फोगाट बहनों की तस्वीरों से छेड़छाड़? - क्या ये भविष्य के फ़ेक न्यूज़ की शुरुआत है?

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- Author, विनीत खरे & श्रुति मेनन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
28 मई को जब दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे पहलवानों को हिरासत में लिया तो विनेश फ़ोगाट की ली हुई सेल्फ़ी के दो वर्ज़न भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए.
इस सेल्फ़ी में विनेश और संगीता फ़ोगाट पुलिस बस में बैठे नज़र आते हैं. उनके साथ तीन पुलिस वाले और चार अन्य लोग भी बैठे दिखते हैं.
पत्रकार मनदीप पुनिया ने उसी दिन दोपहर साढ़े बारह बजे जो तस्वीर ट्वीट की उसमें विनेश और संगीता गंभीर मुद्रा में नज़र आते हैं.
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हमें करीब डेढ़ घंटे बाद दोपहर दो बजे रियल बाबा बनारस नाम के एक ट्विटर यूज़र की ट्वीट की गई तस्वीर मिली.
सेल्फ़ी के इस दूसरे वर्ज़न में विनेश और संगीता मुस्कुराती हुई नज़र आती हैं और उनके चेहरों पर डिंपल हैं.
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ये हो सकता है कि इससे पहले भी यही तस्वीर ट्वीट की गई हो, जिसे हम न देख पाए हों.
कई ट्विटर यूज़र्स ने इस मुस्कुराती हुई तस्वीर को शेयर किया और उसके ये मतलब निकाले कि भारतीय कुश्ती महासंघ प्रमुख बृजभूषण शरण सिंह के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे पहलवान अपने विरोध को लेकर गंभीर नहीं हैं.
एक ट्विटर यूज़र ने लिखा, "यह एक टूल किट का हिस्सा बन चुके हैं जो अपने देश को तोड़ने का काम करते हैं."
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बाद में प्रदर्शन कर रहे पहलवान बजरंग पुनिया ने मुस्कुराती हुई वायरल तस्वीर को जाली बताते हुए ट्वीट किया और लिखा "IT Cell वाले ये झूठी तस्वीर फैला रहे हैं."
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तस्वीर से छेड़छाड़ किसने की?
ये साफ़ नहीं है कि असली तस्वीर से छेड़छाड़ किसने की.
फैक्ट चेकिंग वेबसाइट बूम लाइव ने कहा कि विनेश और संगीता फ़ोगाट की असल तस्वीर में मुस्कुराहट को जोड़ दिया गया.
बूम लाइव के अलावा हमने भी फेसऐप नाम की एक ऐप का इस्तेमाल किया. इस ऐप की मदद से आप तस्वीरों में लोगों के चेहरों के भाव बदल सकते हैं.
हमने दूसरे फेस एडिटिंग ऐप का भी इस्तेमाल किया लेकिन फेसऐप की मदद से बदली तस्वीर का नतीजा वायरल हुई तस्वीर के जैसा ही था.
कई कोशिशों के बावजूद हमारी विनेश फ़ोगाट, संगीता फ़ोगाट या बजरंग पुनिया से इस तस्वीर को लेकर सीधी बात नहीं हो पाई, लेकिन बीबीसी को संगीता फ़ोगाट की ओर से मिले संदेश में कहा गया कि सेल्फी इसलिए खींची गई थी क्योंकि "पहलवानों में अनिश्चितता और डर था कि उन्हें कहा ले जाया जा रहा है, उनके साथ कितने लोगों को हिरासत में लिया गया है और पुलिस वालों को क्या आदेश दिए गए थे."
फ़ैक्ट चेकर पंकज जैन के मुताबिक अगर विनेश और संगीता फ़ोगाट की असल तस्वीर सामने नहीं आती तो लोग जाली तस्वीर पर ही विश्वास कर लेते.
वो कहते हैं, "ये भविष्य के फ़ेक न्यूज़ की शुरुआत है. अभी तक जाली तस्वीर को आम आदमी पकड़ लेता था लेकिन अब ये बहुत मुश्किल हो जाएगा."
ओपन सोर्स इन्वेस्टिगेटर और सेंटर फ़ॉर इन्फॉर्मेशन रेज़िलियंस के बेंजामिन स्ट्रिक लंबे समय से भारत में फ़ेक न्यूज़ के खतरों पर नज़र रखे हुए हैं. पहलवानों के महीने भर से जारी प्रदर्शन पर भी उनकी निगाह रही है. उन्होंने विनेश की सेल्फ़ी के दोनो वर्ज़न देखे.
ये भविष्य के फ़ेक न्यूज़ की शुरुआत है. अभी तक जाली तस्वीर को आम आदमी पकड़ लेता था लेकिन अब ये बहुत मुश्किल हो जाएगा
वो जाली काम से "बहुत प्रभावित" तो हैं, लेकिन साथ ही उनमें "डर" भी है, ख़ासकर जिस तरह असल तस्वीर में बदलाव लाए गए.
बेंजामिन स्ट्रिक के मुताबिक़ जिस तरह वायरल तस्वीर में विनेश और संगीता फ़ोगाट के चेहरों पर एक जैसी सी मुस्कुराहट थी, उनके पूरे दांत दिख रहे थे, उससे इशारे मिले कि वो तस्वीर जाली थी.
हमने विनेश और संगीता फ़ोगाट की पुरानी तस्वीरों को ढूंढा लेकिन किसी में भी उनके चेहरों पर डिंपल नहीं थे.
हालांकि ये छोटी-छोटी बातें इशारा करती हैं कि कौन सी तस्वीर असली है और कौन सी तस्वीर जाली, वक्त के साथ नई-नई तकनीक बाज़ार में आ रही हैं जिनसे असली और जाली तस्वीरों, वीडियो के बीच फ़र्क बताना और ज़्यादा मुश्किल होता जा रहा है.
ब्रिटेन के लैंकैस्टर विश्वविद्यालय में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर रिसर्च कर रहीं असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ. सोफ़ी नाइटइंगल कहती हैं कि अगर बदलाव बहुत जटिल तरीके से किए गए हैं तो ये पक्के तौर पर नहीं बताया जा सकता कि कौन सी तस्वीर असल है और कौन जाली.
जिस तरह वायरल तस्वीर में विनेश और संगीता फ़ोगाट के चेहरों पर एक जैसी सी मुस्कुराहट थी, उनके पूरे दांत दिख रहे थे, उससे इशारे मिले कि वो तस्वीर जाली थी.
आशंकाएं
भारत अब दुनिया का सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश है जहां डेटा बेहद सस्ता है और दूसरे कई देशों की तरह फेक न्यूज़ की समस्या चुनौतीपूर्ण है.
ऐसे में असली से दिखने वाले जाली वीडियो, डीपफ़ेक वीडियो स्थिति को और गंभीर बना रहे हैं.
डीपफ़ेक एक तकनीक है जिसका इस्तेमाल ऑडियो और वीडियो में छेड़छाड़ कर लोगों को वो बातें करते या कहते दिखाने के लिए किया जाता है जो उन्होंने न कहीं हो या की हों.
डर ये भी है कि बिल्कुल असली से नज़र आने वाले जाली वीडियो को बनाने वाले सॉफ़्टवेयर या तो मुफ़्त में या फिर बहुत सस्ते में आसानी से उपलब्ध हैं.
बेंजामिन स्ट्रिक कहते हैं, "ढेर सारे ऐप्लिकेशंस या तो मुफ़्त में उपलब्ध हैं या फिर उनका मासिक खर्च पांच या आठ डॉलर है. कुछ पर सालाना खर्च 50 डॉलर आता है और वहां आप बहुत अच्छे डीप फ़ेक वीडियो बना सकते हैं या फिर तस्वीरों से छेड़छाड़ कर सकते हैं."
और व्हाट्सऐप और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया ऐप्स के माध्यम से इन फेक वीडियो का आम लोगों तक पहुंचना आसान हो जाता है. बात हो रही है कि फेक न्यूज़ फैलाने वालों के अलावा ज़िम्मेदारी सोशल मीडिया कंपनियों की भी है.
सोफ़ी नाइटइंगल कहती हैं, "फ़ेक कंटेट के फ़ैलाव के लिए सोशल मीडिया एक बहुत प्रभावशाली मीडियम है. इन कंपनियों पर दबाव डालने के लिए अभी फ़िलहाल बहुत कम कानूनी नियंत्रण है, ताकि ऐसे कंटेट इन प्लेटफ़ॉर्म से दूर रहें."
रिपोर्टों के मुताबिक़, भारत में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से फैलने वाली फेक न्यूज़ को रोकने के लिए सरकार कानून ला रही है और विधेयक का पहला मसौदा जून के पहले हफ़्ते में आ जाएगा.

