किराए की कोख - नए नियम

- Author, प्रतीक्षा घिल्डियाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
आणंद के एक हस्पताल में साथ बैठीं क्रिस्टल और नैना एक दूसरे को ठीक से नहीं जानतीं. दोनों के देश और पृष्ठभूमि बिलकुल अलग हैं. यहां तक की दोनों एक दूसरे की भाषा तक नहीं बोलतीं. लेकिन फिर भी क्रिस्टल सात समुंदर पार से नैना से मिलने आई हैं.
दरअसल नैना क्रिस्टल के जुड़वां बच्चों की मां बनने वाली हैं. यानी नैना क्रिस्टल के बच्चों की सरोगेट मां हैं. इसके लिए अंडों और शुक्राणुओं को एक प्रयोगशाला में फ़र्टीलाइज़ करके नैना की कोख में डाल दिया गया.
क्रिस्टल का कहना है, "मेरे लिए ये बहुत ही सकारात्मक अनुभव रहा है. इसीलिए मैंने नैना का दोबारा इस्तेमाल किया. मैं इस पूरे अनुभव से इतनी प्रभावित हुई कि मैंने दुनिया भर के लोगों को सरोगेसी के बारे में सलाह देने का एक बिज़नेस खोल लिया है."
सरोगेट मां बनने के लिए नैना को क़रीब ढाई लाख रुपए मिले.
नैना कहती हैं, "मैंने सरोगेट मां बनने की इसलिए सोची क्योंकि इससे मिलने वाले पैसे से मैं अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का ख़याल रख सकती हूं. बच्चे को पैदा करके उसे किसी और को दे देना आसान नहीं होता लेकिन मैंने वचन दिया था. साथ ही मुझे इसके लिए पैसे भी तो मिल रहे हैं."
नैना ने दो साल पहले भी क्रिस्टल के एक बच्चे को जन्म दिया था. नैना कहती हैं कि उन्होंने अपने आप को ये समझा लिया था कि जो बच्चा वो पैदा करेंगी वो उनकी नहीं है. उन्होंने बस उसे पैदा किया है.
सरोगेसी से ज़रिए बच्चों का जन्म कोई नई बात नहीं है लेकिन पिछले कुछ सालों में भारत में इसने काफ़ी रफ़्तार पकड़ी है. सैकड़ों विदेशी दंपत्ति सरोगेट मां की खोज में भारत आते हैं. ये लोग अपने-आप गर्भ धारण करने में सक्षम नहीं और इनके देशों में सरोगेसी की क़ीमत भारत से कहीं ज़्यादा है.
वैसे तो पूरे भारत में सरोगेसी रफ़्तार पकड़ रही है लेकिन गुजरात का आणंद ख़ासतौर से इसके लिए जाना जाता है.
कारण हैं यहां रहने वाली डॉक्टर नैना पटेल. इन्होंने 2003 में एक महिला की सरोगेसी में भूमिका निभाई थी. दरअसल आणंद में रहने वाली एक महिला की बेटी को एक सरोगेट मां की तलाश थी लेकिन बहुत ढ़ूंढने के बाद भी उन्हें नहीं मिल पाई. अमरीका में रहने वाली इस महिला के लिए फिर उसकी मां ही सरोगेट बनीं. डॉक्टर नैना पटेल ने ही इस पूरी प्रक्रिया को अंजाम दिया. उसके बाद उनके पास देश-विदेश से लोग सरोगेसी की गुज़ारिश लेकर आने लगे.
डॉक्टर पटेल कहती हैं, "गर्भ न धारण कर पाना किसी भी दंपत्ति के लिए बहुत दुखद होता है. इसके लिए सरोगेसी एक अच्छा ज़रिया है."

डॉक्टर पटेल सरोगेट मांओं के लिए एक होस्टल भी चलाती हैं. फ़िलहाल वहां क़रीब 20 महिलाएं गर्भवती हैं.
डाक्टर पटेल के अनुसार, सरोगेसी और सरोगेट मांएं उनके दिल के बहुत क़रीब हैं.
लेकिन अब भारत सरकार सरोगेसी के इर्द-गिर्द कुछ नियम बनाने वाली है. क्योंकि अटकलें लग रही हैं कि इसके बढ़ने के साथ-साथ इसमें होने वाली कुछ गड़बड़ियों को भी बढ़ावा मिल सकता है. फ़िलहाल सरोगेसी के इर्द-गिर्द कोई क़ानून नहीं है - बस कुछ निर्देश हैं.
इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च के डॉक्टर आर एस शर्मा कहते हैं, "हमारे पास ऐसी जानकारी थी कि सरोसेसी के नियमों को कुछ जगहों पर ठीक ढंग से लागू नहीं किया जा रहा है. सरोगेट मांओं का स्वास्थ भी चिंता का विषय है. कुछ ग़ैर सरकारी संगठनों मे इनको मिलने वाली राशि का मुद्दा भी उठाया था. हम चाहते हैं कि सरोगेट मांओं को पर्याप्त राशि मिले."
नए क़ानून के अनुसार डॉक्टर सरोगेट महिलाओं की देख-रेख नहीं कर सकते और सरोगेट माएं सिर्फ़ पाँच बार गर्भ धारण कर सकती हैं. इनमें उनके ख़ुद के बच्चे शामिल हैं. इसके अलावा जो दंपत्ति विदेश से भारत आते हैं उन्हें ये साबित करना होगा कि उनके देश में सरोगेसी के ज़रिए जन्मे बच्चे को प्रवेश मिलने की अनुमति है.
नया क़ानून लागू होने में कम से कम छह महीने लगने की संभावना है.












