क़ानून मंत्री किरेन रिजिजू के 'एंटी इंडिया गैंग' वाले बयान के विरोध में आए 300 से ज़्यादा वकील- प्रेस रिव्यू

क़ानून मंत्री किरण रिजिजू

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सुप्रीम कोर्ट और कई हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों ने एक साझा बयान जारी कर क़ानून मंत्री किरेन रिजिजू के उस बयान की कड़ी आलोचना की है जिसमें उन्होंने कहा था कि कुछ रिटायर्ड जज "एंटी इंडिया गैंग" का हिस्सा बन गए हैं.

कई अख़बारों ने इस ख़बर को अपने पहले पन्ने पर जगह दी है.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया लिखता है कि 323 वकीलों ने एक साझा बयान में कहा है कि सरकार की आलोचना किसी सूरत में न तो देश की आलोचना होती है और न ही देश विरोधी होती है.

बयान में वकीलों ने कहा कि क़ानून मंत्री रिटार्यड जजों को धमकी दे कर नागरिकों को ये संदेश देना चाहते हैं कि आलोचना की किसी भी आवाज़ को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. उन्होंने क़ानून मंत्री से अपना बयान वापस लेने को कहा है.

अख़बार के अनुसार वकीलों ने साझा बयान में कहा, "हम क़ानून मंत्री के बयान की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं. मंत्री से इस तरह के दादागिरी भरे बयान की उम्मीद नहीं थी.

हम क़ानून मंत्री को ये याद दिलाना चाहते हैं कि न तो सरकार राष्ट्र है और न ही राष्ट्र सरकार है. अपने अनुभव पर आधारित पर दी गई पूर्व जजों और ज़िम्मेदार लोगों की राय भले की सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी को पसंद न आए, लेकिन क़ानून मंत्री को ये अधिकार नहीं कि वो इस पर अपमानजनक टिप्पणी करें."

द हिंदू के मुताबिक़ बयान में वकीलों ने कहा है, "क़ानून और न्याय मंत्री होने के नाते उनका फ़र्ज़ है कि वो न्याय व्यवस्था की, न्यायपालिका और जजों की रक्षा करें. वो किसी रिटायर्ड जज को केवल इसलिए अलग-थलग करें क्योंकि वो उनकी राय से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते और सार्वजनिक तौर पर उनके ख़िलाफ़ क़दम उठाने की धमकी दें, ये उनका कर्तव्य नहीं है."

इसी ख़बर पर हिंदुस्तान टाइम्स ने लिखा कि ये साझा बयान 18 मार्च को दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में किरेन रिजिजू के दिए एक बयान पर आया था.

उन्होंने कहा था, "कुछ रिटायर्ड जज हैं जो एंटी इंडिया ग्रुप का हिस्सा बन गए हैं. ये लोग कोशिश कर रहे हैं भारतीय न्यायपालिका विपक्ष की भूमिका निभाए."

एक सवाल के उत्तर में उन्होंने कहा कि "इसके ख़िलाफ़ एजेंसियां क़ानून के दायरे में रहकर क़दम उठाएंगी. जो लोग देश के ख़िलाफ़ काम करेंगे उन्हें उसकी क़ीमत चुकानी होगी."

रैली में लाउडस्पीकर

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हेट स्पीच मामले कोर्ट की कड़ी राय

हेट स्पीच से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि हेट स्पीच इसलिए होती है क्योंकि "राष्ट्र इस मामले में नपुंसक हो गया है, वो निष्क्रिय भूमिका अपना रहा है और समय पर काम नहीं करता."

कोर्ट ने कहा कि जब तक राजनीति में धर्म का समावेश होता रहेगा, ऐसे नफरती भाषणों पर अंकुश लगाना संभव नहीं होगा.

दिल्ली से छपने वाले कई अख़बारों ने इस ख़बर को अपने पहले पन्ने पर जगह दी है.

इंडियन एक्सप्रेस लिखता है कि जस्टिस केएम जोसेफ़ की अध्यक्षता वाली एक बेंच ने सवाल किया कि "अगर यही सब होना है तो राष्ट्र की ज़रूरत ही क्या है?"

अदालत केरल के एक पत्रकार शाहीन अब्दुल्लाह की एक याचिका की सुनवाई कर रही थी जिसमें उन्होंने महाराष्ट्र पुलिस के ख़िलाफ़ अदालत की अवमानना करने का आरोप लगाया था.

उनका कहना था कि कोर्ट के आदेशों के बावजूद महाराष्ट्र में कुछ हिंदू संगठनों ने रैलियों में भड़काऊ बयान दिए जिसके ख़िलाफ़ पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की.

