सीबीआई में 'राजनीतिक हस्तक्षेप' का सच

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कोयला आबंटन में कथित घोटाले की जांच में सरकारी दखल के मामले पर सीबीआई को आड़े हाथों लिया है.
न्यायालय ने स्पष्ट करने को कहा है कि क्या जांच एजें <link type="page"><caption> सी सीबीआई</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/04/130430_sc_on_cbi_rd.shtml" platform="highweb"/></link> का मैनुअल इसकी इजाज़त देता है कि इस तरह के मसौदे कानून मंत्री, जो किसी पार्टी के नेता भी होते हैं, के साथ साझा किए जाएं?
साथ ही न्यायालय ने टिपण्णी की है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो को 'राजनीतिक आकाओं' से आदेश लेने की ज़रूरत नहीं है.
बहस फिर तेज़ हो गई है कि सीबीआई कितनी स्वायत्त संस्था है और उसमे राजनीतिक हस्तक्षेप की आवश्यकता क्यों हो? बीबीसी ने बात की सीबीआई के दो पूर्व संयुक्त निदेशकों से और ली उनकी बेबाक राय.
एनके सिंह , आपातकाल के बाद इंदिरा गाँधी को गिरफ्तार किया और सेंट किट्स मामले की जांच की
अगर सच कहूँ तो सीबीआई का राजनीतिकरण इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री काल में शुरू हुआ था.
मेरी नज़र में उनसे पहले के प्रधानमंत्री और सरकारें आम तौर से <link type="page"><caption> जांच एजेंसी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/04/130426_cbi_director_in_court_rd.shtml" platform="highweb"/></link> के काम-काज में दखल नहीं देती थीं.

इंदिरा गाँधी के सत्ता में रहते ही डी सेन नामक व्यक्ति पूरे छह साल तक इस एजेंसी के निदेशक पद पर आसीन रहे.
मेरा अपना अनुभव रहा सेंट किट्स मामले की जांच के दौरान.
जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कॉंग्रेस और राजीव गांधी का साथ छोड़ा तो उसके तुरंत बाद कैरेबियाई देश सेंट किट्स में एक फर्जी बैंक खाता खोला गया और बेशुमार पैसे जमा कर दिए गए.
उसके बाद कहा गया कि वो रक़म वीपी सिंह की है और उनके पुत्र के नाम पर जमा की गई है. उस मामले की जांच मेरे नेतृत्व में हुई और उसमे कई बार राजनीतिक दखल की कोशिश हुई.
जांच में हस्तक्षेप का प्रयास किया गया जिसमे आरके धवन, चंद्रास्वामी और सतीश शर्मा इत्यादि लोग शामिल थे. जब मैं नहीं माना तब आनन-फ़ानन में मेरा तबादला कर दिया गया और मुझे सीबीआई से ही बाहर कर दिया गया.
मैं इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गया और मैंने कहा कि ये राजनीति से प्रेरित तबादला है. नतीजा ये हुआ कि सेंट किट्स मामला 6 महीने में ही ख़त्म कर दिया गया और अगर ऐसा नहीं होता तो जो लोग इसमें शामिल थे वे आगे चल के पकड़ लिए जाते.
ऐसा ही कुछ बोफोर्स मामले में हुए जब ओतावियो क्वात्रोची को न सिर्फ देश से बाहर जाने दिया गया बल्कि लंदन में सील किया गया उनका बैंक खाता भी खोल दिया गया.
केएस ढिल्लन, जिन्होंने बिहार का चर्चित बॉबी मर्डर केस सुलझाया
मेरे हिसाब से भारत में पुलिस और उसकी जवाबदेही अभी भी उसी राह पर चल रही है जैसी ब्रिटिश राज के दौरान थी.

भारत में ही नहीं बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में आलम यही है कि जांच एजेंसियां सरकारों को रिपोर्ट करती हैं.
भारत जैसे देश में जांच <link type="page"><caption> एजेंसियां </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/02/130211_cbi_prosecutor_final_sm.shtml" platform="highweb"/></link>आखिरकार सरकारों के बहाने राजनीतिक दलों को रिपोर्ट करने लगीं, जिनमें निजी हितों का मामला प्राथमिकता लेने लगा.
मिसाल के तौर जब मैं सीबीआई में संयुक्त निदेशक था तब बिहार में बॉबी नाम की एक नर्स का क़त्ल हो गया था. जगन्नाथ मिश्र उन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री थे और विधान सभा के स्पीकर भी उन्ही की कॉंग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता थे.
दोनों में क़त्ल को लेकर एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश जारी थी और एक दूसरे को फंसाने के प्रयास तेज़ थे. ख़ास बात ये भी थी कि राज्य की पुलिस मुख्यमंत्री का पक्ष ले रही थी और स्पीकर महोदय अकेले पड़ रहे थे.
जब जांच में बात हद से आगे निकल गई तो ये केस मेरे सुपुर्द किया गया. तमाम राजनीतिक हस्तक्षेप को किनारे करते हुए बड़ी मुश्किल से किसी तरह हमारी टीम ने इस केस को सुलझाया.
ये उदाहरण ज़रूरी इसलिए है क्योंकि सीबीआई या जांच एजेंसियों के कामकाज में न सिर्फ़ बड़े मामलों में बल्कि छोटे मामलों में भी काफी राजनीतिक हस्तक्षेप के मामले सामने आए हैं.












