बिहार के बच्चों का इलाज पहरे में क्यों?

- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना (बिहार) से
बिहार के छपरा जिले के एक स्कूल में विषाक्त भोजन खाने से 23 बच्चों की तो मौत हो गई और 25 बच्चों का अब भी पटना मेडिकल कॉलेज में इलाज जारी है.
लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन ग्रामीण बच्चों का इलाज शिशु विभाग में कड़े पहरे के बीच हो रहा है.
किसी को अस्पताल के अंदर इन <link type="page"><caption> बच्चों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130718_mid_day_meal_questions_vt.shtml" platform="highweb"/></link> के पास या इनके परिजनों के पास तक फटकने की इजाज़त नहीं है.
अस्पताल के शिशु वार्ड में जैसे ही मैंने घुसने की कोशिश की, करीब पांच पुलिस वालों और जिला प्रशासन के लोगों ने मेरा रास्ता रोक लिया.
एक पुलिस उपाधीक्षक रवींद्र तिवारी का कहना था, "अंदर तो आप जा ही नहीं सकते, किसी परिवार वाले से बात करनी तो हो अस्पताल के बाहर ही हो सकती है".
सवाल ये भी है कि जितने भी ग्रामीणों को छपरा के गंडामन गाँव से लाया गया है वे सभी अस्पताल के भीतर ही मौजूद हैं और उन्हें भी बाहर निकलने से पहले प्रशासन के लोगों से पूछना पड़ रहा है.
अस्पताल का नज़ारा

मैंने भी ठान रखी थी अंदर इलाज करा रहे बच्चों की सुधि लेने की.
अस्पताल के बगल में एक द्वार है उससे कई गलियारे पार कर के भीतर का जो नज़ारा देखा तो दंग रह गया.
संकरे से एक गलियारे में जिसकी खिडकियों में शीशे तक नहीं थे और ऊपर सिर्फ दो पंखे हैं, बच्चों का इलाज हो रहा था.
गंदी चादरें बिछी थीं, एक-एक पलंग पर तीन से चार परिजन बैठे थे. न तो उन्हें किसी के आने की सुध था और न ही किसी के जाने की.

सिर्फ दो बड़े हॉलों में पूरे 25 बच्चों का इलाज चल रहा है .
अपने नाम के बदले अपने को स्थानीय प्रशासन का बताने वाले एक अफसर ने मुझसे कहा कि अगर किसी भी डॉक्टर से बात करनी है तो 'परमिशन' लानी होगी.
उन्हें खुद भी नहीं पता कि ये आदेश या परमिशन किससे लेना है.
जिद करने पर भीतर से उन्होंने पटना मेडिकल कॉलेज के उपाधीक्षक डॉक्टर बिमल कारक को भेजा .
डॉक्टर कारक ने बताया, " जिन 25 <link type="page"><caption> बच्चों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130718_mid_day_meal_soutik_fma.shtml" platform="highweb"/></link> का इलाज चल रहा है, उनमे से सिर्फ़ एक की ही हालत गंभीर है और बाकी बच्चे खतरे से बाहर हैं."
खाना बनाने वाली का इलाज

डॉक्टर कारक ने इस बात की भी जानकारी दी कि उस स्कूल में खाना बनाने वाली मंजू नाम की महिला का इलाज चल रहा है .
डॉक्टर कारक ने कहा, "मंजू ने अभी तक हमें यही बताया है कि उन्हें खाने में मिलावट का कोई अंदाजा नहीं था वर्ना वो ये भोजन अपने बच्चों को नहीं परोसती".
मंजू का ये बयान तो वाजिब लगता है लेकिन जो बात अभी तक गले से नहीं उतरी है वो ये है कि इन बच्चों को परदे के पीछे रख कर इनका इलाज क्यों किया जा रहा है?
क्या इस मामले में और पारदर्शिता की आवश्यकता नहीं है?
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