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ब्रजेश ठाकुर: हाथों में हथकड़ी, चेहरे पर हँसी, इतनी हिम्मत आती कहाँ से है?
- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
इतनी हिम्मत आती कहाँ से है? इस सवाल के जवाब के लिए ब्रजेश ठाकुर की बेटी का यह बयान पढ़िए, "बिलीव मी, मेरे पापा के पास बहुत पैसा है. अगर उन्हें लड़कियाँ सप्लाई करनी होती तो बालिका गृह की लड़कियाँ नहीं सप्लाई करते."
मुज़फ्फ़रपुर के बालिका गृह में रहने वाली 28 बच्चियों के साथ बलात्कार और प्रताड़ना के मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर की जो तस्वीर हाथों में हथकड़ी और चेहरे पर हंसी लिए सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, उसको निकिता आनंद के इस जवाब से समझा जा सकता है.
बेटी ने ठीक ही बताया है कि ब्रजेश ठाकुर के पास बहुत प्रॉपर्टी है.
ब्रजेश ठाकुर के पास आखिर ये संपत्ति आई कहाँ से? इसका जवाब जानने के लिए थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं.
पैसा, पावर और प्रोपर्टी
मुज़फ्फ़रपुर एक समय ऐसा शहर था, जहाँ से सबसे अधिक अख़बार निकलते थे. उसमें एक व्यक्ति के नाम पर अकेले 22 अख़बार रजिस्टर्ड थे. और उस व्यक्ति का नाम था राधामोहन ठाकुर यानी ब्रजेश ठाकुर के पिता.
अख़बार निकालने के धंधे में ग़लत ढंग से कमाई का एक ख़ास पैर्टन है, सबसे पहले तो अख़बार का सर्कुलेशन बढ़ाकर बताना और बहुत कम प्रतियाँ छापना, फिर रियायती दाम पर अख़बार छापने के लिए मिले काग़ज़ को बाज़ार में बेच देना. साथ ही, नेताओं और अधिकारियों से सांठ-गांठ करके सरकारी विज्ञापन हासिल करना इसका एक अहम हिस्सा होता है.
राधामोहन ठाकुर ने 1982 में 'प्रात:कमल' अखबार का प्रकाशन शुरू किया था. अब भी यह अखबार छपता है लेकिन अब राधामोहन ठाकुर नहीं हैं. मरने से पहले सब कुछ ब्रजेश ठाकुर को सौंप गए.
आज जितना पैसा, पावर और प्रॉपर्टी ब्रजेश ठाकुर के पास है वो सब उसके पिता का दिया हुआ है. अखबार तो था ही, रियल एस्टेट में भी काफी सारा पैसा लगा था.
एनजीओ का 'व्यवसाय'
ढेर सारे अख़बारों और ज़मीन-ज़ायदाद से तो कमाई हो ही रही थी, साथ ही कमाई के एक नए क्षेत्र में ठाकुर ने क़दम रखा जो वर्षों तक सरकारी प्रश्रय में चलता रहा और आज भंडाफोड़ के बाद तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं.
ऐसी भी ख़बरें आईं थीं कि बिहार में जब रियल एस्टेट का कारोबार पटना के बाद मुज़फ़्फ़रपुर में शुरू हुआ, यानी जब अपार्टमेंट और शॉपिंग मॉल बनने लगे तो ब्रजेश ठाकुर ने अखबार के रसूख का इस्तेमाल करके रियल एस्टेट के कारोबार से बहुत पैसा कमाया.
साल 1987 में ब्रजेश ठाकुर ने अपना ध्यान रियल एस्टेट से हटाकर एनजीओ के 'व्यवसाय' में लगाया. एनजीओ सेवा संकल्प एवं विकास समिति के नाम से पहली बार ठाकुर ने 1987 में एक एनजीओ की स्थापना की.
2013 में इसी एनजीओ को बालिका गृहों के रखरखाव की जिम्मेदारी मिली थी. अभी भी ठाकुर और उनके परिवार के सदस्यों के नाम पर कुल 11 एनजीओ रजिस्टर्ड हैं.|
पत्रकारिता का खेल
जो अख़बार कहीं दिखाई नहीं देता उसका सर्कुलेशन बिहार सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के अनुसार 60 हज़ार से ऊपर है और प्रात: कमल को हर साल 30 लाख रुपए का सरकारी विज्ञापन मिलता है.
इस बीच, राज्य सरकार ने ब्रजेश ठाकुर के तीनों अख़बारों की मान्यता रद्द कर दी है.
