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'ख़ान सर' क्यों बन गए हैं विवादों और आपत्तिजनक टिप्पणियों की खान
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
पटना के 'ख़ान जीएस रिसर्च सेंटर' की क्लास ख़त्म होने का वक़्त था. सेंटर से बाहर निकल रही छात्रों की भीड़ कोचिंग की दुनिया में ख़ान सर की लोकप्रियता की गवाही दे रही थी.
उनके पास हर रोज़ क़रीब पांच हज़ार बच्चे जीएस यानि सामान्य अध्ययन की पढ़ाई के लिए आते हैं और सालभर में क़रीब 40 हज़ार नए बच्चे अलग-अलग कॉम्पिटिशन की तैयारी के लिए यहां पहुंचते हैं.
इतना ही नहीं उनकी एप के ज़रिए भी क़रीब 50 लाख़ बच्चे हर साल कोचिंग करते हैं. लेकिन ख़ान सर की लोकप्रियता यहीं तक सीमित नहीं है.
वे छात्रों ही नहीं बल्कि आम लोगों के बीच भी एक चर्चित नाम है. उनके यूट्यूब चैनल के दो करोड़ से ज़्यादा सबस्क्राइबर हैं. उनके कुछ वीडियो को तो 5 करोड़ या उससे भी ज़्यादा लोग देख चुके हैं.
यही लोकप्रियता ख़ान सर को कोचिंग के क्षेत्र का बड़ा नाम बनाती है, लेकिन इसी की वजह से उनके साथ अक्सर कई तरह के विवाद भी जुड़ते रहते हैं.
ख़ान सर को आख़िर यह लोकप्रियता कैसे मिली और उनके नाम के साथ क्या विवाद जुड़े हैं, इसपर चर्चा करने से पहले आइए जानते हैं पटना के कोचिंग बाज़ार के बारे में.
सरकारी नौकरी की चाह
एक बड़े तबके के लिए बिहार में पढ़ाई का मुख्य मक़सद सरकारी नौकरी पाना होता है. इसी नौकरी की चाहत में हर साल लाखों बच्चे प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी के लिए पटना पहुंचते हैं
इसी चाहत के कारण शहर में कोचिंग संस्थानों की ख़ूब कमाई होती है.
पटना के एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास बताते हैं कि शहर में छोटे से लेकर नामी कोचिंग संस्थानों में लाख़ों छात्र सरकारी नौकरी पाने की इच्छा से दाख़िला लेते हैं,
राज्य में करीब 15 लाख छात्र 12वीं पास करते हैं. इनमें से लगभग आधे अपने सपने पूरे करने के लिए कोचिंग का सहारा लेते हैं. अधिकतर शहर के मुसल्लापुर हाट इलाक़े का रुख़ करते हैं.
मकसद होता है - सिविल सेवा, रेलवे, सेना, बैंकिंग और एसएससी जैसे कई कॉम्पिटिशन की तैयारी.
कौन हैं ख़ान सर
मुसल्लापुर हाट के एक कोचिंग संस्थान के निदेशक रवि सिन्हा का कहना है कि केवल इसी इलाक़े में ही क़रीब तीन लाख बच्चे हर साल सरकारी नौकरी के लिए कोचिंग करने आते हैं.
कोचिंग संस्थानों की इसी भीड़ में एक नाम है 'ख़ान जीएस रिसर्च सेंटर' का.
यह पटना के उन्हीं मशहूर ख़ान सर का कोचिंग सेंटर है, जो अक्सर कई वजहों से चर्चा या विवादों में रहते हैं.
ख़ान सर बिहार की स्थानीय ज़ुबान में बच्चों को समझाते हुए अक्सर सोशल मीडिया पर भी वायरल होते हैं और इस दौरान कई बार वो लड़कियों को आपत्तिजनक तरीक़े से संबोधित करते हुए भी दिखते हैं.
क्या है ख़ान सर का असली नाम?
कई मामलों में ख़ान सर एक रहस्यमय व्यक्ति की तरह भी दिखते हैं. वो आमतौर पर कहीं भी अपना सही या पूरा नाम ज़ाहिर नहीं करते हैं.
हालाँकि बीबीसी को अपनी पड़ताल में पता चला है कि ख़ान सर का पूरा नाम फ़ैज़ल ख़ान है.
उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई उत्तर प्रदेश के देवरिया के एक स्कूल से की है. ख़ान सर ने बाद में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया है.
ख़ान सर का दावा है कि उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद से स्ट्रेटेजिक मैनेजमेंट की पढ़ाई भी की है. हालाँकि बीबीसी इसकी पुष्टि नहीं कर सकता.
ख़ान सर का कहना है कि उनके यूट्यूब चैनल को कोविड लॉकडाउन ने ज़्यादा लोगों तक पहुँचा दिया.
दरअसल साल 2020 में मार्च के महीने में भारत में कोविड-19 की वजह के लॉकडाउन लगाया गया था.
लॉकडाउन में लोगों के लिए डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म मनोरंजन या जानकारी जुटाने का बड़ा साधन बन गए थे.
इसी दौर में ख़ान सर भी काफ़ी मशहूर हुए. ख़ासकर देसी अंदाज़ में पढ़ाने और समझाने के तरीक़ों की वजह से वो चर्चा में आए.
ख़ान सर मूल रूप से बिहार की सीमा से सटे उत्तर प्रदेश के देवरिया के रहने वाले हैं.
यहाँ रेस्टोरेंट चलाने वाले विशाल चौरसिया ख़ान सर को लंबे समय से जानते हैं.
वो ख़ान सर के साथ अपनी एक तस्वीर दिखाते हुए कहते हैं, "ख़ान सर को हम बहुत पहले से जानते हैं. यहीं भाटपार रानी में उनका घर है. कोविड लॉकडाउन के दौरान वो यहीं से बच्चों को पढ़ाते थे."
विवादों से नाता
जिस सोशल मीडिया या डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने ख़ान सर को लोकप्रिय बनाया है, उसी ने उन्हें कई बार सवालों के घेरे में भी खड़ा किया है.
आज डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और इंटरनेट के ज़रिए ख़ान सर की बात हज़ारों लाखों लोगों तक पहुँचती है.
अपनी टिप्पणी को लेकर कई बार विवादों में घिरने वाले ख़ान सर को लेकर सबसे ताज़ा विवाद यूट्यूबर मनीष कश्यप से उनके कथित संबंधों को लेकर है.
मनीष कश्यप से जुड़े मामलों की जाँच कर रही बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने बीबीसी को बताया है कि उन्हें मनीष कश्यप और ख़ान सर के बीच संबंध की जानकारी मिली है, लेकिन यह किस स्तर की है उसकी जाँच की जा रही है.
आर्थिक अपराध शाखा ने पटना कई कोचिंग संस्थानों से मनीष कश्यप के बारे में बात की है.
आरोपों के मुताबिक़ मनीष कश्यप कोचिंग संस्थानों के विज्ञापन न चलाकर उनकी पेड स्टोरी चलाते थे. यानी वे पैसे लेकर कोचिंग संस्थान का प्रचार करते थे.
हालाँकि ख़ान सर ने इस मुद्दे पर बीबीसी को बताया है कि उनकी एक पत्रकार के तौर पर मनीष कश्यप से सामान्य जान-पहचान है.
उनका कहना है, "मेरा यूट्यूब चैनल मनीष कश्यप के चैनल से बहुत बड़ा है, इसलिए मुझे मनीष से प्रचार की कोई ज़रूरत नहीं है. कुछ लोग अपने यूट्यूब चैनल का व्यू बढ़ाने के लिए मेरे नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं."
ख़ान सर के साथ एक बड़ा विवाद पढ़ाने के दौरान आपत्तिजनक शब्दों के इस्तेमाल से जुड़ा है.
फिर चाहे वो महिलाओं के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द हों या राजनीतिक नेताओं के लिए.
वो कश्मीर के मुद्दे पर भी भारत को चीन की तिब्बत नीति अपनाने की सलाह देते नज़र आते हैं और मानवाधिकारों की परवाह न करने की सलाह देते हैं.
ख़ान सर पर आरोप लग चुका है कि रेलवे की एनटीपीसी परीक्षा के रिजल्ट के बाद उन्होंने बच्चों को भड़काया.
इस रिजल्ट के आने के बाद देश के कई इलाक़ों में छात्रों ने हंगामा किया था. इसके लिए ख़ान सर पर भी बच्चों को भड़काने का मामला मामला दर्ज हुआ था.
