ट्विटर-फेसबुक पर छाए अफज़ल गुरु

अफजल गुरु के मामले में लगातार ट्विट और फेसबुक पोस्ट होरहे है.
इमेज कैप्शन, अफजल गुरु के मामले में लगातार ट्विट और फेसबुक पोस्ट होरहे है.

संसद पर हमले के अभियुक्त अफ़ज़ल गुरु की फांसी का मुद्दा सोशल मीडिया पर भी छाया हुआ है और इस पर लगातार ट्विट और फेसबुक पर पोस्ट लिखे जा रहे हैं.

#Afzalguru #kasab, #parliament और #kashmir के ज़रिए लोग इस मुद्दे पर अपनी बात रख रहे हैं.

सोशल मीडिया पर जहां इस फांसी का कई लोगों ने स्वागत किया है वहीं कई लोगों ने कहा है कि अफज़ल गुरु को खुद को निर्दोष साबित करने का एक मौका और मिलना चाहिए था.

कई लोग इसे चुनाव से जोड़कर भी देख रहे हैं.

जाने माने पत्रकार राजदीप सरदेसाई का ट्विट है- कसाब को शीतकालीन सत्र से पहले फांसी दी गई और अफज़ल गुरु को बजट सत्र से पहले. कोई संयोग तो नहीं.

समर हलरंकर लिखते हैं- अफज़ल गुरु को गुप्त रुप से क्यों फांसी दी गई. क्या सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के अनुसार हमारे सामूहिक विवेक को संतुष्ट करने के लिए. क्या ये हमारे विवेक के बारे में कुछ नहीं कहता.

मीना कंडासामी ने अरुंधति राय का लिखा लेख ट्विट किया है और कहा है कि अफज़ल के मामले में कई गड़बड़ियां हैं और उन्हें खुद को निर्दोष साबित करने का एक मौका मिलना चाहिए.

किरन बेदी ने लिखा है कि कानून ने अपना चक्र पूरा किया है. फांसी हुई.

मधु किश्वर ट्विट करती हैं- अफज़ल गुरु का आतंकी हमले से सीधा संबंध नहीं था इसलिए उनकी मौत की सज़ा को आजीवन कारावास में बदला जाना चाहिए था. परिवार के प्रति संवेदना.

सुहेल सेठ का ट्विट है- अफज़ल गुरु को फांसी. सरकार ने हिम्मत दिखाई जितना क्रेडिट मिलता है उसे...उससे अधिक. और भगवान का शुक्र है कि प्रणब मुखर्जी ने कड़ा फैसला लिया.

फंडुलकर नाम से ट्विट करने वाले कहते हैं कि अफसोस अफज़ल गुरु वेलेंटाइन डे नहीं मना पाएंगे.

सूर्यनारायण गणेश का ट्विट है कि सरकार ने जिहादी आतंक के खिलाफ कड़ा फैसला किया अब हिंदू आतंकवाद की बारी है.

<bold>फेसबुक पर टिप्पणियां</bold>

फेसबुक पर भी सुबह से ही अफज़ल गुरु के मामले में पोस्टों की बाढ़ है.

एके पंकज लिखते है कि कोर्ट ने भी नोट किया था कि अफज़ल के ख़िलाफ सबूत तोड़ मरोड़ के पेश किए गए थे. महत्वपूर्ण ये है कि उन्हें अपने बचाव के लिए कानूनी सहायता भी नहीं मिली. सबका स्वागत है फांसी के लोकतंत्र में.

कमर वहीद नकवी लिखते हैं- अफज़ल को फांसी, क्या टाइमिंग है. चुनावी तरकश से तीर निकलने शुरु हो गए. बहुत देर से ही सही. लेकिन आखिरकार सही कदम तो उठा.

रणंजय आनंद की पोस्ट है- अफज़ल को फांसी बहुत पहले ही हो जानी चाहिए थी

आनंद प्रधान लिखते हैं कि राष्ट्रवाद का नया सूचकांक है फांसी की दर.