मध्य प्रदेश: सामूहिक विवाह कार्यक्रम में दुल्हन की किट में कंडोम, प्रेग्नेंसी टेस्ट का भी आरोप

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की सामूहिक विवाह योजना एक बार फिर विवादों में है.
हाल ही में इस योजना के तहत राज्य के झाबुआ ज़िले में हुए सामूहिक विवाह में लड़कियों के मेकअप बॉक्स में गर्भनिरोधक गोलियां और कंडोम मिलने की ख़बर सुर्खियों में आई.
इससे पहले इसी साल के अप्रैल महीने में डिंडौरी ज़िले में ऐसे ही विवाह समारोह से पहले लड़कियों के प्रेग्नेंसी टेस्ट की ख़बरें भी सामने आई थीं.
बीबीसी ने एक ऐसी महिला से बात की जिसने दावा किया कि उन्हें मेडिकल टेस्ट के बहाने बुलाया और फिर उनका प्रेग्नेंसी टेस्ट कर दिया.
बीबीसी से बातचीत में राज्य के ज़िला अधिकारियों ने इन बातों से इनकार किया है.
दरअसल राज्य की मुख्यमंत्री कन्या विवाह/निकाह योजना के तहत वंचित, ग़रीब परिवार से आने वाली, विधवा महिलाओं के लिए ये कार्यक्रम शुरू किया गया था.
क्या है मामला
मध्य प्रदेश का झाबुआ एक आदिवासी बहुल ज़िला है और यहां 29 मई को हुए सामूहिक विवाह कार्यक्रम में 292 महिलाओं के विवाह कराए गए.
इन्हीं में से एक महिला ने बीबीसी को बताया कि जहां उनकी शादी हुई थी वहां उन्हें एक मेकअप बॉक्स दिया गया था.
अपना नाम ज़ाहिर न किए जाने की शर्त पर महिला ने कहा, "मैंने सोचा इस बॉक्स में मेकअप का सामान होगा लेकिन जब खोलकर देखा तो उसमें केवल बिंदी के दो पत्ते, कंघी, कुछ गोलियां और बाक़ी सामान रखा हुआ था. मैंने इन चीज़ों को जला दिया."
इस महिला ने फ़ोन पर गर्भनिरोधक गोलियों और कंडोम का नाम तक नहीं लिया और 'वो सामान' कहकर अपनी बात कहीं.
उन गर्भनिरोधक गोलियों और कंडोम को जला क्यों दिया इस सवाल पर वे नाराज़गी से जवाब देते हुए कहती हैं, "मुझे पता है उन्होंने दिया था लेकिन हम उसको रखकर क्या करते."
झाबुआ की कलेक्टर तनवी हुड्डा ने बीबीसी से बातचीत में मेकअप बॉक्स में गर्भनिरोधक गोलियां या कंडोम मिलने का मामला सामने आने से इंकार किया है.
लेकिन वो ये ज़रूर कहती हैं, "नवविवाहित जोड़ों को परिवार नियोजन के बारे में बताने के लिए ये दिया गया था और स्वास्थ्य अधिकारियों ने उन्हें ये सामान्य तौर पर दिए थे. इसमें सामान और चेक भी दिया गया था."
इससे पहले भी उठा था विवाद

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वहीं इससे पहले डिंडौरी में हुए ऐसे ही सामूहिक विवाह से पहले लड़कियों के प्रेग्नेंसी टेस्ट की ख़बर ने काफ़ी तूल पकड़ा था.
फ़ोन पर बातचीत में एक युवा महिला ने पहचान न बताने की शर्त पर बीबीसी को बताया, "मैंने शादी के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया और जिस दिन शादी होनी थी उससे एक दिन पहले मेडिकल टेस्ट के लिए बुलाया गया था."
महिला काफ़ी ग़ुस्से में आरोप लगाती हैं, "वहां हमारा यूरिन टेस्ट लिया गया. उसके बाद दूसरे दिन मुझे शादी के लिए मना कर दिया गया. वहीं कुछ लड़कियों को ये कहा गया कि वे प्रेग्नेंट हैं और उनकी शादी नहीं हो सकती. लेकिन मैं तो प्रेग्नेंट ही नहीं थी. आप ये बताइए ऐसे समारोह से पहले ये टेस्ट करने का क्या मतलब है. ये कहां का नियम है.''
लेकिन डिंडौरी के कलेक्टर विकास मिश्रा किसी भी लड़की के यूरिन टेस्ट से इनकार करते हैं.
'लड़कियों की शिकायत पर हुई जांच'

