उत्तराखंड: आपदा का वो पहला दर्दनाक हफ़्ता..

- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मेरी स्मृति में उत्तराखंड की त्रासदी बहुत बड़ी आपदा है. इसमें फँसे लोगों और उनके परिजनों के पास एक दुःखभरी दास्तान थी. देहरादून से वापसी के समय सबके चेहरे याद आ रहे थे.
वहां नौ दिनों में सैकड़ों लोगों से मिला. उनके पास दिल को छू लेने वाली ढेर सारी बातें थीं.
उनकी तकलीफ और पीड़ा के आगे मन में किसी तरह के शक के लिए कोई जगह नहीं थी.
अपनों की कोई ख़बर नहीं
लोगों की बातों पर बहुत सहजता से भरोसा हो रहा था. सब कुछ सामने था. लोगों के चेहरे पर दुःख, कुछ खो देने का एहसास और सूनापन था.
लोगों के हाथ में बिछुड़ गए उनके अपनों की तस्वीरें थीं. जिनका अभी तक कोई पता नहीं है. जिनसे उनके परिवार के लोगों का संपर्क नहीं हो पा रहा है कि वे पहाड़ों में कहां खो गए?
अपने नौ दिन के अनुभव के बारे में यही कहूंगा, "मैंने कई बम धमाकों की ख़बरें लोगों तक पहुँचाईं, प्लेन क्रैश की ख़बरें भी लिखीं लेकिन इतनी बड़ी आपदा कभी नहीं देखी. मेरे अनुभव में यह हिंदुस्तान में सुनामी के बाद दूसरा सबसे बड़ी आपदा है."
याद आ रहा था परिवार

केदारनाथ उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले का सबसे प्रभावित क्षेत्र है. यहां मैं भारतीय वायु सेना के हेलीकॉप्टर से गया.
हेलीकॉप्टर में सिर्फ़ तीन लोग थे. पहाड़ों के बीच तेरह-चौदह हजार फुट के ऊपर हेलीकॉप्टर की यात्रा कैसी होती है, मुझे कतई इसका अंदाज़ा नहीं था. वायु सेना के कप्तान ने बताया कि देखिए नीचे जो नदी दिख रही है, उसी राह को पकड़कर जाना है.
दोनों तरफ पहाड़ हैं. अगर बीच में कोई बादल आ गया तो समझ लो हमारा काम यहीं तमाम हो गया.चालीस मिनट बाद मेरा गला सूख गया था. कप्तान ने मुझे ढांढस बंधाया और कहा कि हम मंज़िल तक सुरक्षित पहुंचेंगे.
हेलीकॉप्टर एक तिरछी पहाड़ी पर लैंड कर रहा था क्योंकि वहां कोई हेलीपैड नहीं है. उस वक़्त मुझे यक़ीन मानिए अपने परिवार वालों की बहुत याद आ रही थी.
चारों तरफ बस तबाही थी

केदारनाथ में उतरने के बाद चारों तरफ सिर्फ़ तबाही का मंज़र दिखाई दे रहा था. अस्सी-नब्बे लोग भूख-प्यास से तड़प रहे थे.
केदारनाथ मंदिर के चबूतरे की सीढ़ियों से नीचे का पूरा बाज़ार और धर्मशालाएं सब कुछ बाढ़ के मलबे से पट गया था. मंदिर के ठीक सामने एक नई ज़मीन आ गई है, जो पुरानी ज़मीन से दस से ग्यारह फीट ऊंची है.
लोगों का मानना है कि उस दिन यहां दस से बीस हज़ार लोग मौजूद थे.यहां की परिस्थिति को देखकर कल्पना करना भी मुश्किल है कि नई ज़मीन के मलबे के नीचे कितने लोग दब गए.
जहरीली घास बन गई मौत
मृतकों की संख्या का पता लगाना बहुत कठिन है. इस काम में महीनों लगेंगे. तमाम लोगों के बारे में कुछ पता नहीं है कि आखिर वे भागकर कहां पर गए?
ऐसे लोगों के बारे में स्थानीय लोग बताते हैं कि लोग अपनी जान बचाने के लिए ऊपर पहाड़ों पर चले गए.
उनके पास खाने को कुछ नहीं था. अपनी जान बचाने के लिए घास खाने का फैसला किया लेकिन उनको नहीं पता था कि जो घास वे खा रहे हैं ज़हरीली है. इस कारण से भी कुछ लोगों की मौत हो गई.
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