यूपी एटीएस की 20 ज़िलों में कार्रवाई, दो गिरफ़्तार, लखनऊ के एक वकील को लेकर क्यों है चर्चा

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उत्तर प्रदेश की एंटी टेररिस्ट स्क्वायड (एटीएस) ने रविवार को पूरे राज्य में एक बड़ी कार्रवाई करते हुए प्रतिबंधित संगठन पीएफ़आई से जुड़े होने के संदेह पर 70 व्यक्तियों को थाने लाकर पूछताछ की. एटीएस ने दो इनामी अभियुक्तों को गिरफ़्तार भी किया है.
उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक प्रेस बयान में जानकारी दी है कि एटीएस ने रविवार को एक दिन के 'विशेष गोपनीय अभियान में' 20 ज़िलों में कार्रवाई की.
बयान के मुताबिक एटीएस ने छापेमारी के लिए 30 विशेष टीमों का गठन किया था.
बयान में बताया गया है कि एटीएस ने 50 हज़ार रुपये के इनामी दो अभियुक्तों परवेज अहमद और रईस अहमद को गिरफ़्तार किया है. इन्हें वाराणसी से गिरफ़्तार किया गया है.

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मोहम्मद शोएब के ख़िलाफ़ एटीएस की कार्रवाई?
पुलिस के मुताबिक एटीएस ने उत्तर प्रदेश के अलग अलग ज़िलों में पीएफ़आई से जुड़े रहे 211 संदिग्ध लोगों की पहचान की थी. इनमें से 70 लोगों को पूछताछ के लिए एटीएस यूनिट और थानों पर लाया गया है.
पुलिस के मुताबिक़, एटीएस ने जिन 20 ज़िलों से लोगों को पूछताछ के लिए उठाया है, उनमें शामली में 11, ग़ाजियाबाद में 10, लखनऊ में नौ और वाराणसी में आठ लोग शामिल हैं.
इस बीच, सामाजिक कार्यकर्ता और वकील मोहम्मद शोएब की पत्नी मलका बी ने लखनऊ के अमीनाबाद पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत दी है और बताया है कि उनके पति को पुलिस की एक टीम पूछताछ के लिए ले गई है.
पुलिस ने बीबीसी संवाददाता अनंत झणाणें को बताया है कि एटीएस टीम लखनऊ में नौ लोगों को पूछताछ के लिए ले गई है लेकिन पुलिस ने इस बात की पुष्टि नहीं की है कि मोहम्मद शोएब को भी एटीएस की टीम ले गई है.
मोहम्मद शोएब 'रिहाई मंच' नाम के संगठन के अध्यक्ष हैं. रिहाई मंच के जनरल सेक्रेट्री राजीव यादव ने दावा किया, "पुलिस ने मोहम्मद शोएब के वकील एबी सोलोमन को अनौपचारिक बातचीत में बताया है कि उन्हें एटीएस टीम अपने साथ ले गई है."
हालांकि, पुलिस के किसी अधिकारी ने उनके दावे की पुष्टि नहीं की है.

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मोहम्मद शोएब की पत्नी ने क्या दी है शिकायत?
मलका बी ने अमीनाबाद पुलिस स्टेशन में दी गई शिकायत में कहा है, "सुबह 7.15 बजे पुलिसकर्मियों का एक समूह आया और उनसे पूछताछ के लिए पुलिस थाना चलने की बात कही."
मलका बी ने कहा कि उनके पति बीते कई सालों से हाई ब्लडप्रेशर के मरीज़ हैं और पिछले छह महीने से बीमार चल रहे हैं. उनकी दवा भी घर पर ही रह गई है और उनकी सेहत को लेकर वो चिंतित हैं.
मोहम्मद शोएब की पत्नी मलका बी ने कहा है कि उनके पति ने कुछ नहीं किया था और वो नहीं जानतीं कि पुलिस उन्हें क्यों लेकर गई है.
मलका बी ने एक वीडियो बयान भी जारी किया है.
इस बयान में मलका बी कहती हैं, "पुलिस वालों ने उनके पति से कहा कि अमीनाबाद पुलिस स्टेशन चलना है और पांच दस मिनट वापस आ जाएंगे."
उन्होंने बताया कि शोएब अपने साथ मोबाइल लेकर गए थे और अब उनका फ़ोन स्विच ऑफ़ आ रहा है.
उन्होंने बताया, 'पुलिस दल में तीन पुलिसकर्मी वर्दी में थे और सात लोग सिविल ड्रेस में थे. शोएब टॉयलेट गए और ब्रश किया, इस दौरान पुलिस वाले जल्दी करने को कहने लगे.'
मलका बी ने मोहम्मद शोएब को ले जाने का सीसीटीवी फुटेज भी दिया है.