वहीं एक बार द्वंद्व समास के बारे में बताते हुए ख़ान सर ने साल 1999 के कंधार विमान अपहरण कांड का ज़िक्र किया था. इसमें जिस भाषा का इस्तेमाल किया गया था, उसे मुस्लिम समुदाय पर टिप्पणी माना गया.
इस वीडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद कई जाने माने लोगों ने इस पर आपत्ति दर्ज की थी.
ख़ान सर का कहना है कि कंधार अपहरण कांड में अब्दुल मोमिन को सज़ा हुई थी तो इसका नाम बदलकर मैं क्या कर दूँ, आप भी इस ख़बर को चलाएँगे तो अब्दुल का नाम नहीं बदल सकते.
ख़ान सर कई बार अपनी टिप्पणियों की वजह से सवालों के घेरे में आते हैं और फिर उनको इसकी सफ़ाई भी यूट्यूब पर वीडियो बनाकर देनी पड़ती है.
इसी तरह का विवाद तब हुआ था, जब ख़ान सर ने कथित तौर पर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को पंक्चर ठीक करने वाला बताया था.
हालाँकि बाद में ख़ान सर ने सफाई दी कि उन्होंने यह टिप्पणी पूरे अल्पसंख्यक समुदाय पर नहीं, बल्कि पाकिस्तान की तहरीक ए लबैक पाकिस्तान पार्टी के नेताओं पर किया था.
महिलाओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी
लेकिन जिस वजह से ख़ान सर को अक्सर सवालों के घेरे में खड़ा किया जाता है, वो है महिलाओं पर उनकी आपत्तिजनक टिप्पणी.
वो महिलाओं के लिए कई बार बिहारी लोकभाषा के कुछ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जिसकी उम्मीद आमतौर पर एक शिक्षक से नहीं की जाती है.
ख़ान सर की सफ़ाई है कि हर राज्य की एक ज़ुबान होती है. अगर हम किसी को बेटा कहते हैं तो इसका मतलब यह नहीं होता है कि हम ख़ुद को उसके पिता बता रहे हैं.
ख़ान सर का कहना है कि अगर मैं कुछ भी ग़लत बोलता, तो इसकी आवाज़ बच्चे ख़ुद उठाते. दअरसल तीन घंटे के वीडियो से कुछ सेंकेंड का वीडियो काटकर उसे वायरल कर दिया जाता है.
ख़ान सर का इस आरोप पर कहना है, "अगर कोई बदमाशी करता है तो उसे टोकना पड़ता है. अगर किसी को बुरा लग जाए तो फिर तो कभी कोई किसी को पढ़ाएगा ही नहीं. कोई ग़लती करेगा तो उसकी तारीफ़ थोड़े ही की जाएगी. कोई लेट से आया या कोई पढ़ने के समय गंभीर नहीं है तो क्या कहेंगे कि महामहिम ध्यान दिया जाए."
बिहार में शिक्षा पर काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता प्रीति नंदिनी ख़ान सर से मिल चुकी हैं और इस मुद्दे पर बात भी कर चुकी हैं.
प्रीति कहती हैं, "मुझे लगता है ख़ान सर जान-बूझकर ऐसा नहीं बोलते. असल में जिस माहौल में रहे हैं यह उसका असर दिखता है. अब वो एक चर्चित शिक्षक हैं तो उनको ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए."
सोशल मीडिया पर इस तरह के कई वीडियो हैं, जो ख़ान सर के पढ़ाने के तरीक़े पर सवाल खड़े करते हैं. लाइटलिंग या वज्रपात को समझाने में भी ख़ान सर महिलाओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते नज़र आते हैं.
ख़ान सर एक वीडियो में कहते हैं कि महिला पुलिसकर्मियों को ड्यूटी पर भेजा जाएगा, तो वो ड्यूटी की जगह गपशप करने लगेंगी.
लोकप्रियता कैसे मिली?
ख़ान सर के मुताबिक़ उनके सेंटर में क्लास रूम कोर्स में रोज़ाना क़रीब 5 हज़ार से ज़्यादा बच्चे पढ़ते हैं.
वो सालभर में क़रीब 40 हज़ार बच्चों को क्लासरूम कोर्स के माध्यम से जीएस यानी सामान्य अध्ययन पढ़ाते हैं.
