You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
पंजाब चुनाव: अरविंद केजरीवाल ने ख़ुद को क्यों बताया दुनिया का सबसे 'स्वीट आतंकवादी'
- Author, अनुराग कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पंजाब विधानसभा चुनाव में 20 फ़रवरी को वोटिंग से पहले एक बार फिर 'खालिस्तान' का मुद्दा सामने आया है.
आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे कुमार विश्वास ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगाया है कि पंजाब में चुनाव जीतने के लिए केजरीवाल अलगाववादी तत्वों का समर्थन लेने को तैयार थे.
कुमार विश्वास ने समाचार एजेंसी एएनआई को दिए इंटरव्यू में कहा था, "एक दिन उन्होंने मुझसे यह तक कहा था कि वह या तो पंजाब के मुख्यमंत्री बनेंगे या एक स्वतंत्र देश के पहले प्रधानमंत्री बनेंगे."
इस मामले को तूल पकड़ता देख शुक्रवार को अरविंद केजरीवाल ने सफ़ाई दी. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ख़ुद को दुनिया का सबसे 'स्वीट आंतकवादी' करार दिया.
केजरीवाल की सफ़ाई
अरविंद केजरीवाल ने विपक्षी पार्टियों पर सांठगांठ कर अपने ख़िलाफ़ साजिश का आरोप लगाया है.
उन्होंने कहा, ''ये सारे लोग इकट्ठे हो गए हैं. ये कह रहे हैं कि पिछले 10 साल से केजरीवाल देश के 2 टुकड़े करने का प्लान बना रहा है. फिर मैं इनमें से एक का प्रधानमंत्री बन जाऊंगा. ये तो कॉमेडी है. 10 साल में 3 साल कांग्रेस की सरकार थी, पिछले 7 साल से बीजेपी की सरकार थी. क्या ये लोग सो रहे थे. एजेंसियां क्या कर रही थीं. मुझे इनकी बात सुनकर हंसी आ रही है.''
केजरीवाल ने कहा, ''शायद मैं दुनिया का सबसे 'स्वीट आतंकवादी' हूं, जो लोगों के लिए अस्पताल बनवाता है, स्कूल बनवाता है, सड़कें बनवाता है. बिजली फ़्री देता है, पानी ठीक करता है.''
इस प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने ये भी कहा कि "सौ साल पहले अंग्रेज़ों ने भगत सिंह को आतंकवादी बोला था और आज भगत सिंह के चेले को आतंकवादी साबित करने की कोशिश हो रही है." सोशल मीडिया पर केजरीवाल के इस बयान की भी काफ़ी चर्चा है.
केजरीवाल की सफ़ाई के बाद ये मुद्दा वोटिंग के वक़्त लोगों को कितना प्रभावित करता है, इसका आकलन अभी करना मुश्किल है. लेकिन चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में इसको लेकर सियासत खूब हुई.
केजरीवाल पर हमलवार विपक्षी पार्टियां
बीजेपी से लेकर कांग्रेस तक कुमार विश्वास के बयान का हवाला देकर अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को घेर रहे हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फाजिल्का की जनसभा में अरविंद केजरीवाल पर हमला बोलते हुए कहा, ''कल इनके एक पुराने विश्वस्त साथी ने, जो पिछले चुनाव में पंजाब के प्रभारी और ख़ासमख़ास थे, ख़तरनाक आरोप लगाया है. दर्द हुआ होगा तब ही उन्होंने बयान दिया. उन्होंने इनके (अरविंद केजरीवाल) चरित्र का जो वर्णन किया है, इसे गंभीरता से लेने की ज़रूरत है."
प्रधानमंत्री ने कहा, "ये लोग पंजाब को तोड़ने का सपना पाले हुए हैं. ये लोग सत्ता के लिए अलगाववादियों से हाथ मिलाने को तैयार हैं. सत्ता पाने के लिए इन लोगों को अगर देश भी तोड़ना पड़े तो ये उसके लिए तैयार हैं. इनका एजेंडा और पाकिस्तान का एजेंडा अलग है ही नहीं."
उधर इस मुद्दे पर अरविंद केजरीवाल को घेरने में कांग्रेस भी पीछे नहीं है. गुरुवार को पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने कुमार विश्वास के आरोपों की जांच की मांग करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी भी लिखी.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी पंजाब के बस्सी पठानां में हुई रैली में कुमार विश्वास के बयान को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री पर निशाना साधा.
राहुल ने कहा, "कुछ दिन पहले आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे कुमार विश्वास ने अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगाया है. उनके आरोप के बारे में अरविंद केजरीवाल जी एक शब्द नहीं कह पा रहे रहे हैं. उन्हें जवाब देना चाहिए. उन्हें सीधा जवाब देना चाहिए कि कुमार विश्वास झूठ बोल रहे हैं या सच? केजरीवाल जवाब इसलिए नहीं दे रहे हैं क्योंकि आम आदमी पार्टी के फाउंडर (कुमार विश्वास) सच बोल रहे हैं."
