भूमि समझौते असम में विरोध के स्वर

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भारत और बांग्लादेश के बीच हुए भूमि समझौतों पर असम के विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के ऊपर भारतीय हितों को आहत करने का आरोप लगाया है.
इस समझौते के विरोध करते हुए कई जगह बुधवार को ऑल असम स्टूडेंटस यूनियन ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पुतले जलाये.
असम गण परिषद और भारतीय जनता पार्टी की असम शाखा ने भी इस समझौते की आलोचना की है.
भारत ने असम के सीमावर्ती इलाकों की क़रीब 340 एकड़ ज़मीन बांग्लादेश को हस्तांतरित करने का फ़ैसला किया है वहीं बदले में बांग्लादेश 435 एकड़ ज़मीन पर से अपना दावा छोड़ने पर समझौता किया है.
विवाद
औपचारिकताएं पूरी हो जाने के बाद भारत इस इलाके की सीमा पर तारबंदी कर सकेगा. भारत अरसे से यही चाह रहा था. भारत और बांग्लादेश की सीमा से सटे दोनों देशों के भीतर कई इलाकों में ऐसे ज़मीन के बड़े बड़े टुकड़े हैं जो एक दूसरे के कब्ज़े में हैं.
भारत को लंबे समय से शिकायत रही है कि सीमा पर तारबंदी ना कर सकने के कारण भारत में ना केवल बांग्लादेशी नागरिक अवैध रूप से घुस आते हैं बल्कि कई अपराधी और चरमपंथी गुट भी इस लगभग खुली सीमा का लाभ उठाते हैं.
अप्रैल 2001 में सीमा विवाद के कारण भारत और बांग्लादेश के अर्धसैनिक बालों के बीच हुई एक हिंसक झड़प में 16 भारतीय सैनिक मारे गए थे.
राजनितिक विरोध
भारत- बांग्लादेश के बीच हुए इस समझौते पर असम में विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रया दी है.
जिस इलाके की ज़मीन बांग्लादेश को सौंपी जानी है वहां के विधायक जावेद इस्लाम का कहना है कि वो इस समझौते से हतप्रभ हैं और इसे गलत मानते हैं.
बुधवार को असम की राजधानी गुवाहाटी में असम गण परिषद् के अध्यक्ष चन्द्र मोहन पाटोवारी और भाजपा के प्रद्युत बोरा ने कहा कि असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से कुछ सीखना चाहिए.
ममता बनर्जी ने तीस्ता नदी के जल के बांग्लादेश के साथ बंटवारे पर विरोध के चलते प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ बांग्लादेश जाने से इंकार कर दिया था. उनके विरोध के चलते ही भरात बांग्लादेश के बीच इस मामले पर कोई समझौता नहीं हो पाया.