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ये पहली घटना नहीं
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को जहां दुनिया में मेडिकल क्षेत्र आदि में विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, इससे पेश होने वाले संभावित ख़तरों की चर्चा भी ज़ोरों पर है. बात हो रही है कि क्या ऐसा वक्त भी आएगा कि मशीन इंसान से समझदारी में आगे निकल जाए.
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस रिसर्चर प्रोफेसर शंकर पाल कहते हैं, "हम नहीं चाहते कि कि मशीन इंसान को नियंत्रित करें. इससे अनर्थ हो जाएगा."
अरबपति एलन मस्क ने तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा ख़तरा तक बताया है.
हाल ही में एलन मस्क समेत तकनीक की दुनिया की हज़ार से ज़्यादा हस्तियों ने एक खुले पत्र में सबसे ताकतवर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस सिस्टम्स के विकास पर छह महीने की रोक लगाने की बात की थी.

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इसके अलावा चैटजीपीटी प्रमुख ने हाल ही में कहा था कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को कोई वैश्विक एजेंसी या अमेरिका नियंत्रित करे.
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को दुनिया भर में ग़लत जानकारी फैलाने के संभावित गंभीर ख़तरे के तौर पर देखा जा रहा है.
साल 2020 में दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के आर्टिफिशियल तकनीक के कथित इस्तेमाल पर काफ़ी बहस हुई थी.
गुजरात में डीपफेक तकनीक के राजनीतिज्ञों के ख़िलाफ़ कथित इस्तेमाल पर चिंता की बात भी रिपोर्ट हुई है.
इसके अलावा अमेरिका में पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप की गिरफ़्तारी की जाली तस्वीरें सामने आई थीं.

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के फायदों और नुकसान पर जहां पश्चिमी देशों में बात हो रही है, क्या ऐसी जागरुकता भारत में भी है?
बेंजामिन स्ट्रिक कहते हैं कि उन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की नीतियों को लेकर जितनी जागरुकता दूसरे देशों, खासकर पश्चिमी देशों में नज़र आती है, उतनी भारत में नहीं.
वहीं, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ. सोफ़ी नाइटइंगल कहती हैं, "समाज को फ़ायदों और नुकसान के बारे में समझाने में मदद करना लोगों को सक्षम बनाने का एक महत्वपूर्ण कदम है ताकि लोग बेहतर फ़ैसले ले सकें कि किस कंटेंट पर विश्वास किया जाए और किस पर नहीं."
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