सुप्रीम कोर्ट के 'रखैल' कहने पर आपत्ति

इंदिरा जयसिंह के अनुसार सुप्रीम कोर्ट को अपने फ़ैसले पर दोबारा विचार करना चाहिए.
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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

जानीं-मानीं वकील और सामाजिक कार्यकर्त्ता इंदिरा जयसिंह ने किसी भी संबंध में महिलाओं के लिए रखैल शब्द के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई है.

सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही महिलाओं के संबंध टूट जाने के बाद गुज़ारे भत्ते की मांग के मामले में गुरुवार को दिए गए एक फ़ैसले में रखैल शब्द का इस्तेमाल किया था.

‘लिव-इन रिलेशनशिप’ उस रिश्ते को कहते हैं जिसमें मर्द-औरत विधिवत तौर पर शादी किए बिना ही साथ-साथ रहते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को पारिभाषित करने की कोशिश की है. इसी संदर्भ में अदालत ने रखैल शब्द का इस्तेमाल किया था.

अदालत के अनुसार, “अगर कोई मर्द 'रखैल' रखता है और किसी औरत को महज़ शारीरिक संबधों की पूर्ति के लिए या एक नौकरानी के तौर पर

इस्तेमाल करता है तो हमारे ख़्याल से इस रिश्ते को शादी के तौर पर नहीं देखा जा सकता है.”

'अनादरपूर्ण'

इंदिरा जयसिंह ने इसी पर अपना ऐतराज़ जताते हुए कहा कि जब दो वयस्क अपनी मर्ज़ी से एक साथ रह रहे हैं तो महिला को रखैल कहने की कोई ज़रुरत नहीं हैं. इंदिरा जयसिंह का कहना है कि महिलाओं के लिए इस शब्द का इस्तेमाल अनादरपूर्ण हैं.

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और जस्टिस टी एस ठाकुर की सदस्यता वाली पीठ के फ़ैसले पर जयसिंह का कहना था कि फ़ैसले में इस्तेमाल किया गया किया गया शब्द बेहद आपत्तिजनक है और इसे हटाए जाने की ज़रूरत है.

इंदिरा जयसिंह का कहना था कि जब अदालत फ़ैसला देती है तो उसे इतना संवेदनशील होना चाहिए कि वो किस भाषा का इस्तेमाल कर रही हैं. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को इस फ़ैसले पर दोबारा विचार करने की ज़रुरत बताई और ऐसे संबधों को मान्यता देने पर जो़र दिया.

इंदिरा जयसिंह सवाल उठाती है कि चूंकि भारत में हर शादी का रजिस्ट्रेशन नहीं होता तो ऐसे में कई महिलाओं का विवाह शादी-शुदा पुरुषों के साथ हो जाता है जो अपनी इस पहचान को छुपाते है तो ऐसी स्थिति में महिलाओं को अगर रखैल कहा जाता है तो उनका क्या होगा.

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और जस्टिस टी एस ठाकुर की सदस्यता वाली पीठ का मानना था कि हर लिव-इन-रिलेशनशीप विवाह के दायरे में नहीं आ सकता है और इस कारण किसी भी महिला को घरेलू हिंसा क़ानून का लाभ नहीं मिल सकता है.