तबाही के बाद अपनों को तलाशते लोग

- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, ऋषिकेश
उत्तराखंड के कस्बों, शहरों में दफ़्तरों, कैंपों के बाहर तबाही के बाद गायब लोगों के परेशान, घबराए, रोते-बिलखते परिवारों का झुंड इकट्ठा हो रहा है.
गुमशुदा लोगों के लिए बनाए गए विशेष नंबरों पर लगातार, चौबीसो घंटे फ़ोन आ रहे हैं. सड़कों से सटी दीवारों, गाड़ियों, देहरादून के जॉ़ली ग्रांट एअरपोर्ट के बाहर कई जगह आपको गायब लोगों की तस्वीरें और रिश्तेदारों के मोबाइल नंबर लिखे मिल जाएंगे.
ये परिवार देश के कोने-कोने से आ रहे हैं. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एथ़ॉरिटी के अनुसार अभी तक करीब 1,800 लोग लापता हैं लेकिन कुछ रिपोर्टों में अधिकारियों को 3,000 का आंकड़ा देते हुए बताया गया है.
हरिद्वार ज़िला आपदा प्रबंधन अधिकारी डॉक्टर नरेश चौधरी बताते हैं, “जिन यात्रियों के परिजन बिछड़ गए हैं, वो आना शुरू हो गए हैं. पहले लोगों में रिश्तेदारों के बच जाने की उम्मीद थी लेकिन वेबसाइटों या दूसरी किसी सूची पर नाम नहीं मिलने के कारण लोग तस्वीरें लेकर पूछताछ करने हरिद्वार आ रहे हैं.”
ऋषिकेश बस अड्डे के बाहर हरियाणा पुलिस के एक स्टॉल के ने मेरा ध्यान खींचा. टेबल पर आधे से ज़्यादा भरा रजिस्टर रखा था. टेबल के पीछे प्लास्टिक की कमज़ोर कुर्सियों पर बैठे थे हरियाणा पुलिस के सतीश कुमार और बलदेव सिंह.
सतीश कुमार ने बताया, “हमने अभी तक 700-800 गायब हुए लोगों का नाम दर्ज किया है. हम हरियाणा के फंसे यात्रियों को बसों में वापस उनके घर भी भेज रहे हैं.”
कई दिनों से भटक रहे
करनाल से सुनीता परिवार के सदस्यों के साथ ऋषिकेश में अपने देवर दीपक सिंधवानी की तलाश में सात दिनों से भटक रही हैं. दीपक 11 मई से केदारनाथ में 16 लोगों के साथ भंडारा लगाने निकले थे लेकिन वापस नहीं लौटे.
16 जून को शाम चार बजे जब दीपक का फ़ोन आया था तो उन्होंने कहा था कि वहाँ पुल टूट गया है और वो फंसे हुए हैं.
सुनीता बिलखते हुए कहती हैं, “इनकी पत्नी, दो बच्चे बीमार हैं, और वो बिलख रहे हैं, पापा-पापा कहकर उनका बहुत बुरा हाल है.”
दीपक की बहन इंदु और भांजी सोनिया भी सुनीता के साथ आई हुई हैं.

रोते-रोते सुनीता कहती हैं, “प्लीज़ आप इनको ढुढ़वाइए. वो हमारे घर के एकमात्र मर्द हैं. हमारे मामा, नाना, बाप सब कुछ यही हैं.”
उधर हरियाणा पुलिस डीएसपी जीतेंद्र गहलावत ने बीबीसी को बताया कि उनके पास आ रही जानकारी को स्थानीय प्रशासन, सेना और एअरफोर्स के साथ बांटा जाता है ताकि अगर उन्हें कोई सहायता की ज़रूरत हो तो हरियाणा पुलिस मदद कर सके.
चुनौती
पुणे के 39-वर्षीय नीलेश नीनाव भी पिछले हफ़्ते से अपने माँ-बाप की तलाश में आस-पास के इलाकों में भटक रहे हैं. उनके पिता दत्रात्रेय गनपत निवास और लता भी 15 जून से लापता हैं. ये दोनो 70 लोगों के एक गुट के साथ पूना की शिवगौरी ट्रैवल्स से यहाँ आए थे.
अपनी आखिरी बातचीत में 15 जून को सुबह 8,30 बजे उन्होंने कहा था,, “हम रास्ते में अटक गए हैं और पूरा ट्रैफ़िक जाम है.” उसके बाद से उनका कोई पता नहीं लगा.
हफ़्ते भर से वो आईएएस अफ़सरों से मिल रहे हैं और सहायता पाने की कोशिश कर रहे है. उनके पिता के गुट के 45 लोग वापस आ जाने में कामयाब रहे लेकिन 25 का कुछ पता नहीं चला.
हरिद्वार ज़िले के आपदा प्रबंधन अधिकारी डॉक्टर नरेश चौधरी कहते हैं, “परिवारजनों को समझाना हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि हम प्रमाण नहीं दे पाते हैं कि उनके परिजन कहाँ है. पीड़ित लोग अपने परिजन के साथ हुई आखिरी बातचीत और जगह का ज़िक्र करते हैं. मन लायक सही जवाब नहीं मिलने पर वो खुद ही ढूँढने निकल जाते हैं.”
आने वाले दिनों में परिवारजनों को अपनों के बारे में अच्छी या बुरी खबर देना प्रशासन के लिए चुनौतीपूर्ण होगा. यहाँ ये बताना ज़रूरी होगा कि भविष्य में शवों की पहचान के लिए सभी शवों की डीएनए सैंपलिंग की जा रही है.
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