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अरविंद केजरीवाल एलजी से विवाद पर समर्थन जुटाने निकले, असमंजस में कांग्रेस
- Author, चंदन जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बाद अब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने देश भर का दौरा शुरू किया है. दोनों ही मुख्यमंत्रियों का मक़सद एक है, लेकिन काम अलग-अलग हैं.
नीतीश साल 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी विरोधी दलों को एकजुट करने में लगे हैं, जबकि केजरीवाल केंद्र सरकार के एक अध्यादेश के ख़िलाफ़ बीजेपी विरोधी दलों का समर्थन चाहते हैं.
केजरीवाल ने अपनी मुहिम को लोकतंत्र और न्यायपालिका को बचाने से जोड़ा है. इसके लिए उन्होंने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और पार्टियों के अन्य नेताओं के साथ मंगलवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाक़ात की है.
अरविंद केजरीवाल ने बुधवार को उद्धव ठाकरे से मुंबई में उनके घर पर मुलाकात की.
इस मुलाकात के बाद उद्धव ठाकरे ने कहा, "आने वाला साल चुनाव का साल है, इस बार अगर ट्रेन छूट गई तो हमारे देश से प्रजातंत्र गायब हो जाएगा. विपक्ष खुद में एक अजीबो-गरीब शब्द हैं. हम सभी देश प्रेमी हैं, देश से जो प्रजातंत्र हटाना चाहते हैं उनके खिलाफ़ जो लोग हैं उन्हें विपक्ष कहना चाहिए."
"लोकतंत्र विरोधी लोगों का मुकाबला करने और संविधान को बचाने के लिए हम सभी एक साथ आए हैं. प्रजातंत्र में जनता की ओर से चुने लोग सर्वोपरि होने चाहिए. आम आदमी पार्टी सरकार के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट ने जो फ़ैसला दिया था उसके ख़िलाफ़ केंद्र सरकार अब अध्यादेश ले कर आई है. ये कैसा लोकतंत्र है?"
आने वाले दिनों में केजरीवाल इस मुद्दे पर कई अन्य नेताओं से भी मिलने वाले है
उधर केंद्र की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने अरविंद केजरीवाल की मांग पर अब तक कोई फ़ैसला नहीं लिया है.
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने एक ट्वीट में कहा है कि कांग्रेस इसके लिए पहले सभी राज्यों के अपने नेताओं और अन्य समान विचारधारा वाली पार्टियों से बात करेगी.
माना जा रहा है कि दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों के कांग्रेस नेताओं से बातचीत किए बिना कोई भी फ़ैसला पार्टी के स्थानीय नेताओं के महत्व को कम कर सकता है, इसलिए कांग्रेस इस मामले में ज़ल्दबाज़ी से बचना चाहती है.
कांग्रेस नेता गौरव वल्लभ ने बताया, "हमारा इस मुद्दे पर रुख़ स्पष्ट है, हम अपने संगठन और समान विचारधारा वाली पार्टियों से बात करेंगे फिर फ़ैसला लेंगे."
राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे इसमें कांग्रेस का असमंजस देखते हैं. उनके मुताबिक़, "एक तरफ़ यह मुद्दा राज्य सरकारों की शक्ति से जुड़ा है और यह भविष्य में दिल्ली में किसी भी पार्टी की सरकार बने उसके लिए भी महत्वपूर्ण है."
इस लिहाज से कांग्रेस इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी का समर्थन करना चाहेगी. लेकिन दूसरी तरफ़ वोटों की राजनीति का एक मुद्दा है जो कांग्रेस को सावधान करता है.
अभय कुमार दुबे के कहते हैं, "कांग्रेस अगर इस मुद्दे पर दिल्ली सरकार का साथ देती है तो इससे आम आदमी पार्टी को राहत मिलेगी, लेकिन यह ऐसी पार्टी है जो हर जगह कांग्रेस को वोटों का नुक़सान करती है."
क्या है मामला
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई को दिल्ली सरकार के अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले का अधिकार दिल्ली सरकार को दे दिया था.
इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ केंद्र सरकार 19 मई को एक अध्यादेश लेकर आई. इसके ज़रिए केंद्र सरकार ने दिल्ली सरकार को सुप्रीम कोर्ट से मिले अधिकार छीनकर दिल्ली के उपराज्यपाल को दे दिए.
अब केंद्र के इस अध्यादेश को छह महीने के अंदर संसद के दोनों सदनों से पास कराना ज़रूरी है, तभी यह क़ानून बन पाएगा. ऐसा न हो पाने से केंद्र सरकार का अध्यादेश ख़ुद ही ख़त्म हो जाएगा.
अरविंद केजरीवाल चाहते हैं कि राज्य सरकार के अधिकारों की रक्षा के लिए बीजेपी विरोधी दल इस मामले में उनका साथ दें और इसे राज्यसभा में पास न होने दें.
इस मुद्दे पर संविधान के जानकार और लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी अचारी का कहना है, "सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को ख़त्म करने के लिए संसद में कई बार नए क़ानून पारित हुए हैं. लेकिन मौजूदा अध्यादेश से जो हालात बने हैं, वैसा कम होता है. सरकार अगर इसे विधेयक के तौर पर राज्यसभा में लाती है तो उसे परेशानी ज़रूर होगी."
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नीतीश की कोशिश
दिल्ली सरकार के अधिकारों पर केंद्र के अध्यादेश के मसले पर भी नीतीश कुमार ने केजरीवाल से मुलाक़ात की है.
