अस्पताल से मुस्कुराते हुए निकले बीमार हुए बच्चे

- Author, अमरनाथ तिवारी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
बिहार के एक स्कूल में विषाक्त मध्याह्न भोजन खाने से बीमार हुए 22 स्कूली छात्रों को मंगलवार को पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (पीएमसीएच) से डिस्चार्ज कर दिया गया है.
बच्चों को पांच एंबुलेंस में पुलिस सुरक्षा के बीच उनके गांव के लिए रवाना किया गया.
दो बच्चों- काजल कुमारी, मंटू मेहता और स्कूल में खाना बनाने वाली मंजू देवी को अभी इलाज के लिए अस्पताल में ही रखा गया है.
करीब तीन हफ़्ते पहले 16 जुलाई को सारण ज़िले के एक स्कूल में पांच से 12 साल के 47 बच्चे विषाक्त मध्यान्ह भोजन खाने से बीमार पड़ गए थे. इसमें से 23 <link type="page"><caption> बच्चों की मौत</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/08/130802_politics_on_middaymeal_mishap_rd.shtml" platform="highweb"/></link> हो गई थी.
कल क्या होगा?
मंगलवार को मुस्कुराते चेहरों के साथ अस्पताल से घर जा रहे बच्चों को अस्पताल प्रशासन ने नए कपड़े और हेल्थ टॉनिक भी दिए हैं.
पीएमसीएच में बच्चों की देखरेख कर रहे दल के मुखिया डॉ निगम प्रकाश नारायण ने बीबीसी को बताया, “दो बच्चों और खाना बनाने वाली महिला मंजू देवी को अस्पताल में ही रखा गया है क्योंकि उन्हें अभी चिकित्सकीय सलाह की ज़रूरत है.”
सारण ज़िला सर्जन और ज़िला प्रशासन के <link type="page"><caption> अन्य अधिकारी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130724_bihar_mid_day_teachers_an.shtml" platform="highweb"/></link> भी <link type="page"><caption> बच्चों को घर ले जाने</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130724_bihar_school_midday_scheme_ns.shtml" platform="highweb"/></link> के लिए आए थे.
डॉ नारायण ने कहा, “उन्हें कुछ समय नियमित रूप से मासिक स्वास्थ्य परीक्षण करवाना होगा क्योंकि उनके शरीर निकोटीन से प्रभावित हैं. “इसकी वजह से रेस्पिरेटरी पैरालिसिस (श्वसन संबंधी लकवा) हो सकता है, इसलिए उन्हें कम से कम तीन महीने तक नियमित रूप से चिकित्सकीय निरीक्षण करवाना होगा.”

पीएमसीएच में भर्ती के दौरान <link type="page"><caption> बीमार बच्चों को</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130725_mid_day_meal_dp.shtml" platform="highweb"/></link> नियमित अंतरात पर “एट्रोपाइन” नाम का विषनाशक दिया गया.
डॉ निगम ने यह भी कहा कि एक महीने बाद डॉक्टरों का एक दल बच्चों की जांच के लिए उनके गांव जाएगा.
पीएमसीएच के अधीक्षक डॉ अमरकांत झा ने कहा, “अगर उन्हें समय पर यहां लाया जा सकता तो <link type="page"><caption> कई और जानें बचाई</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130723_bihar_mdms_tragedy_report_sp.shtml" platform="highweb"/></link> जा सकती थीं.”
हालांकि बच्चों के माता-पिता अब भी घबराए हुए हैं. तीन बच्चों के पिता सुरेंद्र प्रसाद की एक बेटी प्रियंका कुमारी की मिड डे मील हादसे में मौत हो गई थी और दो अब अस्पताल से छूट रहे हैं.
वह कहते हैं, “हमें कुछ नहीं पता कि क्या हो रहा है.... हम नहीं जानते कि कल हमारे बच्चों का क्या होगा?”
भूल जाओ मुफ़्त खाना
सुरेंद्र प्रसाद के परिवार से सात बच्चों और एक महिला खाना बनाने वाली मंजू देवी ने वह जानलेवा मध्यान्ह भोजन खाना था और उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती करवाया गया था.

मंजू देवी को तो अभी अस्पताल में भर्ती रहना होगा लेकिन उनके तीन बच्चे अस्पताल से छूटकर घर जा रहे हैं.
वह अपने बच्चों को ज़िंदा देखकर ख़ुश तो हैं लेकिन उन 23 बच्चों की याद कर वह बार-बार रोने लगती हैं, जो इस हादसे में मारे गए.
निर्बल, असहाय और दुखी मंजू कहती हैं, “ऐसे गांव वापस लौटने का क्या मतलब है जहां, एक या दो नहीं एक साथ 23 बच्चे मारे गए हों.”
हालांकि बच्चों को घर वापस ले जा रहे माता-पिता उन्हें दोषमुक्त महसूस कराने की कोशिश करते हैं.
भागेरु राय कहते हैं, “उनकी कोई ग़लती नहीं है. वह और उनके तीन बच्चे भी वह जानलेवा खाना खाकर बीमार पड़ गए थे. उन्हें अपराधी महसूस नहीं करना चाहिए.”
सात साल की प्रीति कुमारी और नौ साल की प्रेमन कुमारी दूसरे 20 बच्चों के साथ घर लौटते हुए ख़ुश हैं. लेकिन अपने तीन दोस्तों को इस हादसे में खोने के बाद प्रीति कहती हैं, “मैं ठीक हूं लेकिन अब मैं स्कूल में मुख्त खाना नहीं खाऊंगी.”
अपना चेहरा दूसरी ओर घुमाते हुए वह पूछती हैं, “अब मैं किसके साथ स्कूल जाऊंगी और खेलूंगी?”
प्रेमन भी ऐसा ही कुछ कहती हैं, “हमारी किस्मत अच्छी है कि हम ज़िंदा हैं. स्कूल में <link type="page"><caption> मुफ़्त खाने को भूल जाओ</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130723_bihar_mdms_tragedy_report_sp.shtml" platform="highweb"/></link>. हम तो अब स्कूल ही नहीं जाना चाहते.”
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml " platform="highweb"/></link>. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi " platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi " platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