अख़बार लिखता है कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट की टिप्पणी पर तुरंत प्रतिक्रिया दी और कहा कि ''केंद्र इस मामले में ख़ामोश नहीं है.

लेकिन केरल जैसे राज्यों में पीएफ़आई की रैली में मई 2022 को हिंदुओं और ईसाइयों के ख़िलाफ़ बयान दिए गए थे. पर वहां की सरकार इस मामले में ख़ामोश है. उन्होंने सवाल किया कि अदालत ने उस मामले में स्वत:संज्ञान क्यों नहीं लिया.''

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सॉलिसिटर जनरल ने केरल में हुई पीएफ़आई की रैली का वीडियो चलाने के लिए कोर्ट से इजाज़त मांगी जिसमें एक बच्चा स्लोगन देता दिखता है. कोर्ट ने उसकी इजाज़त नहीं दी.

इसके बाद जस्टिस केएम जोसेफ़ ने कहा कि इसका नाता राजनीति से नहीं बल्कि साफ़ तौर पर धर्म से जुड़ी हेट स्पीच से है.

इसी ख़बर को लेकर टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने एक रिपोर्ट छापी है जिसमें लिखा है, "इसका नाता राजनीति से है, नफ़रत एक तरह की कभी न ख़त्म होने वाली खाई है.

इसे रोकने के लिए सरकार को क़दम उठाना पड़ेगा. अगर राजनीति और धर्म को अलग कर दिया जाएगा तो ये सब रुक जाएगा. हम ये बात आपको कह सकते हैं, आप इसे गंभीरता से लें या न लें ये आपकी मर्ज़ी है."

वहीं जनसत्ता ने अपने संपादकीय में इस मामले का ज़िक्र किया है और लिखा है कि ''ख़ुद सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि अदालतें समय-समय पर हेट स्पीच को लेकर सख़्त संदेश देती रही हैं.

लेकिन राजनीतिक दलों को अदालती आदेशों-निर्देशों की कोई परवाह नहीं है. टीवी चैनलों पर आए दिन राजनीतिक दलों के प्रवक्ता सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले वक्तव्य देते रहते हैं.''

अख़बार आगे लिखता है कि सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी से स्पष्ट है कि इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए सरकारों को संजीदगी दिखाने की ज़रूरत है.

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'दीदी ओ दीदी' कहने पर पीएम के ख़िलाफ़ क्यों नहीं होती कार्रवाई

लोकसभा से राहुल गांधी की सदस्यता रद्द होने के मामले को लेकर तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने प्रधानमंत्री मोदी और पश्चिम बंगाल में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी पर निशाना साधा है.

द टेलीग्राफ़ में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, कोलकाता के शहीद मीनार ग्राउंड में आयोजित एक जनसभा में उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता ने भी राहुल गांधी की तरह के बयान दिए हैं. ऐसे में उन्हें भी उसी तरह की सज़ा क्यों नहीं दी जानी चाहिए जो राहुल गांधी को दी गई है.

उन्होंने कहा कि "जिस तरह एक राजनीतिक टिप्पणी को केंद्र बना कर, ताक़त के इस्तेमाल कर उन्हें सज़ा दी गई हम उसका विरोध करते हैं. पहले उन्हें दो साल की सज़ा हुई और उसके 24 घंटों के बीच उनकी सदस्याता रद्द की गई, हम उसका विरोध करते हैं."

अख़बार के अनुसार उन्होंने सवाल किया, "राहुल गांधी ने नीरव मोदी, ललित मोदी और नरेंद्र मोदी का नाम लिया. मैं उनके बयान का समर्थन नहीं करता और किसी की भावनाओं को आहत नहीं करना चाहता.

लेकिन मैं ये पूछना चाहता हूं कि अगर मोदी सरनेम के इस्तेमाल से पूरे समुदाय की भावनाएं आहत होती हैं तो प्रधानमंत्री मोदी की संसद की सदस्यता क्यों रद्द नहीं की जानी चाहिए.

2021 के चुनाव में उन्होंने बंगाल में 'दीदी ओ दीदी' कहकर क्या सभी महिलाओं की भावनाओं को आहत नहीं किया था? पूरी महिला जाति के ख़िलाफ़ टिप्पणी के लिए उन्हें सज़ा क्यों नहीं दी जानी चाहिए?"

"शुभेंदु अधिकारी ने ये कहकर ओबीसी समुदाय का अपमान किया था कि वीरबाहा हंसदा और देबनाथ हंसदा जैसे नेताओं को वो अपने जूते की नोंक पर रखते हैं, क्या उन्हें सज़ा नहीं दी जानी चाहिए. मैं सवाल करना चाहता हूं कि क्या अलग-अलग लोगों के लिए क्या क़ानून अलग-अलग है?"

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