केजरीवाल ने इस लड़ाई को अगले लोकसभा चुनाव का सेमीफ़ाइनल बताया है.
फ़िलहाल केंद्र सरकार लोकसभा में भले ही इस विधेयक को आसानी से पास करा ले, लेकिन राज्यसभा में उसकी स्थिति विपक्ष के मुक़ाबले थोड़ी कमज़ोर दिखती है.
राज्यसभा में बीजेपी के पास 93 सांसद हैं. जबकि कांग्रेस के पास 31, टीएमसी-12, आप-10, टीआरएस-7, आरजेडी-6, सीपीएम-5, जेडीयू-5, एनसीपी-4, एसपी-3, सीपीआई-2 और जेएमएम के पास दो सांसद हैं.
इस सदन में डीएमके (10), बीजू जनता दल (9), वाईएसआर कांग्रेस (9) और अन्य छोटे दलों को सत्ता पक्ष या विपक्ष जो भी अपने साथ ले आएगा,जीत उसी की होगी.
इससे पहले 'राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र शासन संशोधन विधेयक 2021' के मामले में कांग्रेस सैद्धांतिक रूप से दिल्ली सरकार के समर्थन और केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ ज़रूर दिखी थी.
इसके अलावा साल 2020 में कृषि क़ानूनों से जुड़े विधेयक के मामले में कांग्रेस और आप समेत तमाम विपक्षी दल सरकार के ख़िलाफ़ थे. भारी हंगामें के बीच विधेयक के पास होने के बाद राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश के ख़िलाफ़ भी विपक्ष ने नारेबाज़ी की थी. लेकिन इस विधेयक को पारित होने से विपक्ष रोक नहीं पाया.
कांग्रेस का असमंजस
अरविंद केजरीवाल ने हाल ही में यूपी में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में आप का खाता खुलने के बाद दावा किया है कि संगठन बनने के बाद यूपी में उनकी पार्टी को कोई रोक नहीं सकता.
सवाल यह भी उठता है कि यूपी में अगर आम आदमी पार्टी आगे बढ़ती है तो इसका नुक़सान किसे होगा? रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले साल हुए दिल्ली नगर निगम चुनाव के अलावा आप ने हमेशा कांग्रेस का ही नुक़सान किया है.
दिल्ली में बीजेपी पिछले 6 विधानसभा चुनावों से लगातार हार रही है. यहां साल 2013 में आप ने ही कांग्रेस से उसकी सत्ता छीनी थी. उसके बाद आप ने लगातार कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाई है.
साल 2009 के लोकसभा चुनावों में जहां कांग्रेस ने दिल्ली की सभी सात लोकसभा सीटें जीती थीं. वहीं साल 2014 और 2019 में दिल्ली की सभी सीटों पर बीजेपी की जीत हुई थी.
पिछले लोकसभा चुनावों की बात करें तो इसमें कांग्रेस और आप के बीच गठबंधन की संभावना ज़रूर बन रही थी. उस वक़्त आप ने कांग्रेस को तीन सीटों पर चुनाव लड़ने का इशारा किया था, लेकिन कांग्रेस इसके लिए राज़ी नहीं हुई थी.
साल 2019 में राज्य में आप की सरकार होने के बाद भी कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में क़रीब 23 फ़ीसदी वोट मिले थे, जबकि आप को 18 फ़ीसदी वोट ही मिले थे.
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वहीं आम आदमी पार्टी ने साल 2022 में पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हराकर अपनी सरकार बनाई थी.
इस जीत के बाद आप लोकसभा चुनावों में पंजाब में अपना बड़ा दावा पेश कर सकती है. जबकि साल 2019 के लोकसभा चुनावों में आप को क़रीब 8 फ़ीसदी वोट और एक सीट मिली थी. वहीं कांग्रेस ने 40 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट के साथ पंजाब की 13 में से 8 लोकसभा सीट अपने कब्ज़े में की थी.
यही हाल गुजरात का है जहां बीजेपी सत्ता में है लेकिन आप के विस्तार ने यहां भी कांग्रेस को नुक़सान पहुंचाया है और इससे बीजेपी को बड़ा फ़ायदा हुआ है.
साल 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को राज्य में क़रीब 43 फ़ीसदी वोट और 77 सीटें मिली थीं, पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को महज़ 28 फ़ीसदी वोट और 17 सीटें ही मिलीं थीं.
इसकी बड़ी वजह कांग्रेस के वोट बैंक में आप की सेंध मानी जाती है. पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों में आप को क़रीब 13 फ़ीसदी वोट के साथ 5 सीटें मिली थीं. इस तरह से भले राज्य की सभी 26 सीटों पर फ़िलहाल बीजेपी का कब्ज़ा है. लेकिन आप की मौजूदगी से गुजरात में कांग्रेस की संभावनाओं को झटका लग सकता है.
इसके अलावा मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी आप ने विस्तार की योजना बनाई है, जहां बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुक़ाबला है. आप के सक्रिय होने से इस राज्यों में भी कांग्रेस को नुक़सान की आशंका है.
इसलिए कांग्रेस लोकसभा चुनावों को लेकर आप के रुख़ का इंतज़ार भी कर सकती है. दूसरी तरफ़ ऐसे मसलों का समाधान निकालना नीतीश कुमार के लिए भी आसान काम नहीं होगा.
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