मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह मामलाः पांच साल बाद कहां हैं लड़कियां, अब तक क्या-क्या हुआ

    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना

"मैं कब मुज़फ़्फ़रपुर के शेल्टर होम में पहुंची मुझे याद नहीं है, उस वक़्त मैं बहुत छोटी थी. मेरे माता-पिता की मृत्यु हो गई थी, इसलिए मुझे वहीं पर सहारा मिला. पांच साल पहले वहां जो हो रहा था, हमें सब मालूम था, लेकिन कुछ कर नहीं पा रहे थे."

यह दर्द है एक अनाथ बच्ची का जो उस वक़्त मुज़फ़्फ़रपुर की बालिका गृह में ही थी. इस बच्ची का दावा है कि जब वो वहां रह रही थी तब बच्चियों का शोषण हो रहा था. इस बच्ची को आज भी वहां की सारी बातें याद हैं.

इस घटना के सामने आने के पांच साल बाद बीबीसी ने यह जानने की कोशिश की है कि अब मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह में रह रही बच्चियां कहां हैं, इस मामले में कितने गुनाहगारों को सज़ा हो पाई और यह केस अब तक कहां पहुंचा है.

कहां हैं बच्चियां

मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह को बंद करते वक़्त वहां 52 बच्चियां थीं. हमने बिहार राज्य के स्टेट चाइल्ड प्रोटेक्शन सोसाइटी की मदद से ऐसी ही एक बच्ची से बात की.

पांच साल पहले आशा (बदला हुआ नाम) मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर होम से सरकार की निगरानी में पटना पहुंची थीं. उनके साथ शेल्टर होम की कुल 16 लड़कियों को पटना के शेल्टर होम में शिफ़्ट किया गया था.

आशा याद करते हुए कहती हैं, "उस समय कई बच्चियों को उनके घर वापस भेज दिया गया था. मेरा कोई क़रीबी रिश्तेदार नहीं है इसलिए मैं घर नहीं गई. मैंने शेल्टर होम में पहले ब्यूटी पार्लर का कोर्स किया और पढ़ाई भी की."

आशा बताती हैं कि बाद में उन्होंने बैंगलुरू से होटल मैनेजमैंट का कोर्स किया और अब वो एक होटल में नौकरी भी करती हैं. इन सब में बिहार सरकार की तरफ़ से उनकी मदद की गई थी.

आशा अब क़रीब 18 साल की हो चुकी हैं और वो पुराने दिनों को याद करने से घबराती हैं. वो जब मुज़फ़्फ़रपुर से पटना आईं तब उनकी उम्र क़रीब 12 साल की थी.

उनका कहना है कि मुज़फ़्फ़रपुर के बालिका गृह तक वो कैसे पहुंची यह याद नहीं है, क्योंकि उनकी उम्र उस वक़्त काफ़ी कम थी और मां-बाप की मौत के बाद उन्हें शेल्टर होम लाया गया था.

लेकिन आशा को मुज़फ़्फ़रपुर में बच्चियों के साथ होने वाली घटना याद है. वो कहती हैं, "हमलोग जानते सबकुछ थे कि यहां क्या हो रहा है. लेकिन डर की वजह से कुछ कर नहीं पाते थे और न ही किसी को बता पाते थे."

आशा जैसी कई बच्चियों को हिम्मत तब आई जब साल 2018 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़ ने बिहार के शेल्टर होम पहुंचकर वहां बच्चियों से बात की.

यह उनकी एक रिपोर्ट का हिस्सा था.

घर वापसी की चुनौती

बिहार के बाल कल्याण विभाग ने मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर होम से 36 बच्चियों को उनके परिवार के पास वापस भेज दिया था. इनमें से कुछ बच्चियों की शादी भी हो चुकी है.

जबकि इनमें 16 विकलांग बच्चियां हैं जिन्हें बिहार के ही अलग-अलग बालिका गृह में रखा गया है. दरअसल कई ऐसी विकलांग बच्चियां होती हैं, जिन्हें ख़ुद उनके घरवाले ही अस्पताल जैसी जगहों पर छोड़ देते हैं.

बिहार सरकार में समाज कल्याण विभाग के निदेशक प्रशांत कुमार सीएच ने बीबीसी को बताया, "हमारी पहली कोशिश होती है कि ऐसी बच्चियों के परिवार का पता लगाकर उन्हें वापस परिवार के बीच भेजा जाए."

मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर होम से जिन लड़कियों को वापस परिवार के पास भेजा गया, उनमें से केवल दो लड़कियां घर पर नहीं रह सकीं और दोबारा सरकार की निगरानी में बालिका गृह पहुंच गईं.

