जसवंत ने 'नोट कांड' पर आडवाणी को घेरा

पाकिस्तान के राष्ट्रपिता मोहम्मद अली जिन्ना पर किताब लिखकर चर्चा में आए और इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी से बर्ख़ास्त हो चुके जसवंत सिंह ने एक बार फिर पार्टी नेता लाल कृष्ण आडवाणी पर निशाना साधा है.
पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह ने अब कहा है कि भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी 2008 में संसद में हुए कैश फ़ॉर वोट घटनाक्रम के केंद्र में थे.
ग़ौरतलब है कि जुलाई 2008 में भारतीय जनता पार्टी के तीन सांसद लोकसभा में क़रीब एक करोड़ रुपए की नक़दी ले गए थे और कहा था कि उन्हें सरकार के समर्थन में मतदान के लिए पैसे दिए गए है.
भारतीय जनता पार्टी ने जसवंत सिंह के इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि यह सरकार बचाने के लिए सारा खेल यूपीए सरकार ने रचा था.
स्टिंग ऑपरेशन के बारे में भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने कहा, "स्टिंग ऑपरेशन एक समाचार चैनल ने किया था उसमें भाजपा का कोई हाथ नहीं था."
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार जसवंत सिंह ने कहा है, "यह बहुत ही दयनीय बात है. इस नाटक के केंद्र में एक ऐसा क़द्दावर नेता था जो प्रधानमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षा का शिकार हो गया और इसी इच्छा ने इस नेता को इतनी सारी ग़लतियाँ करने पर मजबूर किया."
जसवंत सिंह का कहना था, “क्या आप जानते हैं कि वोट के लिए नक़दी का यह सारा खेल ग़लत फ़ैसले लेने के नतीजों का एक बेहतरीन नमूना है और यह बहुत ही व्यथित करने वाली बात है कि आडवाणी जी इस पूरे खेल में खड़े होकर ना नहीं कह सके.”
आउटलुक पत्रिका से बातचीत में जसवंत सिंह ने कहा, “आडवाणी जी इस पूरे खेल के केंद्र में थे.”
'नेता के गुण'

उन्होंने कहा कि इस पूरे प्रकरण में बहुत सारी चीज़ें स्पष्ट थीं लेकिन आडवाणी जी उस समय डगमगा गए जब सुधींद्र कुलकर्णी उनके घर पर एक अजनबी व्यक्ति को लाए.
जसवंत सिंह ने कहा, “मुझसे इस मामले पर कोई राय-मशविरा नहीं किया गया लेकिन मैं ये देखकर बहुत चकित हुआ कि आडवाणी जी ने भाजपा सांसदों को लोकसभा में नोटों की गड्डियाँ ले जाने की इजाज़त दे दी थी.”
जसवंत सिंह ने कहा कि लाल कृष्ण आडवाणी जी के पास दो विकल्प हो सकते थे – एक ये कि वे नक़दी को लोक सभा अध्यक्ष के पास ले जाते या फिर सदन में ले जाते. लेकिन उन्होंने ख़ुद ऐसा नहीं करके सांसदों को ही वो धन संसद में ले जाने की इजाज़त दी.
जसवंत सिंह ने कहा कि यह बहुत ही दुखदायी बात है कि लाल कृष्ण आडवाणी एक नेता के रूप में नेतृत्व देने में नाकाम रहे, एक नेता को मिसाल क़ायम करके नेतृत्व करना होता है, ना कि आदेशों, अस्पष्ट और अनिश्चित आरोप-प्रत्यारोप और भय के ज़रिए.
सेना में नेतृत्व परंपरा का उदाहरण देते हुए जसवंत सिंह ने कहा कि ऐसे बहुत से अवसर थे जब आडवाणी जी या तो ख़ामोश रहे या उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी किसी अन्य नेता पर डाल दी, ख़ासतौर से ऐसे मौक़ों पर जब उन्हें ख़ुद के परेशानी में घिरने का डर था.
जसवंत सिंह ने कहा, “ये एक नेता के लक्षण या गुण नहीं हैं.”
भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के बारे में अरुण शौरी के बयान पर जसवंत सिंह ने कहा कि राजनाथ सिंह एक प्रांतीय नेता रहे हैं और उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय पद नहीं संभालना चाहिए था.
भारतीय जनता पार्टी के बारे में जसवंत सिंह ने कहा कि अब यह एक राजनीतिक पार्टी नहीं बची है, अब यह एक गुट या समुदाय रह गई है, यह पार्टी कुछ लोगों की संपत्ति बनकर रह गई है, और यह आडवाणी के नेतृत्व में ही हुआ है.












