दिल्ली के जंतर मंतर पर पहलवानों के समर्थन में जुटे किसानों का एलान, 'फ़सल बचाई, अब नस्ल बचाएंगे'

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- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
कुरुक्षेत्र में हुए महाभारत युद्ध की पौराणिक कथा रविवार को जंतर मंतर पर बार-बार दुहराई जाती रही.
खाप नेताओं के भाषणों में, युवा कार्यकर्ताओं की आपसी चर्चा में और महिला पहलवानों के समर्थन में, देश के कई सूबों से दिल्ली पहुंचे महिला और पुरुष किसानों की मीडिया से बातचीत में.
"कुरुक्षेत्र की लड़ाई उनके ख़िलाफ़ लड़ी गई थी जिन्होंने एक महिला के सम्मान को ठेस पहुंचाई थी, आज हमारे बेटियों के सम्मान को ठेस पहुंचाई गई है, उनके सम्मान को जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में मेडल जीतकर भारत का गौरव विश्व भर में ऊंचा किया"
ये बात हरियाणा के सोनीपत से आए एक किसान ने हमसे बात करते हुए कही.
किसानों ये एलान भी किया, 'हमने पहले फ़सल बचाई, अब नस्ल बचाएंगे.' इस नारे को किसान आंदोलन से जोड़कर देखा जा रहा है.
पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश की किसान यूनियनों से लेकर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले), मज़दूर संगठन, महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले समूह और कांग्रेस पार्टी नेता राज बब्बर सब यहां पिछले दो हफ़्तों से यौन शोषण मामले पर कार्रवाई न होने के ख़िलाफ़ धरने पर बैठी महिला पहलवानों के समर्थन में पहुंचे थे.
पिछले तीन महीनों में महिला पहलवानों का, जिसमें साक्षी मलिक, विनेश फोगाट और उनके समर्थन में उतरे बजरंग पुनिया भी शामिल हैं, ये दूसरा धरना है.
पहले धरने के बाद सरकार ने एक जांच समिति का गठन किया था लेकिन बात फिर आगे नहीं बढ़ी और पहलवान 23 अप्रैल से फिर से धरने पर हैं. इस बार सुप्रीम कोर्ट के दख़ल के बाद दिल्ली पुलिस ने एफ़आईआर तो दर्ज कर ली है लेकिन अब तक अभियुक्त बृज भूषण सिंह को गिरफ़्तार नहीं किया गया है जिसकी मांग एथलीट कर रहे हैं.
बृजभूषण शरण सिंह ने अपने बचाव में कहा है कि हरियाणा की लॉबी राजनीतिक कारणों से उनके ख़िलाफ़ मुहिम चला रही है.
हालांकि पिछली दफ़ा जब महिला पहलवान धरने पर बैठी थीं तो उन्होंने किसी भी राजनीतिक दल को मंच शेयर नहीं करने दिया था.

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जंतर मंतर पर किसान संगठन खाप पंचायतें
दो दिनों पहले किसान संगठनों ने एलान किया कि वो महिला पहलवानों के धरने को समर्थन देंगे और अपने हजारों समर्थकों के साथ जंतर मंतर पहुंचेंगे. लेकिन दो साल पहले हुए किसान आंदोलन की तरह दिल्ली पुलिस ने बहुत सारे किसानों को पंजाब-हरियाणा-दिल्ली बॉर्डर और दूसरों को उत्तर प्रदेश-दिल्ली बॉर्डर पर रोक दिया.
मगर पुलिस नाकेबंदी के बावजूद किसान बड़ी तादाद में सुबह के दस बजे तक जमा हो गए थे जिसके बाद वहां भाषण हुए, नारे लगे, और आगे की योजना तैयार हुई.
हरियाणा के सोनीपत से धरना स्थल पहुंचे छत्तर सिंह जारी ने कहा कि आज तो वो दस-पंद्रह लोगों के साथ आए हैं लेकिन चंद दिनों बाद वो 'फिर आएंगे और इस बार साथियों की संख्या अधिक होगी.'
सोनीपत से ही आए बुज़ुर्ग किसान ओम प्रकाश से हमने पूछा कि यौन शोषण का ये मामला अगर हरियाणा की महिलाओं का नहीं होता तब भी क्या वो उनके समर्थन में उतरते? जवाब में ओम प्रकाश ने कहा, "आते, ख़ूब आते, बेटी, ऐसा है तुम्हारी है तब भी वो सबकी है."
राकेश टिकैत से ये सवाल किसी महिला पत्रकार ने दूसरे ढंग से पूछा कि आप लोग गुजारत दंगों की दौरान बलात्कार का शिकार हुए बिलक़िस बानो के साथ क्यों नहीं खड़े हुए तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नेता के पास बस इतना जवाब था, "हम उनके साथ भी हैं."
बिलक़िस बानो के मामले में दोषी ग्यारह लोगों को सरकार ने हाल में रिहा कर दिया है जिस मामले की फिलहाल सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है.