सरकार की तरफ़ से इन बच्चियों के भविष्य के लिए सिलाई मशीन जैसी कई चीज़ें दी गईं. इसके अलावा उनके परिवार वालों को सात से 10 लाख रुपये तक की आर्थिक मदद दी गई.

कई मामलों में इन पैसों के लिए परिवार में झगड़ा शुरू हो गया.

जिनपर आरोप लगे

मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह का मामला सुर्ख़ियों में आने के बाद राज्य सरकार ने इसे सीबीआई को सौंप दिया था. वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता निवेदिता झा ने इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी कई याचिका डाली थी. सुप्रीम कोर्ट ने यह केस राज्य से बाहर सुनवाई के लिए दिल्ली के साकेत कोर्ट में ट्रांसफ़र कर दिया था.

बालिका गृह में रह रही क़रीब तीस अनाथ और बेसहारा बच्चियों के साथ बलात्कार का आरोप लगा था, जबकि बच्चियों ने कुछ साथियों की हत्या का आरोप भी लगाया था.

जिन लोगों पर मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह कांड में शामिल होने का शक था, बच्चियों को उनकी तस्वीर दिखाकर उनकी पहचान कराने की मांग भी उठी थी.

मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह कांड को लेकर उस वक़्त बिहार सरकार में बाल कल्याण मंत्री रहीं मंजू वर्मा और उनके पति पर आरोप लगे थे. लेकिन सरकार ने उनका इस्तीफ़ा नहीं लिया था.

मंजू वर्मा ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा, "मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह को लेकर सीबीआई ने कभी हमें न तो कई समन भेजा और न कभी कोई पूछताछ हुई है. इसके अलावा मैं इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोलना चाहती. आप पत्रकार हैं, ख़ुद पता कर सकते हैं."

हालांकि इसी दौरान सीबीआई ने बिहार के बेगुसराय के चेरिया बरियारपुर में मंजू वर्मा के घर की तलाशी ली थी. वहां सीबीआई को 50 ज़िंदा कारतूस मिले थे. इस मामले में मंजू वर्मा और उनके पति को जेल भी जाना पड़ा था. जेल जाने के बाद उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफ़ा दिया था.

मंजू वर्मा दावा कहती रही हैं कि गांव का उनका घर सम्मिलित परिवार का घर है, जिसमें कई लोग रहते हैं और वहां मिले ज़िंदा कारतूस से उनका कोई लेना देना नहीं है.

फ़िलहाल मंजू वर्मा और उनके पति ज़मानत पर बाहर हैं. मंजू वर्मा को जनता दल-यू ने साल 2020 के विधानसभा चुनाव में टिकट भी दिया था लेकिन वो चुनाव हार गईं थीं.

बाल कल्याण विभाग के निदेशक प्रशांत कुमार सीएच के मुताबिक़, "इस मामले में कुछ लोगों को सज़ा हुई है और सीबीआई ने अपनी जांच में कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई के लिए लिखा है, हमने सीबीआई की रिपोर्ट अपने सामान्य प्रशासन विभाग को भेज दी है."

प्रशांत कुमार के मुताबिक़ जब तक किसी सरकारी कर्मचारी पर कार्रवाई न हो जाए, तब तक किसी का नाम लेना उचित नहीं है.

निवेदिता झा कहती हैं कि इस मामले में कई लोगों पर गंभीर आरोप लगे थे लेकिन उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई.

उनका कहना है, "उस वक़्त बच्चियां एक मूंछ वाले अंकल की बात करती थीं, उनकी पहचान तक नहीं हुई. सीबीआई तो शुरू में बच्चियों के बयान को भी जांच में शामिल नहीं कर रही थी. बाद में सुप्रीम कोर्ट के दख़ल के बाद यह हो पाया था."

बालिका गृह के मामले पर निवेदिता झा की तरफ़ से फ़ौज़िया शकील सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ चुकी हैं. उनका कहना है कि उम्र क़ैद की सज़ा के ख़िलाफ़ सभी 14 दोषियों ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की है और यह मामला अभी अदालत में विचाराधीन है.

किसे-किसे हुई सज़ा?

दिल्ली के साकेत कोर्ट की विशेष पोक्सो अदालत ने इस मामले में कुल 19 लोगों को दोषी क़रार देते हुए सज़ा सुनाई थी. दस दोषियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई जबकि बाकी दोषियों को 6 महीने से लेकर दस साल तक की सज़ा सुनाई गई.

एनजीओ सेवा संकल्प एवं विकास समिति के मालिक ब्रजेश ठाकुर को आजीवन कारावास के अलावा 32.20 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था.

