मीडिया में भी 'नमो-नमो'

गुजरात के मुख्यमंत्री को 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी की चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाए जाने को देश के सभी समाचार पत्रों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है.
दैनिक जागरण ने ‘भाजपा में आया मोदी युग’ शीर्षक के साथ लिखा है “काफी जद्दोजहद और कश्मकश के बाद भाजपा में पीढ़ी का बदलाव हो गया. अटल बिहारी वाजपेयी स्वास्थ्य कारणों से राजनीतिक परिदृश्य से बाहर हो गए जबकि आडवाणी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की अति का शिकार हो गए. नई पीढ़ी के नेता नरेन्द्र मोदी के हाथ में मिशन 2014 की कमान सौंप दी गई.”
जनसत्ता की सुर्खी है ‘भाजपा ने मोदी को सौंपी कमान’. अखबार के मुताबिक मोदी को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया जाना उनके प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनने की दिशा में एक कदम है.
अखबार ने साथ ही इस घटनाक्रम पर अपने विश्लेषण में लिखा है कि इससे बिहार में राजग के भविष्य पर सवालिया निशान लग गया है.
हिन्दुस्तान का शीर्षक है ‘मोदीमय हुई भाजपा’. अखबार का कहना है कि भाजपा की रणनीति आडवाणी की मौजूदगी में और उनके द्बारा ही मोदी के नाम की घोषणा कराने की थी लेकिन आडवाणी कुछ नाराजगी और कुछ अस्वस्थता के चलते आखिर तक नहीं आए.
उम्मीदों का पहाड़
अखबार का कहना है कि मोदी के सामने उम्मीदों का पहाड़ है लेकिन आशंकाएं भी कम नहीं हैं. राजनाथ सिंह की घोषणा ने उन्हें वाजपेयी और आडवाणी की बराबरी में खड़ा जरूर कर दिया है लेकिन न तो वह वाजपेयी जैसे लोकप्रिय हैं और न ही संगठन में आडवाणी की तरह स्वीकार्य.

दैनिक भास्कर की सुर्खी है, ‘अंततः मोदी को मिली आम चुनाव की कमान’. अखबार कहता है कि नरेन्द्र मोदी भाजपा के स्थायी और अटल चेहरे हो गए हैं. कार्यकर्ता जिस शिद्दत से अटल के नारे लगाते थे उसी शिद्दत से मोदी के नारे लगा रहे हैं.
नवभारत टाइम्स का शीर्षक है ‘आखिरी बाजी मोदी के नाम’. अखबार का कहना है कि मोदी के सामने सबसे पहली चुनौती यही है कि उन्हें आडवाणी खेमे को अपने साथ लाना होगा.
अख़बार ने साथ ही कहा कि मोदी को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाए जाने के साथ ही भाजपा में अटल-आडवाणी युग खत्म हो गया है. पहली बार पार्टी अटल या आडवाणी के बजाए किसी तीसरे नेता की अगुवाई में मिशन 2014 की लड़ाई लड़ेगी.
युग की समाप्ति
<bold>इंडियन एक्सप्रेस</bold> ने लिखा है, “गोवा के मेरियट होटल के इसी हॉल में तब भाजपा के दिग्गज नेता <link type="page"><caption> अटल बिहारी वाजपेयी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/11/111108_advani_vajpayee_skj.shtml" platform="highweb"/></link> ने अपने साथी लाल कृष्ण आडवाणी की सलाह मानते हुए मोदी की कुर्सी बचाई थी. ग्यारह साल बाद भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने पार्टी के कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझते हुए मोदी को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बना दिया. इसके साथ ही पार्टी में आडवाणी का युग समाप्त हो गया.”
अख़बार के मुताबिक मोदी को नई जिम्मेदारी मिलने साथ ही पार्टी में आडवाणी के समर्थक हवा का रुख भांपते हुए एक के बाद एक लाइन पर आ गए.
टाइम्स ऑफ इंडिया की सुर्ख़ी है ‘मॉडिफाइड बीजेपी लांचेज वर्जन 2.014’. अख़बार का कहना है कि पार्टी ने आडवाणी और दूसरे नेताओं के प्रतिरोध को दरकिनार करते हुए मोदी को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया है.
अख़बार ने अपने संपादकीय में लिखा है कि भाजपा वाजपेयी-आडवाणी के दौर से बाहर निकल रही है और अब इसकी अगुआई मोदी करेंगे.
मोदी पर दाँव

द हिन्दू का कहना है कि भाजपा ने 2014 के चुनाव में मोदी पर दाँव खेला है. अख़बार का दावा है कि मोदी को ये भूमिका दिए जाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की अहम भूमिका है.
कई अख़बारों ने इस घटनाक्रम के बारे में संपादकीय लिखा है और साथ ही आडवाणी तथा कांग्रेस की टिप्पणी को भी पहले पृष्ठ पर स्थान दिया है. आडवाणी ने अपने ब्लॉग में घायल भीष्म पितामह के बाणों की शैया पर पड़े होने संबंधी महाभारत के एक दृश्य का जिक्र किया है.
कांग्रेस ने प्रवक्ता शकील अहमद ने कहा "मोदी की अपील गुजरात तक सीमित है. हमने कर्नाटक के चुनावों में उनके प्रचार के खोखलेपन को देखा है. वे उन लोगों में लोकप्रिय हैं जो साम्प्रदायिक राजनीति और साम्प्रदायिक व्यक्तित्व को पसंद करते हैं. लेकिन इस तरह की राजनीति भारत के लोकाचार के खिलाफ है."
भारतीय ही नहीं कई विदेशी अख़बारों ने भी इस ख़बर को हाथोंहाथ लिया है. वाशिंगटन पोस्ट का कहना है कि विवादित नेता को 2014 चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया जाना इस बात का संकेत है कि अगर पार्टी सत्ता में आती है तो व्यापारी समुदाय के चहेते मोदी प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार हो सकते हैं.
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