इशरत के क़त्ल तक नरेन्द्र मोदी से अनजान थे

इशरत जहाँ का परिवार
    • Author, इक़बाल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

गुजरात के अहमदाबाद में 2004 में एक कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मारी गई मुंबई की 19 वर्षीय इशरत जहां के परिवार का कहना है कि उन्हें तो पहले दिन से यक़ीन था कि उनकी बेटी पूरी तरह निर्दोष है लेकिन अब सीबीआई ने अदालत में चार्ज शीट दाख़िल कर भारत की न्याय प्रक्रिया में उनके विश्वास को और बढ़ा दिया है.

शनिवार को इशरत जहां के समर्थन में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के ज़रिए आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए दिल्ली पहुंची इशरत की मां और छोटी बहन से बीबीसी ने एक ख़ास बातचीत की.

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बीबीसी से बातचीत के दौरान इशरत की मां शमीमा कौसर ने कहा कि उनकी बेटी एक बहुत ही ग़रीब परिवार की साधारण सी लड़की थी जो अपने पिता की मौत के बाद घर की ज़िम्मेदारी निभा रही थी.

घर की कर्णधार

साल 2002 में मुंबई के मुंब्रा में रहने वाले इस परिवार के मुखिया यानि की इशरत के पिता की मौत हो गई थी.

इशरत की मां के अनुसार उसके बाद से ही इशरत के ऊपर छह भाई-बहनों वाले परिवार को चलाने की सारी ज़िम्मेदारी आ गई थी.

इशरत जहां
इमेज कैप्शन, इस मुठभेड़ के मामले में सीबीआई और आईबी के बीच में विवाद है.

उनकी मां ने बताया कि उनकी बेटी इशरत अपनी पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को ट्यूशन देकर परिवार का ख़र्चा चलाती थी.

लेकिन ये पूछे जाने पर कि मीडिया में बार-बार ये सवाल किए जा रहे हैं कि उस मुठभेड़ में मारे गए इशरत के साथी जावेद शेख़ से उनकी मुलाक़ात कैसे हुई इशरत की छोटी बहन मुसर्रत जहां का कहना था कि घर की ग़रीबी के कारण उन्हें जावेद शेख़ की नौकरी करनी पड़ी थी.

बीबीसी से बातचीते के दौरान मुसर्रत ने कहा कि अप्रैल के महीने में जब स्कूल गर्मियों की छुट्टी के कारण बंद हो जाते हैं तो ट्यूशन मिलना भी मुश्किल हो जाता है.

मुसर्रत के अनुसार उनके घर की आर्थिक स्थिति इशरत को इस बात की इजाज़त नहीं देती थी कि वो एक महीने बग़ैर पैसे कमाए रह सकें.

इसी दौरान उनके एक पड़ोसी ने जावेद शेख़ की नौकरी के बारे में जानकारी दी.

पैसों की तंगी के कारण इशरत ने जावेद शेख़ की नौकरी कर ली और इस सिलसिले में दो बार उनके साथ मुंबई से बाहर नासिक और पुणे तक गईं थीं.

फिर ना लौटी

तीसरी और आख़िरी बार इशरत जब जावेद के साथ बाहर निकलीं तो फिर लौट कर नहीं आई और 15 जून को उन दोनों की अहमदाबाद में एक मुठभेड़ में मौत हो गई.

पीपी पांडे
इमेज कैप्शन, गुजरात सरकार में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के पद से रिटायर हुए पीपी पींडे को सीबीआई ने इस मामले में अभियुक्त बनाया है.

ये पूछे जाने पर कि भारतीय जनता पार्टी इस पूरे मामले को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने की साज़िश कह रही है, इस पर इशरत की बहन मुसर्रत का कहना था कि 2004 में उनकी बहन की मौत के समय तो वो नरेंद्र मोदी के बारे में जानती तक नहीं थी.

(<link type="page"><caption> क्यों भगोड़ा है नरेद्र मोदी के राज का 'दबंग'</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130701_ishrat_fake_encounter_ps_pandey_vr.shtml" platform="highweb"/></link>)

उनके अनुसार उनके घर में टेलीविज़न नहीं था और उनके घर की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वो ख़बरों के बारे में कोई ज़्यादा जानकारी रखती.

मुसर्रत का कहना था, ''हमलोग किसी पार्टी के नहीं हैं, न हमलोग किसी पार्टी के लिए लड़ रहे हैं. जिस वक़्त ये हादसा हुआ तो हम लोग नरेंद्र मोदी को जानते तक नही थे.''

मुसर्रत के अनुसार राजनीति तो उनके परिवार के साथ हो रहा क्योंकि इशरत पर ये इलज़ाम लगाया गया था कि वो नरेंद्र मोदी को मारने के लिए गईं थीं.

उनके अनुसार इस मामले में राजनीति हो ज़रूर रही है लेकिन उनका परिवार इस राजनीति का हिस्सा नहीं है. उनके अनुसार अगर नौ साल पहले ही इस केस को हल कर लिया जाता तो ये सारी बातें निकल कर आती ही नहीं.

ख़ुफ़िया ब्यूरो के कुछ अधिकारियों के नाम आने के बारे में पूछे गए सवाल के बारे में मुसर्रत ने कहा कि उनका परिवार सिर्फ़ ये चाहता है कि अगर किसी अधिकारी ने ग़लती की है तो उन्हें उसकी सज़ा मिलनी चाहिए.

मुसर्रत का कहना था, ''अगर उन्होंने मेरी बहन का क़त्ल किया है तो उन्हें एक आम इंसान की तरह सज़ा मिलनी चाहिए. अगर कोई ऑफ़िसर है तो उनको बचाया जाए, ये कहीं का क़ानून नहीं है.''

इशरत की मां और बहन ने अंत में कहा कि उन्हें इस बात का पूरा एहसास है कि इंसाफ़ की लड़ाई का रास्ता बहुत कठिन है लेकिन उनका परिवार इसी उम्मीद पर जी रहा है कि एक न एक दिन उन्हें इंसाफ़ मिलेगा.

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