मुज़फ़्फ़रपुर के बाल सुरक्षा अधिकारी रवि कुमार रोशन को भी आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी. बाल कल्याण समिति मुज़फ़्फ़रपुर के सदस्य विकास कुमार को भी आजीवन कारावास की सज़ा दी गई और 14.50 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया. जबकि बाल कल्याण समिति के तत्कालीन अध्यक्ष दिलीप कुमार वर्मा को भी आजीवन कारावास की सज़ा हुई.

लड़कियों के लिए बाल गृह की अधीक्षक इंदू कुमारी को तीन साल की सज़ा दी गई. बाल गृह की काउंसलर मंजू देवी को आजीवन कारावास की सज़ा हुई. इसके अलावा ब्रजेश ठाकुर के कई कर्मचारियों को भी सज़ा सुनाई गई है.

पांच साल पहले

"पांच साल हो गए और हम आज भी अपने मुहल्ले पर लगे दाग़ को मिटाने की कोशिश कर रहे हैं. हमें कभी शक भी नहीं हुआ था कि यहां क्या हो रहा है. गाड़ी का शीशा बंद हो तो गेट के बाहर भी कोई आवाज़ नहीं आती. यह तो छत पर चल रहा था, खिड़कियां दरवाज़े सब बंद होते थे."

यह बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के वार्ड नंबर 22 के एक निवासी का दर्द है. यह वही मुहल्ला है जहां पांच साल पहले खिड़कियों और दरवाज़ों से जब पर्दा उठा तो इसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था.

मुज़फ़्फ़रपुर के साहु रोड पर एक मकान की दूसरी मंज़िल पर चल रहे सरकारी बालिका गृह में कई लड़कियों के साथ बलात्कार और शारीरिक शोषण हो रहा था.

बालिका गृह में बच्चियों के साथ हुई घटना की जानकारी बाहर आने के बाद इसे बंद कर दिया गया. इस मामले में बालिका गृह के संचालक ब्रजेश ठाकुर समेत दस से ज़्यादा लोगों को साल 2020 में दिल्ली की एक अदालत ने उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई थी.

जबकि कुछ अन्य लोगों को भी इसमें क़सूरवार ठहराकर सज़ा दी गई थी, लेकिन आरोपों में घिरे कई सरकारी कर्मचरियों और रसूख़दार लोगों पर कार्रवाई का अब भी इंतज़ार है.

साल 2018 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़ ने बिहार के शेल्टर होम को लेकर एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी. यह रिपोर्ट शेल्टर होम चलाने वालों, सरकार और वहां रह रही बच्चियों से बातचीत के आधार पर तैयार की गई थी.

इस रिपोर्ट में मुज़फ़्फ़रपुर के बालिका गृह पर गंभीर आरोप लगाए गए थे, जिसमें वहां रह रही अनाथ और बेसहारा बच्चियों के साथ बलात्कार, मारपीट और मानसिक तौर पर प्रताड़ित करना भी शामिल था.

इसी रिपोर्ट के आधार पर 31 मई 2018 में एफ़आईआर दर्ज कर कई लोगों को गिरफ़्तार किया गया था, जिसमें बालिका गृह का संचालन कर रहे ब्रजेश ठाकुर का नाम भी शामिल है. हालांकि इसके संचालन के लिए राज्य सरकार की तरफ़ से बड़ी आर्थिक मदद दी जाती थी.

शेल्टर होम के पास क़रीब 20 साल से पान की दुकान चलाने वाले मोहम्मद निज़ाम कहते हैं कि जब यह मामला ख़बरों में आया था, तब काफ़ी हंगामा मचा था.

मोहम्मद निज़ाम याद करते हैं, "उस समय कई तरह की अफ़वाहें भी थीं. लड़कियां कहती थीं कि इस जगह किसी को मारकर गाड़ा है तो वहां की खुदाई होती थी, फिर कहती थीं कि श्मशान में फेंक दिया तो वहां जांच होती थी. फिर वो कहती थीं कि मारकर तालाब में फेंक दिया."

मोहम्मद निज़ाम के मुताबिक़ ब्रजेश ठाकुर का अख़बार कई सरकारी दफ़्तरों में जाता था. उनके पास प्रशासन और राजनीति से जुड़े लोग भी खूब आते थे.

इसी वार्ड के वार्ड प्रतिनिधि संजीव गुप्ता ने बीबीसी को बताया, "यह एक घनी आबादी वाला इलाक़ा है लेकिन हमें कभी यह भी नहीं पता चला कि यहां कितनी बच्चियां हैं. यहां जो कुछ हो रहा था, उसकी ख़बर हमारे लिए हैरान करने वाली थी."

