अफज़ल को फांसी: क्या खून के प्यासे हैं लोग?

अफज़ल गुरु को फांसी दिए जाने पर कम ही लोगों की आंखें नम हुई होंगी.
सोशल मीडिया देखें या फिर टीवी और अखबार, अधिकतर लोगों के लिए उन्होंने भारतीय संसद पर हमला कर अक्षम्य अपराध किया था जिसका यही अंजाम होना था.
पिछले साल दिसंबर में दिल्ली में हुए गैंगरेप मामले के बाद भी अभियुक्तों के लिए फांसी की मांग ज़ोरों से उठी.
लेकिन कुछ ऐसे लोग भी हैं जो यह सवाल उठा रहे हैं कि किसी की जान लेना क्या किसी भी कारणों से तर्कसंगत हो सकता हैं. क्या खून के बदले खून सभ्य समाज की पहचान हो सकता है?
दिल्ली के समाजशास्त्री दिपांकर गुप्ता कहते हैं, "मृत्युदंड एक 'स्वाभाविक प्रतिक्रिया है. जैसे बाईबल में कहा गया है कि आँख के लिए आँख या दांत के लिए दांत. जैसे को तैसा एक पुरानी धारणा रही है लेकिन लोकतंत्र वो होता है जिसमें हम नई सोच अपनाते हैं.''
वे कहते हैं, ''धर्म में विश्वास रखने वाले लोग कहते हैं कि किसी की जान लेना भगवान के हाथ में है हमारे हाथ में नहीं. लेकिन हमारे यहां अंदर की भावना जो उभर के सामने आ रही है वो यह है कि जो किसी ने किया उसे उसी तरीके का सलूक करना चाहिए. लेकिन ऐसी सोच से आप आगे नहीं बढ़ सकते न ही लोकतंत्र की बात कर सकते हैं.''
नकारात्मक सोच?
एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार साल 2007 और 2011 के बीच दुनिया भर में लगभग 18,000 लोगों की फांसी की सज़ा सुनाई गई है जबकि इस दौरान 5,541 लोगों को फांसी दी गई.
इस दौरान भारत में 435 लोगों को सज़ा सुनाई गई हालांकि किसी को फांसी दी नहीं गई.
ऐसे समय में जब भारत को उन देशों में शामिल होने की बात की जा रही थी जहां फांसी की सज़ा नहीं दी जाती, अचानक पिछले दिनों एक सुबह यहां के लोग मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब की फांसी की खबर के साथ उठे.
और फिर पिछले शनिवार जब अफज़ल को भी सूली पर लटकाया गया तो ये साफ हो गया कि भारत का ऐसे देशों की सूची में शुमार होने का कोई इरादा नहीं है.
दिपांकर गुप्ता कहते हैं, ''जिन देशों में यह फांसी की सज़ा को खत्म किया गया है वहां इसकी मांग साधारण लोग ने नहीं की बल्कि सोचने वाले लोगों से, नेतृत्व करने वाले लोगों ने इसकी मांग की है.''
''ब्रिटेन में एक समय चार्लस डिकंस अकेले ही इसके खिलाफ अखबार में लिख कर अभियान चलाते रहे. तो यह कहना गलत है कि हम इसलिए फांसी देते हैं क्योंकि जनता कहती है. कहीं नेताओं ने इस के बारे में कहा तो कहीं लेखकों ने.''
वे आगे कहते हैं, ''इसका कारण पता नहीं क्या है लेकिन हमारे यहां इस तरह की सोच नहीं बनी है. कभी कभी कुछ लोग इसके खिलाफ लिखते हैं लेकिन वो काफी नहीं है. जिन लोगों को इसके खिलाफ उठना चाहिए जिन लोगों का प्रभाव है वो कुछ नहीं कर रहे. शायद यह लोग सोचते हैं कि वो आम जनता से अलग हैं.''












