platform="highweb"/></link> मुफ्त तोहफ़े देने वाले मामले में अभी कुछ निर्णायक कदम ले सकेगा.
सबसे महत्त्वपूर्ण बात यही है कि भारत का वोटर इन छोटे-मोटे तोहफ़ों या योजनाओं से नहीं बहकता है. हिंदुस्तान का वोटर मुफ़्त तोहफ़े से नही अपनी मर्ज़ी पर चलता है. अगर ऐसा नहीं होता तो तमिलनाडु में सरकार कभी नहीं बदलती.
कीमत

भारत के सभी लोगों को इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि सभी सरकारी योजनाएं या चुनाव से पहले मुफ़्त वायदे किए गए तोहफ़े उन्ही लोगों का पैसा है.
चाहे दिल्ली हो या लखनऊ राजनीतिक दल अपनी तिजोरी से कभी भी पैसा निकाल कर वोटरों को नहीं देते. ये तो कर का पैसा है जो उन तक वापस हो पाता है और वो भी बहुत कम.
हालांकि भारत का <link type="page"><caption> वोटर </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/" platform="highweb"/></link>ग़रीब हो सकता है, मध्यम वर्ग का हो सकता है, लेकिन उसे पता है कि मुफ़्त में मिलने वाला लैपटॉप उन्ही का दिया हुए पैसा है.
सीधी बात ये है कि अगर कोई भी सरकार सीधे या उलटे तरीके से वोट खरीद सकती तो कभी भी चुनाव नहीं हारती. लेकिन भारत का इतिहास यही कहता है कि बहुत कम सरकारें ही दोबारा चुनाव जीत कर सत्ता में आती हैं.
(वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर की बीबीसी हिंदी के नितिन श्रीवास्तव से हुई बातचीत पर आधारित)
<bold>(क्या आपने बीबीसी हिन्दी का नया एंड्रॉएड मोबाइल ऐप देखा? डाउनलोड करने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml " platform="highweb"/></link>करें. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे <link type="page"><caption> फेसबुक</caption><url href="http://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> पन्ने पर भी आ सकते हैं और <link type="page"><caption> ट्विटर </caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link>पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