हालांकि गुरुवार को पंजाब के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने कुमार विश्वास के इस बयान पर रोक लगा दी थी. कुमार विश्वास के इंटरव्यू को आयोग ने अपने बयान में सांप्रदायिक और नफ़रती बताया था. लेकिन कुछ घंटों बाद ही ये रोक हटा ली गई.
ये पहला मौक़ा नहीं जब खालिस्तान का मुद्दा पंजाब चुनाव से पहले उठा हो.
साल 2017 के चुनाव में खालिस्तान का मुद्दा
साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भी चरमपंथ और खालिस्तान को लेकर पंजाब की राजनीति का गरमा गई थी.
चुनाव प्रचार के दौरान आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल मोगा के घाल कलां में गुरिंदर सिंह के घर पर रुके थे. विपक्षी दलों ने उनपर चुनाव में चरमपंथी ताक़तों से समर्थन लेने का आरोप लगाया था. दरअसल गुरिंदर पर खालिस्तान कमांडो फोर्स (KCF) से जुड़े होने का आरोप था. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार गुरिंदर का नाम 1997 में हुए एक धमाके में भी आया था. हालांकि बाद में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकरण ने पंजाब में आम आदमी पार्टी को 2017 के विधानसभा चुनाव में काफ़ी नुकसान पहुंचाया था.
पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर आशुतोष कुमार पिछले विधानसभा चुनाव को याद करते हुए कहते हैं, "2017 चुनाव में उनपर चरमपंथी संगठनों से मदद लेने का आरोप लगा था. उस वक़्त एक धमाका भी हुआ था. जिससे यह हवा बनी कि ये खालिस्तानियों के साथ हैं. इससे हिंदू वोट आम आदमी पार्टी से छिटक गए थे. उन्हें चुनावों में काफी नुकसान उठाना पड़ा था."
प्रोफ़ेसर आशुतोष कहते हैं, ''पंजाब के लोग खालिस्तान के मुद्दे पर वापस जाना नहीं चाहते, लोगों को पता है कि आतंकवाद ने यहां कितना नुकसान किया है. यही वजह है कि खुले तौर पर खालिस्तान का समर्थन करने वाली सिमरनजीत सिंह मान की शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) जैसी पार्टियां हाशिए पर चली गई हैं."
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री भी प्रोफ़ेसर आशुतोष की बातों से सहमत दिखते हैं.
वे कहते हैं, "2017 के विधानसभा चुनाव के वक़्त आम आदमी पार्टी ने 2 बड़ी ग़लतियां कीं. पहला कि वो गुरिंदर सिंह के यहां रुके, दूसरा, उन्होंने सीएम पद का कोई चेहरा घोषित नहीं किया. इन दोनों घटनाओं से लोगों में ग़लत संदेश गया और उनको चुनाव में काफ़ी नुकसान उठाना पड़ा."
2017 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी मोगा सीट महज 2,000 से भी कम वोट के अंतर से हार गई थी.
कुमार विश्वास के बयान के 48 घंटे बाद अरविंद केजरीवाल की सफ़ाई को जानकार 2017 की इस घटना से भी जोड़ कर देख रहे हैं.
आखिर बार-बार क्यों उठता है खालिस्तान का मुद्दा
80 के दशक में पंजाब में अलगाववाद ने ज़ोर पकड़ा. पंजाब को भारत से अलग करके खालिस्तान बनाने की मांग उठने लगी. इसने वहां के सामाजिक ताने-बाने को काफ़ी नुकसान पहुंचाया. 80 और 90 के दशक में पंजाब में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई, इसमें हज़ारों लोग मारे गए. इनमें हिंदू और सिख दोनों समुदाय के लोग थे.
पंजाब में खालिस्तान मुद्दे की अहमियत के सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते, ''पंजाब के अंदर लगभग एक दशक तक आतंकवाद रहा. इसलिए 'खालिस्तान' पंजाब की भावनाओं से जुड़ा मुद्दा है. राजनीतिक दलों को हर चुनाव के समय खालिस्तान, 1984 दंगे जैसे मुद्दे याद आते हैं. यहां धार्मिक कट्टरपंथियों को लुभाने के लिए हर चुनाव में खालिस्तान का मुद्दा उछाला जाता है. हालांकि इस तरह के लोगों की संख्या काफी कम है."
वहीं प्रोफ़ेसर आशुतोष कुमार कहते हैं, "पंजाब का आतंकवाद का इतिहास रहा है. हिंसा को लेकर लोगों की यादें ताज़ा हैं. आम लोगों के अंदर इसे लेकर एक भय की भावना भी है, इसलिए इस मुद्दे को उछाला जा रहा है. पिछले चुनाव में भी ये मुद्दा उछला था."
ये भी पढ़ें
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)