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एक दिन में 87 रेप, भारत में बढ़ रहे हैं बलात्कार के मामले?
- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- भारत में एक दिन में औसतन 87 रेप की घटना होती हैं.
- राजधानी दिल्ली में एक दिन में 5.6 रेप के मामले सामने आते हैं. (स्रोत दिल्ली पुलिस)
- NCRB के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़, पिछले सालों के मुकाबले रेप के मामलों में 13.23 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
- राजस्थान (6342), मध्यप्रदेश(2947), उत्तरप्रदेश (2845) के बाद दिल्ली(1252) में रेप की घटनाएं सबसे ज़्यादा होती हैं.
दिल्ली स्थित स्वयं सेवी संस्था 'परी' में काम कर रही कार्यकर्ता योगिता भयाना बीबीसी से बातचीत में कहती हैं कि ''कोविड के कारण पिछले दो साल लॉकडाउन रहा. इस दौरान रेप के मामले सामने नहीं आए. ये कहा जा सकता है कि घर के बाहर होने वाले रेप के मामले नहीं या कम हुए, लेकिन ऐसे मामले घर की चाहरदीवारी में होते रहे.''
ये संस्था रेप सर्वाइवर के लिए काम करती है.
वो बताती हैं, ''निर्भया मामला सामने आने के बाद लोगों में जागरुकता आई है. इसका नतीजा ये हुआ है कि ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग बढ़ी है, लेकिन अभी भी घर के अंदर होने वाले ऐसे अपराध के मामले सामने नहीं आ रहे हैं.''
उनके अनुसार, '' हेल्पलाइन पर हमारे पास मदद के लिए मामले आते रहते हैं. इनमें से कई मामले गंभीर होते है. निर्भया का मामला सामने आने के बाद लोगों में जो एकजुटता, रोष और संवेदनशीलता देखी गई थी, अब वो ख़त्म हो चुकी है. विडंबना ये है कि निर्भया मामला सामने आने के बाद क़ानून भी सख़्त हुए हैं, लेकिन न्याय लेने की प्रक्रिया अभी भी लंबी है.''
वो सवाल उठाती हैं कि ऐसे मामलों में कितने ही दोषियों को सज़ा मिल पाती है. ऐसे मामले रोकने के लिए सरकारें क्या कर रही हैं?''
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क़ानून में बदलाव
- साल 2012 में हुए निर्भया रेप मामले के बाद क़ानून में बदलाव किए गए. आपराधिक क़ानून (संशोधन) अधिनियम 2013 में रेप की परिभाषा को विस्तृत किया गया.
- रेप की धमकी देने को अपराध बताया गया और अगर ऐसा करता कोई व्यक्ति पाया जाता है तो उसके लिए सज़ा का प्रावधान किया गया है.
- बढ़ते रेप के मामलों को देखते हुए न्यूनतम सज़ा को सात साल से बढ़ाकर 10 साल कर दिया गया है.
- अगर मामले में पीड़िता की मौत हो जाती है या उनका शरीर वेजीटेटीव स्टेट यानी निष्क्रिय स्थिति में चला जाता है तो उसके लिए अधिकतम सज़ा को बढ़ाकर 20 साल कर दिया गया है. इसके अलावा मौत की सज़ा का भी प्रावधान किया गया है
- अगर कोई बच्चा जो 16 साल की उम्र पूरी कर चुका हो या उससे ज़्यादा उम्र का हो और उस पर ऐसे जघन्य अपराध का आरोप लगता है तो जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड से ऐसे बच्चे का मानसिक और शारीरिक आकलन करवाया जा सकता है और उसके आधार पर भारतीय दंड संहिता में सज़ा का प्रावधान किया गया है.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो या एनसीआरबी के पूर्व निदेशक शारदा प्रसाद तीन राज्यों राजस्थान, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में रेप के मामलों में बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण समाज में सामंती विचारधारा का होना बताते हैं.
वो बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, ''जब ऐसे मामले आते हैं तो इनकी चार्जशीट कम दर्ज होती है. इसके बाद अगर ये मामले दर्ज होकर कोर्ट पहुंचते हैं तो उनमें से दो तिहाई मामलों में लोग छूट जाते हैं और केवल एक तिहाई में सज़ा होती है.