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'न्याय मिलने तक जारी रहेगी लड़ाई'
दो दिनों के ठंडे मौसम और हल्की बारिश के बाद गर्म होते मौसम के कारण भाषण देने वालों से लेकर भाषण सुनने वाले और मीडियाकर्मी सब बार-बार पसीना पोंछ रहे थे लेकिन माहौल में मौजूद अलग-अलग रंग थकान को शरीर पर हावी न होने दे रहे थे.
नीम, बड़ और दूसरे बड़े-बड़े पेड़ों के बीच हरे, पीले और लाल रंग की लोगों के सरों पर घूमती टोपियां, पगड़ियां और महिलाओं के गले में पड़े दुपट्टे.
सरकार को अगर किसी तरह से लग रहा था कि अपनी ओर से ख़ामोशी बनाए रहने से धरना ख़ुद से धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा तो ऐसा लगा नहीं और इस समय ये धरना दो साल पहले के किसान आंदोलन की शक्ल अख़्तियार करता दिख रहा है.
जींद से आईं एक महिला का कहना था, 'हमारी ये लड़ाई तबतक जारी रहेगी जबतक हमारी बहनों-बेटियों को न्याय नहीं मिल जाता.'
सीपीएम (माले) के जनरल सेक्रेटरी दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि महिला पहलवानों के समर्थन में शनिवार को बिहार और झारखंड के कई जगहों पर विरोध-प्रदर्शन हुए.
जय जवान, जय किसान का नारा तो लंबे समय से दोहराया जाता रहा है लेकिन 'जय जवान, जय किसान' के साथ आज 'जय पहलवान' को भी जोड़ दिया गया है.
किसानों से जोड़कर एक और नारा भी जंतर मंतर पर सुनने को मिला, 'फ़सल को बचाया है, नस्ल को बचाना है.'

21 मई तक का दिया समय
खुश्क़ होते गले को तर करने के लिए वहां मौजूद कार्यकर्ता बिसलरी की छोटी बोतलें भी लोगों में बांट रहे थे. दिन में भोजन का भी प्रबंध था.
इन सबको देखकर एकबारगी 2020-2021 का किसान आंदोलन याद आ गया जो लगभग चौदह माह तक चला और कड़कड़ाती सर्दी में शुरुआत के बावजूद लोगों के रहने और खाने का इंतज़ाम लगातार जारी रहा.
किसान नेता राकेश टिकैट ने कहा भी, 'हमें तो चौदह माह आंदोलन का अभ्यास है, ये लड़ाई भी लंबी चलेगी.'
एक किसान नेता ने भाषण के दौरान तंज़ भी किया कि 'पुलिस को पहलवानों के लिए लाया जाने वाला गद्दा दिखता है, लेकिन दुश्मन तीन सौ किलो आरडीएक्स लेकर घुस जाता है लेकिन हमारी सुरक्षा एजेंसियों को कानों कान ख़बर नहीं होती.'
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पुलवामा में हुए धमाके में अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ के चालीस जवानों की मौत हो गई थी.
राकेश टिकैत और दूसरे कई नेताओं और खाप पंचायतों ने दोपहर बाद जंतर मंतर पर ही मौजूद जनता दल यूनाइटेड के कार्यालय के प्रांगण में एक बैठक की जिसमें फ़ैसला लिया गया है कि खाप हर दिन एक समूह को धरने पर बैठी महिला पहलवानों के समर्थन में जंतर मंतर भेजेगा, जो शाम को वापस चला जाएगा.
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को खाप ने 21 मई तक का समय दिया है कि वो इस मामले में उचित निर्णय ले.
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खाप के बाद मीडिया को ब्रीफ करते हुए एक किसान नेता ने कहा, "अगर ऐसा नहीं होता है तो हम फिर बैठक करके आगे के रास्ते पर चर्चा करेंगे, फिलहाल संघर्ष की कमान पहलवानों के हाथ में ही रहेगी."
सोनीपत के आए किसान विकास ने हमसे कहा, "महाभारत में कुरुक्षेत्र की लड़ाई महिला के सम्मान के लिए हुई थी, रामायण में भी सवाल मूलत: एक महिला के सम्मान और आदर-अनादर से ही जुड़ा था, कौरवों की सेना के ख़िलाफ़ लड़ाई होगी."
बात करते समय उन किसान के सामने वो पोस्टर दिख रहा था जिस पर लिखा था 'बेटी बचाओ, कुश्ती बचाओ, बृजभूषण को भगाओ.'
भाषण में कई नेताओं ने महिला पहलवानों को बदनाम किए जाने का मुद्दा भी उठाया जिसमें उनपर राजनीति से लेकर, ट्रेनिंग और कम्पटीशन से भागने का आरोप लगा है.
उनका कहना था कि किसान आंदोलन पर भी खालिस्तान मूवमेंट का फ्रंट और राजनीतिक होने का लेबल चिपकाने की कोशिश हुई थी लेकिन आख़िरकार सच सामने आ गया और सरकार को तीनों किसान विरोधी क़ानून वापस लेने पड़े.
जिस समय खाप पंचायत की बैठक चल रही थी और हम वहां बैठे उसके ख़त्म होने का इंतज़ार कर रहे थे.

क्या खाप पंचायतों का प्रभाव बढ़ा है?
धरना स्थल पर मौजूद हरियाणा के हिसार के एक युवक जो दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के छात्र हैं कहने लगे, 'देखिए पिछले लगभग दशक भर में युवाओं में खाप जैसी संस्था का प्रभाव कम हो रहा था लेकिन इसी बीच किसान आंदोलन हुआ और खाप ने इसका समर्थन किया और अब महिला पहलवानों का मामला है.'
वो कहते हैं कि 'संविधान में यक़ीन जगाना होगा.' धरना स्थल पर पोस्टर लगा है, 'सरकार बताए बलात्कार के लिए किसी की गिरफ़्तारी न होगी?'
हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे इलाक़ों में महिलाओं की पिछड़ी सामाजिक स्थिति का आरोप खाप पंचायतों पर लगता रहा है जिनकी सोच को बेहद दकियानूसी और महिला-विरोधी बताया जाता रहा है.
आज खाप पंचायतें महिला पहलवानों के पक्ष में खड़ी हैं और उनके साथ खड़े हैं बेहद प्रगतिशील माने जाने वाले दीपांकर भट्टाचार्य जैसे नेता और महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले दर्जनों संगठन.
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