नरेंद्र मोदी: दंगों से दबंगई तक

हाल के वर्षों में भारत की राजनीति में नरेंद्र मोदी जैसे चंद राजनेता ही नजर आते हैं जिन्होंने जनमत को इतना प्रभावित और धुव्रीकृत किया है.
ये जुमला नरेंद्र मोदी पर बिल्कुल सही बैठता है कि आप उनके पक्ष में हैं या धुर विरोधी हो सकते हैं, लेकिन उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते.
भले ही मोदी पर 2002 के दंगों के संबंध में आरोप लगे हों, लेकिन दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी में उन्हें प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार भी माना जा रहा है. अब तो वे भाजपा की चुनाव प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष भी बना दिये गए हैं.
इसे नरेंद्र मोदी का करिश्मा ही कहा जाएगा कि चाहे गुजरात विधानसभा चुनाव पर हो या फिर कोई और चुनाव सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी से कहीं ज्यादा मोदी का व्यक्तित्व हावी हो जाता है.
दंगों के दाग
मोदी ने 2001 में तब मुख्यमंत्री पद संभाला था जब उसी साल जनवरी में गुजरात में आए विनाशाकारी भूकंप के बाद केशुभाई पटेल को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी. इस भूकंप में 20 हजार से ज्यादा लोग मार गए थे.
मोदी के सत्ता संभालने के लगभग पांच महीने बाद ही गोधरा रेल हादसे के बाद गुजरात में दंगे भड़क उठे, जिनमें एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए. इनमें ज्यादातर मुसलमान थे.
आज तक मोदी पर दंगों को रोकने के लिए उचित कदम न उठाने के आरोप लगते हैं. इसीलिए उन्हें अमरीका का वीजा नहीं मिला था और ब्रिटेन ने दस साल तक उनसे अपने रिश्ते तोड़े रखे.
मोदी एक अच्छे वक्ता माने जाते हैं और उन्हें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भी समर्थन है. बहुत से लोग उन्हें एक कुशल प्रशासक मानते हैं जो भ्रष्टाचार से मुक्त है.
उन्हें गुजरात में समृद्धि और विकास का श्रेय भी दिया जाता है. भारत के कुछ बड़े उद्योगपति भी उनकी नीतियों की खुल कर तारीफ करते हैं. लगातार तीन बार विधानसभा के चुनावों में जीत उनकी लोकप्रियता पर मुहर लगाती है.
इसलिए भारतीय जनता पार्टी के कई रणनीतिकार अब उन पर बड़ा दांव लगाने की योजनाएं बना रहे हैं. हालांकि बहुत से लोग अब भी दंगों के कारण मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं.
महत्वकांक्षी मोदी
मोदी पर दंगों को न रोक पाने के आरोप लगे हैं जबकि उनकी सरकार में मंत्री रहीं माया कोडनानी इन्हीं कारणों से 28 साल की सजा भुगत रही हैं.
आलोचक कहते हैं कि दंगों में भूमिका के कारण ही मोदी ने कोडनानी को मंत्री पद से नवाजा था. लेकिन खुद मोदी ने कभी दंगों को लेकर न तो कोई अफसोस जताया है और न ही किसी तरह की माफी मांगी है.
उस वक्त दंगों के कारण भारतीय जनता पार्टी पर मोदी को हटाने का दबाव था लेकिन इसके चंद महीनों के बाद जब दिसंबर 2002 के विधानसभा चुनावों में मोदी ने जीत दर्ज की तो उन्हें सबसे ज्यादा फायदा उन इलाकों में हुआ जो दंगों से सबसे ज्यादा प्रभावित थे.
लेकिन 2007 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने गुजरात के विकास को मुद्दा बनाया था.
राजनीति में आने से पहले मोदी कई वर्षों तक संघ प्रचारक रहे. बचपन से उनका संघ की तरफ झुकाव रहा है. गुजरात में आरएसएस का मजबूत आधार रहा है और 1980 के दशक में जब मोदी गुजरात की भाजपा ईकाई में शामिल हुए तो माना गया कि पार्टी को संघ के प्रभाव का सीधा फायदा होगा.
नरेंद्र मोदी ने लाल कृष्ण आडवाणी की सोमनाथ और अयोध्या रथ यात्रा के आयोजन में अहम भूमिका अदा की थी.
बढ़ते क़दम
मोदी को 1995 में भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय सचिव और पांच राज्यों का पार्टी प्रभारी बनाया गया. इसके बाद 1998 में उन्हें महासचिव (संगठन) बनाया गया.

इस पद पर वो अक्टूबर 2001 तक रहे. लेकिन 2001 में केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद मोदी को राज्य की कमान सौंपी गई.
इसके बाद राज्य की राजनीति पर उनकी पकड़ लगातार मजबूत होती गई. गुजरात भाजपा में अब कोई ऐसा नेता नहीं दिखता जो उन्हें चुनौती देने के बारे में सोच भी सके. अब तो भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के नेता भी खुले आम मोदी की आलोचना का जोखिम नहीं उठाते हैं.
मोदी उन चंद राजनेताओं में शामिल हैं जो तकनीक को लेकर बहुत सहज हैं. सोशल मीडिया पर वो सीधे लोगों से संपर्क करते हैं. इसलिए युवाओं में उन्हें बहुत लोकप्रिय समझा जाता है.
शायद इसी लोकप्रियता के सहारे अब मोदी अपने राजनीति जीवन के अगले पड़ाव की तरफ बढ़ना चाहते हैं.