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कौन हैं मोहम्मद शोएब?
75 साल के मोहम्मद शोएब 'रिहाई मंच' के संस्थापक अध्यक्ष हैं. संगठन का दावा है कि ग़रीब लोगों को क़ानूनी मदद देने का काम करता है.
इसके अलावा शोएब 'सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया' से भी जुड़े हुए हैं. मैग्सेसे अवॉर्ड विजेता संदीप पांडे भी इस संगठन से जुड़े हैं.
नागरिक संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों के दौरान शोएब को दिसंबर 2019 में गिरफ़्तार किया गया था और 15 जनवरी 2020 को वो ज़मानत पर बाहर आए थे.
रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव ने बीबीसी को बताया, "मोहम्मद शोएब एक जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वो आपातकाल के दौरान भी जेल गए थे. वो लोकतंत्र सेनानी हैं."
उन्होंने कहा, "एक वकील के तौर शोएब ज़रूरतमंदों को क़ानूनी मदद करते हैं और लखनऊ की लोअर कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं. उनकी गिरफ़्तारी नागरिक अधिकारों पर हमला है."
एटीएस ने कहां कहां की कार्रवाई?
पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, एटीएस ने लखनऊ (9), सीतापुर (1) बहराइच (2) बरलामपुर (1) बाराबंकी (3) सिद्धार्थनगर (1) देवरिया (2) वाराणसी (8) आज़मगढ़ (3) कानपुर (2) ग़ाजियाबाद (10) मेरठ (4) बुलंदशहर (1) सहारनपुर (1) शामली (11) मुजफ़्फ़्रनगर (3) मुरादाबाद (1) रामपुर बिजनौर (5) और अमरोहा (1) में कार्रवाई की.
विज्ञप्ति के अनुसार, संदिग्ध व्यक्तियों से पूछताछ जारी है, साथ ही राष्ट्र विरोधी गतिविधियों एवं उनके सोशल मीडिया एक्टिविटीज़ की जानकारी के लिए इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का डेटा विश्लेषण किया जा रहा है.
पुलिस ने कहा है कि पूछताछ और डेटा विश्लेषण के आधार पर अग्रिम क़ानूनी कार्यवाही की जाएगी.

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पीएफ़आई क्या है और इस पर कब लगी पाबंदी
1980 के दशक में उग्र हिंदुत्व का प्रसार और 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद समाजशास्त्री जाविद आलम के शब्दों में 'भारतीय शासन और राजनीति के प्रति मुसलमानों की सोच में' बड़ी तब्दीलियों को जन्म दिया था.
दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुख़ारी की 'आदम सेना' से लेकर, बिहार की 'पसमांदा मुस्लिम महाज़' और मुंबई की 'भारतीय अल्पसंख्यक सुरक्षा महासंघ' तक इसी दौर में वजूद में आए.
केरल में 'नेशनल डेवलेपमेंट फ्रंट' (एनडीएफ़), तमिलनाडु की 'मनिथा निथि पसाराई' और 'कर्नाटक फ़ोरम फ़ॉर डिग्निटी' की स्थापना भी इसी दौर में हुई.
ये तीनों संस्थाएँ हालाँकि स्थापना के कुछ सालों बाद साल 2004 से ही तालमेल करने लगी थीं.
22 नवंबर, 2006 में केरल के कोज़िकोड में हुई एक बैठक में तीनों ने विलय कर 'पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया' (पीएफ़आई) बनाने का फ़ैसला लिया. आधिकारिक तौर पर पीएफ़आई की स्थापना 17 फ़रवरी, 2007 को हुई.
केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक के तीन संगठनों के विलय के दो सालों बाद पश्चिमी भारतीय राज्य गोवा, उत्तर के राजस्थान, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर के पाँच संगठन पीएफ़आई में मिल गए.
ख़ुद को 'भारत का सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले काडर बेस्ड जन-आंदोलन बताने वाला' पीएफ़आई 23 राज्यों में फैले होने और चार लाख सदस्यता का दावा करता था.
केंद्र सरकार ने सितंबर 2022 में पीएफ़आई पर पांच साल के लिए पाबंदी लगाई है.
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