इसके अलावा ऑनलाइन एप्लिकेशन के माध्यम से साल भर में 50 लाख बच्चे ख़ान सर से सामान्य अध्ययन विषय की पढ़ाई करते हैं.
ख़ान सर का दावा है कि यूट्यूब पर क़रीब 2 करोड़ लोग उनसे पढ़ते हैं.
उनका यह भी दावा है कि ख़ान जीएस रिसर्च सेंटर का यूट्यूब चैनल दुनिया का सबसे बड़ा एजुकेशन चैनल है.
ख़ान सर का कहना है कि कोविड ने उनके यूट्यूब चैनल को ज़्यादा लोकप्रिय बना दिया.
वो कहते हैं, "कोविड से पहले हम भी टेक्नोलॉजी के बारे में ज़्यादा नहीं जानते थे, लेकिन बच्चों को पढ़ाना था तो सब सीखना पड़ा."
कोचिंग का यह बाज़ार इतना बड़ा है कि दिल्ली के पास ग़ाज़ियाबाद में रह रहे प्रिंस त्यागी हर महीने कम से कम दो बार पटना के एक कोचिंग सेंटर में पढ़ाने आते हैं.
पढ़ाने का 'दिलचस्प' तरीका
प्रिंस दिल्ली के कोचिंग संस्थानों में भी पढ़ाते हैं.
उनका कहना है, "दिल्ली के मुखर्जी नगर में साल 2014 में कुछ कोचिंग संस्थानों ने अपनी मार्केटिंग के लिए यूट्यूब का इस्तेमाल शुरू किया था. उस वक़्त इससे पैसे कमाने की समझ भी किसी को नहीं थी. कोचिंग संस्थानों ने साल 2016 में पैसे कमाने के मक़सद से यूट्यूब पर वीडियो डालना शुरू किया था. "
प्रिंस त्यागी कहते हैं, "ख़ान सर पढ़ाते अच्छा हैं लेकिन वो पढ़ाई के अलावा भी ऐसा बहुत कुछ बताते हैं, जिसका कॉम्पिटिशन से कोई संबंध नहीं है लेकिन वह आम लोगों में उत्सुकता जगाता है. इसलिए छात्रों के अलावा भी बहुत से लोग उनका यूट्यूब चैनल देखते हैं."
जैसे ट्रेन के डब्बों के नंबर के बारे में बताना या ट्रेन के इंजन के बारे में बताना या फिर कोविड का टेस्ट कैसे होता है- इसका किसी कॉम्पिटिशन से कोई संबंध नहीं है.
ख़ान सर भारतीय स्थापत्य कला की नागर शैली या द्रविड़ शैली के बारे में पढ़ाते हैं, तो वो पुराने मंदिरों की जगह अयोध्या में बन रहे राम मंदिर की तस्वीर का इस्तेमाल करते हैं.
यह तस्वीर बड़ी संख्या में छात्रों के अलावा भी लोगों को अपनी ओर खींचती है.
इसके अलावा वह पढ़ाते समय पहले मंदिर की जगह भगवान और भक्ति के तरीक़े पर टिप्पणी करते हुए आगे बढ़ते हैं.
या फिर यूट्यूब पर यह बोलना कि कोरोना के वक़्त लोग भगवान को बहुत याद करते थे, या हवाई जहाज़ पर लोग भगवान को खूब याद करते हैं लेकिन सुरक्षित पहुँच जाने पर फ़ौरन भूल जाते हैं.
वहीं वाइन पीने के ग्लास के डिज़ाइन को क्लासरूम में समझाना बड़ी संख्या में आम लोगों को अपनी ओर खींचता है. जो यह जानना चाहते हैं कि आख़िर वाइन पीने का ग्लास एक ख़ास डिज़ाइन का क्यों बना होता है.
ख़ान सर की लोकप्रियता के पीछे उनके इस तरह के प्रयोग की बड़ी भूमिका है.
वो सफाई देते हुए कहते हैं, "लगातार 7-8 घंटे पढ़ाने में बच्चे भी मोबाइल पर नाच-गाना देखने लगते हैं, जिससे कोई ज्ञान नहीं बढ़ने वाला. बच्चों को बीच-बीच में ऐसी बातें बताकर उनको पढ़ाई में जोड़े रखा जाता है और इससे ज्ञान ही बढ़ता है."