राज्य सरकार ने तो ठाकुर को मान्यता प्राप्त पत्रकार का दर्जा बहुत पहले ही दे दिया था, बाद में उनकी बेटी निकिता आनंद और बेटे राहुल आनंद को भी राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार का तमगा मिल गया.
बिहार में पत्रकारों को मान्यता देने वाली एजेंसी यानी प्रेस एक्रेडिटेशन कमिटी में भी ब्रजेश ठाकुर का सिक्का चलता था. वे कमिटी के मेंबर थे और बिहार में किसे सरकारी मान्यता मिलेगी और किसे नहीं, यह उनके हाथ में होने की वजह से वह मीडिया को प्रभावित करने की स्थिति में थे.
ब्रजेश ठाकुर के अखबार में ऐसा छपता क्या था जो उस पर बिहार सरकार का सूचना एवं जनसंपर्क विभाग इतना मेहरबान हो गया?
अगर पिछले महीने भर का अख़बार पलट कर देखें तो मालूम होता है कि हर एडिशन में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान सुर्खियों में शामिल होते हैं, सरकारी विज्ञापन तो होते ही हैं.
इसे समझने से पहले हमें उनके पारिवारिक संबंधों पर नजर डालनी होगी. जिस व्यक्ति पर आज 28 बच्चियों ने दुष्कर्म करने और करवाने के आरोप लगाए हैं, उनके घर बड़े-बड़े अधिकारियों और नेताओं का आना-जाना था.
हालांकि अब सभी अधिकारी और नेता बयान दे रहे हैं कि वे ब्रजेश ठाकुर को नहीं जानते थे और उनके साथ पारिवारिक संबंध नहीं थे. लेकिन तस्वीरें कुछ अलग ही कहानी बयान करती हैं.
बिहार राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा दिलमणि मिश्रा ब्रजेश ठाकुर के साथ संबंधों को सिरे से नकार देती हैं और कहती हैं कि, "ब्रजेश ठाकुर से मेरा कोई संबंध नहीं है. मेरे ससुर कैलाशपति मिश्रा की पुण्यतिथि पर बालिका गृह आने के लिए उन्होंने रिक्वेस्ट किया था. तब मैं वहां गई थी."
लेकिन ब्रजेश ठाकुर की बेटी निकिता आनंद ने हमें जो तस्वीरें दिखाई उसमें दिलमणि मिश्रा ब्रजेश के परिवार के साथ दिखीं.
जहां तक नेताओं के साथ संबंधों की बात है तो ब्रजेश ठाकुर ने राजनीति में भी हाथ आजमाया है, दबंग भूमिहार जाति से आने वाले ठाकुर के कई नेताओं के साथ भी घनिष्ठ संबंध थे.
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चुनावों में हार
दो बार 1995 और 2000 में कुढ़नी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने वाले ब्रजेश की पैठ राजनीतिक गलियारे में बहुत गहरे तक थी. आनंद मोहन की बिहार पीपल्स पार्टी के उम्मीदवार रहे ब्रजेश, हालांकि दोनों बार चुनाव हार गए थे.
बाद में आनंद मोहन ने अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर लिया और इसके बाद ब्रजेश कभी चुनाव नहीं लड़े.
हिंदी अखबार छाप कर मिली अपार सफलता के बाद ब्रजेश ठाकुर ने 2012 में अंग्रेजी अखबार 'न्यूज़ नेक्स्ट' का प्रकाशन शुरू किया और 2013 में उर्दू अख़बार 'हालात-ए-बिहार' शुरू कर दिया.
इस तरह बिहार सरकार से मान्यता प्राप्त तीनों भाषाओं हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में ब्रजेश ठाकुर का अखबार छपने लगा, और तीनों को सरकारी विज्ञापन मिलने लगे.
ब्रजेश ठाकुर की कहानी तब तक अधूरी है जब तक उसमें मधु कुमारी को न शामिल कर लिया जाए क्योंकि मधु वो महिला हैं जो ब्रजेश के एनजीओ सेवा संकल्प एवं विकास समिति की चार प्रोमोटरों में से एक हैं और उनके उर्दू अखबार 'हालात-ए-बिहार' की संपादक भी हैं.
मधु को बिहार सरकार ने शाहिस्ता परवीन के नाम से राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार का दर्जा दिया है.
मधु के बारे में बस इतना बता दें कि वो मुजफ्फरपुर के रेडलाइट एरिया चतुर्भुज स्थान से हैं, जहां ब्रजेश ठाकुर ने एक अनाथालय (अल्पावास गृह) खोल रखा है और उसके संचालन का जिम्मा मधु को दे रखा है. फिलहाल मधु फरार हैं और सीबीआई उनकी खोज में लगी है.
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