यहीं मौजूद एक व्यक्ति का कहना है, "माल महाराज का और मिर्ज़ा खेले होली. जब इस तरह के काम के लिए 90 फ़ीसदी रक़म सरकार देती है तो इसे ऐसे लोगों को सौंपने का क्या मतलब है?"

शेल्टर होम की हालत

मुज़फ़्फ़रपुर के जिस मकान की दूसरी मंज़िल पर यह शेल्टर होम चलता था, वहां अब मलवों के अलावा कुछ भी नज़र नहीं आता. इस फ़्लोर को पूरी तरह तोड़कर ख़त्म कर दिया गया है.

हालांकि यहां एक दीवार पर ब्रजेश ठाकुर के अख़बार 'प्रातः कमल' का एक बोर्ड आज भी लगा है. जबकि दीवार पर लिखे 'बालिका गृह' नाम को मिटा दिया गया है. यहां ग्राउंड फ़्लोर पर एक कमरा है, जिसे सील कर दिया गया है, जो संभवतः बालिका गृह का दफ़्तर रहा होगा.

इसी मकान के बग़ल वाले घर से एक महिला अनिता देवी ने बताया कि यह राजेश कुमार राजू का मकान है. उनके मुताबिक़ वो राजेश कुमार राजू की देखरेख करती हैं. राजेश कुमार राजू क़रीब पांच साल पहले एक सड़क हादसे का शिकार हो गए थे.

राजू को हमारी सूचना देने पर क़रीब 45-50 साल के राजू व्हील चेयर पर बाहर निकले, उस हादसे के बाद चलना फिरना तो दूर वो ठीक से बात भी नहीं कर पाते हैं. उन्होंने केवल इतना बताया कि अपना मकान उन्होंने शेल्टर होम के लिए किराए पर दिया था और इससे ज़्यादा वो कुछ बात नहीं करना चाहते.

मुज़फ़्फ़रपुर के बालिका गृह का संचालन ब्रजेश ठाकुर के ही एक एनजीओ 'सेवा संकल्प एवं विकास समिति' के पास था. हम उसके दफ़्तर पर गए तो वहां भी मकड़ी के जालों के बीच दरवाज़े पर ताला बंद था.

यहां बग़ल के घर से एक युवक ने हमें बताया कि पांच साल पहले पुलिस और प्रशासन के लोग यहां भी जांच के सिलसिले में आते थे. लेकिन उसके बाद से कोई नहीं आया.

घटना का असर

मुज़फ़्फ़रपुर की घटना के बाद बिहार सरकार ने एनजीओ के संचालन में चल रहे ज़्यादातर बालिका गृह को अपने नियंत्रण में ले लिया है. फ़िलहाल राज्य में बच्चियों के लिए 11 ऐसे शेल्टर होम चल रहे हैं, जिनमें तक़रीबन सात सौ बच्चियां रह रही हैं. हालांकि इनकी संख्या कभी निश्चित नहीं होती है.

निवेदिता झा का आरोप है कि बच्चियां जिस माहौल से बचने के लिए शेल्टर होम में रहती हैं, सरकार उन्हें वापस उसी माहौल में भेजने की कोशिश में होती है.

उनका कहना है, "क्या बच्चियों का परिवार उन्हें बेहतर शिक्षा और पालन पोषण कर सकता है, क्या बच्चियों की पढ़ाई-लिखाई और उनके भविष्य को लेकर ऐसे परिवार कुछ कर पाने की स्थिति में हैं?"

"बच्चियों को परिवार में वापस भेजने के पहले इन सब बातों पर ग़ौर करना ज़्यादा ज़रूरी है."

वहीं बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक़ मुज़फ़्फ़रपुर की घटना के बाद वहां की बच्चियों को वापस घर भेजने के बाद भी लंबे समय तक उनकी निगरानी की गई थी.

बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग का दावा है कि अब बालिका गृह की निगरानी के लिए नियमित तौर पर ज़िला निरीक्षण समिति ऐसे केंद्रों पर जाती है. इसके अलावा केंद्र की टीम भी नियमित दौरा करती है.

बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग से जुड़े एक अधिकारी ने बताया है कि सरकार अब अनाथ बच्चों के लिए 'वृहत् आश्रय गृह' की योजना पर भी काम कर रही है.

राज्य में ऐसे 12 आश्रय गृह बन कर तैयार हो चुके हैं और इनमें से दो शुरु हो गए हैं, जबकि बाक़ी 10 इसी साल के अंत तक शुरू होने की संभावना है.

ऐसे हर आश्रय गृह में 100 लड़कों और 100 लड़कियों के रहने की व्यवस्था रखी गई है और इनमें बच्चों को कई तरह की सुविधाएं देने का दावा भी किया जा रहा है.

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