ख़ान सर बताते हैं कि उनकी सबसे ज़्यादा रुचि विदेश नीति या विदेश संबंध पढ़ाने में होती है.
उनके ऑनलाइन वीडियोज़ को देखें, तो इस विषय को पढ़ाने में वो इमरान ख़ान की आपत्तिजनक तस्वीर या चीन के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं.
हालाँकि ख़ान सर के पास कोचिंग कर रहे एक छात्र राहुल का कहना है, "ख़ान सर किसी भी बात को समझाने के लिए जिस तरह की भाषा या कहानी का इस्तेमाल करते हैं, उससे हमें याद रखने में मदद मिलती है. इसका बहुत फ़ायदा होता है."
ख़ान सर पढ़ाने के दौरान भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक का मज़ाक उड़ाते नज़र आते हैं.
छात्रों के सामने कई बार भारत के नेताओं या दूसरे देशों और उनके नेताओं के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करने पर ख़ान सर सफ़ाई देते हैं, "एक शिक्षक होने के साथ ही मैं भारत का एक नागरिक हूँ."
यानी भारत में राजनीतिक व्यक्तियों के ख़िलाफ़ लोगों की भावना हो चीन और पाकिस्तान के विरोध की भावना- ख़ान सर पढ़ाने में इसका ख़ूब इस्तेमाल करते हैं.
तथ्यात्मक ग़लती
दूसरी तरफ इंटरनेट की इसी पहुँच ने ख़ान सर की पढ़ाई में कई ग़लतियों को भी उजागर किया है.
इसमें सबसे ज़्यादा बहस उनके मक्का और मदीना के बारे में ग़लतियों को लेकर होती है.
दरअसल एक वीडियो में ख़ान सर अपने क्लास में बच्चों को पढ़ाते हुए 'बैतुल्लाह' को मक्का कह रहे हैं और 'मस्जिद ए नबवी' को मदीना कह रहे हैं.
इस वीडियो में ख़ान सर ने कई ग़लतियाँ की हैं और इस पर इस्लामिक जानकारों ने उनके तथ्यों पर भी सवाल उठाए हैं.
हमने ख़ान सर से इस मुद्दे पर भी पूछा, तो उनका कहना था, "छोटी सी बात को लोग तिल का ताड़ बना देते हैं. मैं भूगोल पढ़ा रहा था, धर्म नहीं. आप जब भी मक्का और मदीना जैसे शहरों की तस्वीर देखेंगे, तो वही तस्वीर दिखेगी. इन शहरों में और कुछ है भी नहीं. उन्हें समझाने के लिए ऐसा बोला था."
ख़ान सर अगर अपने पढ़ाने के तरीक़े से पटना के कोचिंग बाज़ार का बड़ा नाम बन गए हैं, तो उनकी ग़लतियों को पकड़ने वाले भी अक्सर वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड करते रहते हैं.
जैसे भारतीय रेल में मालगाड़ी को खींचने वाले इंजन WAG 12 के बारे में ख़ान सर एक वीडियो में दावा करते हैं यह दुनिया का सबसे ताक़तवर रेल इंजन है.
जब हमने इसके बारे में रेलवे से जानकारी मांगी, तो उनका कहना है कि ऐसा दावे के साथ नहीं कहा जा सकता.
लेकिन ये दुनिया के सबसे ताक़तवर रेल इंजन में से एक ज़रूर है, जो मालगाड़ी को लगातार 120 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ़्तार से खींच सकता है.
वहीं ख़ान सर एक वीडियो में बता रहे हैं कि गांधी जी साल 1883 में वकालत की पढ़ाई करने लंदन गए थे. जबकि असल में गांधी जी साल 1888 में लंदन गए थे.
एक वीडियो में ख़ान सर इसराइल के ऑपरेशन थंडरबोल्ट की तारीख़ 27 जून 1967 बता रहे हैं, जबकि असल में यह ऑपरेशन 27 जून 1976 को अंजाम दिया गया था.
ख़ान सर भी मानते हैं कि कभी-कभी ऐसी ग़लतियाँ हो जाती हैं.
उनका कहना है, "लगातार कई घंटों तक पढ़ाते रहने से थकान के बाद ऐसा होता है. हालाँकि इसे सुधार लिया जाता है लेकिन सोशल मीडिया पर सुधार के बाद की चीजें वायरल नहीं होती हैं."