ऐसे में संदेश ये जाता है कि अपराध अगर किया भी गया तो सज़ा से बचा जा सकता है. ऐसे में अपराध करने वालों में ये भावना प्रबल हो जाती है कि ऐसा करने में कोई ख़तरा नहीं है.''
जानकारों का कहना है कि समाज में रेप के मामलों को अभी भी शर्म और इ़ज़्ज़त से जोड़ कर देखा जाता है, लेकिन अब कुछ लोग आगे आकर इसकी रिपोर्ट दर्ज करा रहे हैं. साथ ही वे मानते है कि पुलिस को और प्रभावी और संवेदनशील होने की ज़रूरत है.
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राजस्थान
राजस्थान में एडीजी क्राइम, रवि प्रकाश मेहरडा इस बात से इनकार करते हैं कि राज्य में रेप के मामले ज़्यादा होते हैं.
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं कि साल 2019 के बाद राज्य में हर अपराध की एफ़आईआर दर्ज करना अनिवार्य किया गया है. अगर ऐसा करने से एसएचओ इनकार करता है तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाती है. ऐसे में मामलों में वृद्धि का ये एक कारण हो सकता है.
वे कहते हैं कि ऐसे मामलों के साथ स्टिग्मा या कलंक जोड़ दिया जाता था और लड़कियों को ग़लती का एहसास कराया जाता था, वो अब बहुत कम हुआ है. महिलाएं और लड़कियां अब हिचकती नहीं हैं और सरकार के इस क़दम ने उन्हें ज़्यादा सशक्त किया है. वहीं शिक्षा ने भी एक भूमिका निभाई है और अब वे आगे आकर ऐसे मामले दर्ज करा रही हैं.
रवि प्रकाश मेहरडा कहते हैं, ''राजस्थान में ऐसे मामलों का आंकड़ा इसलिए भी बढ़ रहा क्योंकि 498ए के मामले में धारा 376 और 377 जोड़ दी जाती है ताकि मामलों को गैर ज़मानती बनाया जा सके क्योंकि ये मामले भी रेप की परिधि में आ जाते हैं.''
किसी महिला को उसके पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता की स्थिति से बचाने के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए में सज़ा का प्रावधान किया गया है.
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मध्यप्रदेश
मध्य प्रदेश में अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति में कार्यकर्ता संध्या शैली का कहना है कि राज्य में पिछले कुछ सालों से ये देखा जा रहा है कि यहां पितृसत्तात्मक सोच बढ़ी है. वहीं कोर्ट में भी कुछ एक मामलों में न्यायाधीश ने लड़की को अभियुक्त को राखी बांधने को कहा है.
ऐसे में राज्य में लड़कियों के लिए एक असुरक्षित माहौल बनता है.
उनका कहना है, ''ये देखा जा रहा है कि राज्य के दो क्षेत्रों मालवा और महाकौशल में ड्रग्स का इस्तेमाल बढ़ा है और देखा जा रहा है कि रेप के मामले भी सामने आ रहे हैं. रेप के मामलों के केस कम दर्ज हो रहे हैं, अगर पूरी रिपोर्टिंग होगी तो आंकड़े बढ़े हुए आएंगे.''
साथ ही वो कहती हैं कि पुलिस को और मुस्तैद होने की ज़रूरत है.
वहीं एनसीआरबी के आंकड़ों को देखें तो कुछ राज्य और केंद्रशासित प्रदेश ऐसे भी हैं जहां रेप के मामले 10 से भी कम हैं.
इसका विश्लेषण करते हुए शारदा प्रसाद कहते हैं, ''नागालैंड, पुदुच्चेरी और लक्षद्वीप ऐसे प्रदेश हैं जहां का समाजिक ताना-बाना कुछ ऐसा है कि वहां का समाज महिलाओं के प्रति अपराध को स्वीकार नहीं करता.
ऐसे में अगर कोई व्यक्ति इस तरह का अपराध करता है तो समाज उसे सज़ा भी देता है. इन इलाकों में समाज एक बड़ी भूमिका अदा करता है और उसका अपना महत्व है.''
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