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विकास मिश्रा ने बीबीसी बताया कि डिंडौरी मध्यप्रदेश के उन ज़िलों में से एक है जो सिकल सेल एनीमिया की बीमारी से प्रभावित है. ये शरीर में खू़न की कमी से होने वाली एक बीमारी है.
वे बताते हैं, "स्वास्थ्य अधिकारी इस बीमारी से संबंधित जांच कर रहे थे. उस दौरान पांच लड़कियों ने ये शिकायत की उन्हें एक महीने से पीरियड्स नहीं हुए हैं. ये बातचीत महिला डॉक्टर और इन लड़कियों के बीच हुई थी. जांच के बाद पाया गया कि वे गर्भवती हैं. वहीं दिशानिर्देशों में भी ये कहा गया है कि शादी से पहले सिकल सेल बीमारी की जांच होनी चाहिए."
कलेक्टर विकास मिश्रा कहते हैं, "जब इन लड़कियों को सामूहिक विवाह के अंतर्गत शादी की अनुमति नहीं दी गई उसके बाद ये मामला उछला था."
वे दावा करते हैं कि किसी भी लड़की का कोई प्रेग्नेंसी टेस्ट नहीं किया गया है.
लेकिन कोई लड़की अगर गर्भवती है तो इसका मतलब ये होगा कि उसे सामूहिक विवाह में शादी की इजाज़त ही नहीं दी जाएगी?
इस सवाल के जवाब में वे कहते हैं, "इन महिलाओं की जांच होगी और अगर वे शादीशुदा नहीं निकलेंगी तो दोबारा उनकी शादी करवा दी जाएगी."
डिंडौरी के बछर गांव की सरपंच मेदनी मरावी, कलेक्टर की बात को सिरे से ख़ारिज करते हुए कहती हैं कि शादी से एक दिन पहले लड़कियों को यूरीन टेस्ट के लिए बुलाया गया था और दूसरे दिन शादी के लिए बुलाया गया था.
वे कहती हैं, "कोई ख़ून की जांच नहीं हुई बल्कि पेशाब की जांच हुई जो प्रेग्नेंसी टेस्ट ही था. जिन भी लड़कियों की शादी हुई उन सब का यही टेस्ट हुआ. मैंने इस बारे में अधिकारियों को भी बताया था."
मेदनी मरावी बताती हैं, "जब हम लड़कियों को शादी के लिए लेकर गए तो बताया गया कि उनकी शादी नहीं हो सकती, उन्होंने कहा कि जांच के बाद लड़कियों का नाम हटा दिया गया है."
हालांकि प्रशासनिक अधिकारी ऐसी किसी जांच से इनकार करते हैं और कहते हैं इस मामले में जांच रिपोर्ट महिला और विकास मंत्रालय को सौंप दी गई है.
विपक्ष के आरोप और सत्ता पक्ष के जवाब