उनका दावा है कि अगर वो ग़लत पढ़ाते, तो हर साल बिना किसी प्रचार के उनके पास इतने बच्चे कोचिंग के लिए नहीं आते. यह सब मानवीय चूक है, जो किसी से भी हो सकती है.
प्रिंस त्यागी कहते हैं, "ऑनलाइन क्लास ज़्यादा मुश्किल होते हैं. यहाँ आप दो मिनट भी आराम नहीं कर सकते, क्योंकि इस दौरान आपकी स्क्रीन ब्लैंक नहीं रह सकती. आपको लगातार बोलना और लिखना होता है. इसी में कुछ ग़लतियाँ हो जाती हैं. ऑफ़लाइन क्लास में ऐसी ग़लती सुधार ली जाती है, लेकिन ऑनलाइन में यह रिकॉर्ड पर रह जाती है."
कोचिंग की हक़ीकत
ख़ान सर अपने एक वीडियों में बरनॉली के थ्योरम को तो अच्छे से समझाते हुए नज़र आते हैं. मसलन आंधी आने पर छप्पर के उड़ जाने की क्या वजह होती है, प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े व्यक्ति को चलती ट्रेन से दूर खड़े रहने को क्यों कहा जाता है.
लेकिन इसी वीडियो में वो गतिज और स्थितिज ऊर्जा को समझाने में वो एक लड़की का उदाहरण देते हैं, जो क़ुतुब मीनार पर आत्महत्या करने के लिए चढ़ी है.
या फिर पढ़ाते समय ख़ान सर का ये भी कहते हैं कि घर के अंदर पति-पत्नी की लड़ाई से तूफ़ान आता है.
ख़ान सर एक और दावा करते हैं कि ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत के सवाल का सही जवाब कॉम्पिटिशन की परीक्षा में हमेशा ऑप्शन 'बी' होता है.
इस तरह के दावे बच्चे को परीक्षा में ग़लत भी साबित कर सकते हैं.
प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास कहते हैं, "आज शिक्षक की भूमिका समाज के निर्माण में नहीं रह गई है, न ही उसे समझ विकसित करने की है. आज सबकुछ वर्चुअल है, जिसमें बेसिर-पैर की बातें होती हैं. यह एक तरह की अंधेरगर्दी है, जिसका वास्तविक धरातल से कोई मतलब नहीं है."
पटना की कोचिंग में पढ़ने वाले छात्र जिस सरकारी नौकरी के सपने के साथ यहाँ आते हैं, उनमें से कितनों का सपना पूरा होता है?
ख़ान सर इस मुद्दे पर कोई सीधा जवाब नहीं देते हैं.
कोचिंग में पढ़ाने वाले प्रिंस त्यागी कहते हैं, "ख़ान सर हों या कोई भी. किसी भी कोचिंग से अधिकतम 5-7 फ़ीसदी बच्चे ही नौकरी पाने में सफल होते हैं. इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि आजकल सरकारी नौकरी में वैकेंसी कम आती है."
उनका कहना है कि हर एक समय में पटना में पाँच से आठ लाख तक बच्चे कोचिंग कर रहे होते हैं.
इनमें से क़रीब 40 फ़ीसदी बच्चे गंभीर होते हैं और महज़ एक-दो अंकों की वजह से यह नौकरी पाने में छूट जाते हैं.
प्रिंस बताते हैं कि दिल्ली के मुक़ाबले पटना के बच्चे ज़्यादा मेहनती नज़र आते हैं, इसके पीछे एक वजह होती है उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि.
इनमें से ज़्यादातर बच्चे ग़रीब परिवारों के होते हैं, जिनका बस एक मक़सद होता है कि सरकारी नौकरी हासिल कर अपनी स्थिति को बेहतर करना.
बिहार की इसी ग़रीबी की वजह से ख़ान सर यह भी दावा करते हैं कि उनकी फ़ीस काफ़ी कम होती है.
जबकि रवि सिन्हा कहते हैं, "यहाँ आमतौर पर सबकी फ़ीस एक जैसी ही है. ख़ान सर जिस फ़ीस की बात करते हैं, वो ऑनलाइन क्लास के लिए है और उनके पास ऑफ़लाइन में बहुत से बच्चे पढ़ते हैं क्योंकि उनके समझाने का तरीक़ा सबसे अलग है."
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