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बीबीसी से बातचीत में राज्य के कांग्रेस प्रवक्ता पीयुष बाबेल बताते हैं, "हम गर्भनिरोध के ख़िलाफ़ नहीं हैं लेकिन ये बेटियां ग़रीब और आदिवासी समुदाय से आती हैं. उनको सार्वजनिक तौर ये भेंट क्यों दी जा रही है. और कैसे किसी लड़की का प्रेग्नेंसी टेस्ट कराया जा सकता है. ये निजता के अधिकार का हनन है."
राज्य में बीजेपी की प्रवक्ता नेहा बग्गा इसके जवाब में कहती हैं कि डिंडौरी मामले की जांच चल रही है.
वे झाबुआ वाले मामले पर कहती हैं कि सरकार का राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन कार्यक्रम चल रहा है जिसके तहत परिवार नियोजन के प्रति जागरूक किया जा रहा है और ये 'पहल किट' दी जा रही है.
उनके अनुसार, "शहरी इलाकों में लोग जागरूक हैं तो ऐसे में ग्रामीण या आदिवासी इससे वंचित क्यों रहें. उनकी काउंसलिंग करने के बाद उन्हें ये किट दिए गए तो उसमे ग़लत क्या है."
नेहा बग्गा कांग्रेस के प्रवक्ता पीयूष बाबेल का जवाब देते हुए कहती हैं, "ज़बरदस्ती नसबंदी का कार्यक्रम चलाने वाली पार्टी, बीजेपी को पाठ न पढ़ाए कि परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता का पैमाना क्या होना चाहिए."
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मध्य प्रदेश में महिलाओं के लिए योजनाएं
- मुख्यमंत्री कन्या विवाह/निकाह योजना साल 2006
- ये ग़रीब, विधवा और पिछड़ी महिलाओं के सामूहिक विवाह के लिए शुरू की गई थी.
- इसके लिए लड़की के परिवार को ग्राम प्रधान या जनपद पंचायत में अर्ज़ी देनी होती है.
- इस योजना की शुरुआत मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने की थी.
- इसमें 55,000 रुपये दिए जाते हैं. इसमें से लड़की को 49 हज़ार रुपये और 6000 रुपये सामूहिक विवाह कार्यक्रम के आयोजनकर्ता को दिए जाते हैं.
- मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाल ही में 'लाडली बहना' योजना की शुरुआत की है.
- 23 से 60 साल की महिलाएं जिनके पास पांच एकड़ से कम ज़मीन है और सालाना आय 2.5 लाख से कम है, वो इस योजना का लाभ उठा सकती हैं.
- राज्य में जिस तरह से शिवराज सिंह चौहान ने लड़कियों को ध्यान में रखते हुएकल्याणकारी नीतियां लागू की हैं, उसकी वजह से वे 'मामा' के तौर पर भी जाने जाते हैं.

उठ रहे सवाल
सांध्य टाइम्स के एडिटर संजय प्रकाश कहते हैं कि ऐसे सामूहिक विवाह के मामलों में कई घोटाले भी सामने आए हैं और उनकी जांच चल रही है.
वे कहते हैं, "प्रेग्नेंसी वाले मामले ने इसलिए तूल पकड़ा क्योंकि कई दंपति पहले से शादीशुदा होते हैं, पैसा लेने के चक्कर दूसरी बार शादी कर लेते हैं. वहीं ऐसी फ़र्ज़ी शादी में अधिकारी भी शामिल होते हैं."
"ऐसे में अधिकारियों को इन सामूहिक शादी से पहले प्रेग्नेंसी टेस्ट का सुझाव दिया गया होगा. परिवार नियोजन के लिए तो पर्चे भी बांटे जा सकते थे फिर गोलियां या कंडोम देने का क्या मतलब है. अधिकारियों को पहले जांच करनी चाहिए थी कि कौन शादीशुदा है कौन नहीं."
वरिष्ठ पत्रकार अरुण दीक्षित एक दूसरा मुद्दा उठाते हुए कहते हैं कि ऐसे प्रयोग आदिवासी बहुल इलाके में ही क्यों होते हैं?
उनके अनुसार, "अगर कोई लड़की प्रेग्नेंट भी है तो उसे शादी करने के लिए कैसै मना किया जा सकता है. इस मामले में ठोस कार्रवाई की जानी चाहिए थी लेकिन ये मामला आया गया हो गया और किसी लड़की के वैनिटी बॉक्स में पिल और कंडोम रखना उनका अपमान है."
जानकारों का कहना है कि शिवराज चौहान की इन योजनाओं ने वोटरों ख़ासकर महिलाओं को न केवल उनसे भावनात्मक तौर पर जोड़ा है बल्कि चुनावी में जीत दिलाने में भी मदद की है.
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